अमरनाथ यात्रियों पर हमले के गंभीर निहितार्थ

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बेबस, लाचार, असहाय

अमरनाथ यात्रियों पर कल रात  अनंतनाग में हुए हमले ने देश को सन्न कर दिया है क्योंकि एक तो अमरनाथ यात्रियों पर ये हमला कोई 17 साल बाद हुआ है इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ऐसा हमला हुआ था जिसमें कि 32 तीर्थयात्री मारे गए थे और 2000 से पहले 1993 में भी अमरनाथ यात्रियों पर ऐसा ही हमला हुआ था | अमरनाथ यात्रियों पर यह ताजा हमला कई मायनों से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमला पूरी तरह कश्मीर में चल रहे आतंकवाद या तथाकथित अलगवावाद से अलग इस्लामिक जगत में चल रहे अंतर्द्वंद की ओर इशारा करता है|

कश्मीर में अमरनाथ यात्रा घाटी में अधिकतर स्थानीय निवासियों के लिए आर्थिक जीविकोपार्जन का साधन है और अधिकतर मुस्लिम समाज के स्थानीय लोग इस पूरी यात्रा में न केवल सहोग करते हैं बल्कि उनके सहयोग के बिना यह यात्रा संभव ही नहीं है और पूर्व में भी जब भी इस यात्रा पर आतंकवादी हमले हुए तो उसमें कुछ चीजें समान थीं | जैसे कि जब 1993 में अमरनाथ यात्रियों पर हमला हुआ तो उससे पहले देश में राम मंदिर आन्दोलन की परिणति के रूप में बाबरी ढांचा गिर चुका था और देश में और देश से बाहर मुस्लिम जगत के लोगों ने इसे अपनी धार्मिक भावना पर आघात माना था | इसी प्रकार 2000 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में ये हमला हुआ तो भी देश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी और इसे आम तौर पर हिन्दुओं की पार्टी मानकर चला गया और  इसे प्रचारित किया गया | इन दोनों ही प्रष्ठभूमि से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये हमले कश्मीर में चल रहे अलगाववादी आन्दोलन की प्रक्रिया में सुरक्षा बलों पर होने वाले हमलों से अलग राजनीतिक न होकर मजहबी हैं |

परन्तु साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि ऐसे हमलों से इस्लाम के नाम पर स्वयं को जिहादी बताने वाले आखिर क्या सन्देश देना चाहते हैं और हमें इसे किस रूप में देखना चाहिए|

प्रथम विश्व युद्ध में इस्लाम के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य एकीकरण की प्रतीक खिलाफत संस्था को जब पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया और कई सदियों के बाद इस्लाम  धर्म और राजनीतिक विचारधारा के अपने तालमेल से वंचित हो गया तो उसमें एक अन्तर्विरोध पैदा हो गया क्योंकि अपने जन्म से लेकर सदियों तक अपने विस्तार के काल में इस्लाम धर्म, सभ्यता, राजनीतिक शक्ति और सैन्य शक्ति के एकीकरण के साथ विकसित हुआ था , इस कारण खिलाफत संस्था के ध्वस्त होने से इस्लाम के भविष्य को लेकर अनेक स्वर बन गए और उसी समय दो स्तर पर इस्लाम पूरी तरह विभाजित हो गया एक जिसने जिहाद की पुरानी अवधारणा को किसी भी प्रकार से नरम या कमजोर होने देने के किसी भी प्रयास को निरस्त किया और क्रांतिकारी रूप में जिहाद के आधार पर शरियत आधारित विश्व व्यवस्था के प्रयास के लिए आन्दोलन जारी रखा और समय समय पर यह आन्दोलन आतंकवाद की ओर भी बढ़ा , छिटपुट आतंकवादी घटनाओं के साथ ही यह कभी कभी आतंकवादी अभियानों के आधार पर अपने अलग इस्लामिक माडल स्टेट बनाने में भी कामयाब रहा और बीती एक शताब्दी में पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण एशिया के अनेक क्षेत्रों में आतंकवादी अभियान के बल पर जिहादी और शरियत आधारित माडल स्टेट बनाने के प्रयास होते रहे और 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति और 1980 के दशक में जनरल जिया उल हक़ के शासन में पाकिस्तान का जिहादी राज्य की ओर झुकना  इस आन्दोलन की बड़ी सफलता रही |

दूसरी ओर पश्चिम एशिया के अनेक देश क्रांतिकारी जिहादी और शरियत आधारित माडल पर  इस्लामिक स्टेट  बनाने के प्रयास  और प्रथम विश्व युद्ध के बाद उभरी विश्व व्यवस्था के संदर्भ में इस्लाम की मजहबी पहचान को बचाए रखते हुए भी उसे नए तरीके से ढालने के प्रयास में विभाजित हो   गए और पश्चिम एशिया में यह अंतर्द्वंद सलाफी , वहाबी धारा और अरब राष्ट्रवाद के अंतर्संघर्ष में देखने को मिला |

भारत की आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अरब राष्ट्रवाद की इसी धारा को मजबूत करने के लिए अरब देशों को सहारा दिया और इजरायल के साथ खुलकर सामने आने के स्थान पर उससे सम्बन्ध बनाये रखा , पर पश्चिम के देशों ने अरब राष्ट्रवाद की  इस धारा को कमजोर किया और अरब देशों में सुधारवाद को कमजोर कर सैनिक शासकों और भ्रष्ट अमीरों और राजाओं को संरक्षण दिया जिससे की पश्चिम एशिया में केवल दो धाराएँ रह गयीं एक तानशाह और दूसरे सलाफी कट्टरपंथी और बीती एक शताब्दी में इस्लाम में सुधारवाद और सुधारवादी नयी पीढी का प्रयास असफल रहा |

इस्लाम का मूल अरब देशों से है इसलिए अरब में इस्लाम में सुधारवाद और राजनीतिक विकल्प के अभाव में जिहादी और शरियत व्यवस्था पर आधारित माडल इस्लामिक स्टेट बनाने के प्रयास में चल रहा आतंकवादी आन्दोलन इस्लामी जगत में सदैव एक विकल्प रहा विश्व में प्रत्येक देश जिसमें कि मुस्लिम जनसंख्या पर्याप्त मात्रा में है इस विचारधारा को अपने यहाँ फ़ैलाने से रोकने की चुनौती का सामना करता रहा  और पश्चिम एशिया और अरब सहित पश्चिम के देशो ने  इस विचार को खुद से  परे रखने के लिए दक्षिण एशिया और अफ्रीका सहित अन्य स्थानों में जैसे केन्द्रीय एशिया, रूस जैसे स्थानों पर इसे भटकाए रखने के लिए इस आन्दोलन को समय समय पर अपनी सुविधा के अनुसार सहयोग भी करते रहे ताकि यह दैत्य उनसे दूर रहे पर अमेरिका पर हुए 11 सितम्बर के हमले के बाद पश्चिम के देशों पर हुए हमलों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया कि यह विचारधारा के रूप में लोगों को तेजी से आकर्षित कर रहा है|

अमरनाथ यात्रा पर हुआ ताजा हमला हमें कुछ चीजों पर नए सिरे से सोचने को विवश करता है|

जो लोग ऐसे हमलों के बाद प्रतिक्रिया देते हैं कि इन हमलों का मजहब से कोई लेना देना नहीं है वे या तो भोले हैं या भोले होने का नाटक करते हैं और जो ऐसे हमलों के बाद किसी मजहब को एक लपेटे में ले लेते हैं वे बेवकूफ हैं क्योंकि इन दोनों ही तरह के लोगों को विषय की गंभीरता का आभास नहीं है और इसके विरद्ध कोई रणनीति नहीं है|

आतंकवाद जो कि सही अर्थ में इस्लामवादी आतंकवाद है जिसमें कि इस्लाम मजहब मानने वालों की एक धारा इस्लाम की अपनी व्याख्या में समय के अनुरूप कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं करती और उसे उसी रूप में दुनिया में लागू करने के लिए   इसे एक मजबूत राजनीतिक और सैन्य शक्ति बनाना चाहती है और पूरी दुनिया में ऐसी कमजोर कड़ियों की तलाश में है जहाँ कि वो अपना माडल इस्लामिक स्टेट बना सके और सही इस्लाम को फिर से स्थापित कर सके , जो प्रयास अफगानिस्तान में हुआ और पिछले कुछ सालों से इराक के एक हिस्से में हो रहा है और पाकिस्तान पूरी तरह उसी दिशा में बढ़ रहा है और समय रहते कोई ठोस रणनीति नहीं बनायी गयी तो बांग्लादेश, मालदीव भी इसी श्रेणी में आ जायेंगे |

पर इनसे पहले हमें अपने देश के भीतर इस पूरी समस्या को नए संदर्भ में देखना होगा और उसके लिए नयी रणनीति अपनानी होगी | सबसे पहले इस्लाम के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद को हमें समझना होगा और स्वीकार करना होगा, इस्लाम को आतंकवाद के साथ जोड़कर और उनके धर्म से नफ़रत करते हुए हम इस्लाम के भीतर मौजूद उस धारा को मजबूत  कर रहे हैं जो इस्लाम को पुनर्स्थापित करने के नाम पर आतंकवाद के सहारे अपने ही धर्म में उन्हें भी नहीं बख्स रहे हैं जो नरम पंथ की ओर बढना चाहते हैं|

जो लोग देश में होने वाले आतंकवादी हमलों, उसके स्वरुप और आर्थिक, सामाजिक या स्थानीय कारणों से होने वाली साम्प्रदायिक झडप में अंतर नहीं समझ पाते और हर स्थिति में इस्लाम को निशाना बनाकर देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहते हैं असल में उन्हें समस्या का समाधान नहीं करना है बस इसका राजनीतिक लाभ लेना है | दूसरी ओर उदारवादी वामपंथी सोच के लोग इस्लामवादी आतंकवाद को समस्या ही नहीं मानते और इतने बड़े देश में पनपने वाले मतभेदों को बढ़ा चढ़ा कर ऐसे पेश करते हैं कि देश में इस्लाम खतरे में दिखता है और इस्लामवादी आतंकवाद को नैतिक समर्थन मिलता है |

इस्लामवादी आतंकवाद की अवधारणा को एक शताब्दी हो चुकी है और हम अभी तक इसके सम्बन्ध में कोई स्पष्ट सोच और रणनीति नहीं बना सके है और या तो इस विषय पर आँख मूंदने या फिर इसे और जटिल बनाने की दिशा में काम करने लगते हैं|

इस्लामवादी आतंकवाद और इस्लाम का धार्मिक स्वरुप दो अलग अलग चीजें हैं और  मुस्लिम समाज इस्लाम के भीतर चल रहे इस अन्तर्विरोध से इनकार नहीं कर सकता है , उसे इसके समाधान के लिए सामने आना होगा और ऐसे तत्वों को अलग थलग करना  होगा क्योंकि उन्हें इस्लामवादी कोई दूसरा नहीं कहता वे स्वयं घोषित करते हैं कि वे कौन हैं?  और साथ ही हिन्दू समाज के लोगों को इस्लामवादी आतंकवाद पर ईमानदारी के साथ  पहल करनी होगी ताकि देश के मुसलमानों को लगे कि उनके भीतर चल रहे अंतर्द्वंद का समाधान करने में हिन्दू उनके साथ है और इसके पर्दे में उनके धर्म को निशाना नहीं बनाया जा रहा है|

इस समस्या के समाधान के लिए दोनों पक्षों को नयी पहल और नयी सोच के साथ ईमानदारी से सामने आना होगा |