अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट में भाजपा और संघ पर गंभीर टिप्पणी

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अमेरिकी रिपोर्ट तथ्य या अवधारणा

न्यूयार्क , अमेरिका के गृह मंत्रालय या स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा प्रतिवर्ष विश्व के विभिन्न देशों में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर जारी की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट में  वर्ष 2015 की सालाना रिपोर्ट में  भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर न केवल चिंता व्यक्त की गयी है बल्कि 2014 में केंद्र में भाजपा गठबंधन की सरकार के आने के बाद से  देश में   धार्मिक असहिष्णुता की स्थिति  में तेजी आने का उल्लेख करते हुए देश के विभिन्न भागों में हुई घटनाओं का विस्तार से   उल्लेख भी रिपोर्ट में किया   किया गया है और भाजपा गठबंधन सरकार को हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार के रूप में भी संबोधित करते हुए  सरकार सहित समाज में   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , संघ परिवार और विश्व हिन्दू परिषद के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त करते हुए  देश के अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम और ईसाई के प्रति इन संगठनों के भाव को विद्वेषपूर्ण मानते हुए इन संगठनों द्वारा  इनकी देश के प्रति  निष्ठा पर शंका किये जाने की प्रव्रत्ति  को प्रमुखता से इस रिपोर्ट में जगह दी गयी है| रिपोर्ट में अनेक स्थानों पर हिंदुत्व विचारधारा का भी नाम लिया गया है|

पिछले अनेक वर्षों से इस रिपोर्ट में भारत पर तीखी टिप्पणी होती आयी है पर वर्ष 2014 की तुलना में यह रिपोर्ट अधिक आलोचनात्मक है क्योंकि पिछले वर्ष की रिपोर्ट में अनेक घटनाओं और बयानों के उल्लेख के साथ इस बात के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की गयी थी कि उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता के प्रति अपना संकल्प व्यक्त किया है| वर्ष 2015 की रिपोर्ट में  अनेक घटनाओं और बयानों के साथ धर्मांतरण विरोधी देश व्यापी क़ानून बनाने की मांग का समर्थन करने वालों में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह का नाम भी विशेष रूप से लिया गया है  और  साथ ही भाजपा के सांसदों योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज द्वारा समय समय पर दिए गए विवादास्पद बयानों का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया है| गो हत्या पर प्रतिबन्ध को लेकर चलाये जा रहे अभियान को भी धार्मिक स्थिति में टकराव के लिए जिम्मेदार बताया गया है|

रिपोर्ट में निकाले गए निष्कर्षों के बाद  आयोग ने  अमेरिकी  प्रशासन से  आग्रह किया गया है कि वह भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए और भारत में  धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को बहाल करने के लिए भारत सरकार पर यथासंभव दबाव डाले|

रिपोर्ट में भारत को अफगानिस्तान और अज़र्बेजान जैसे देशों के साथ सूचीबद्ध किया गया है| हालांकि अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट पर बाध्यकारी नहीं है पर इस रिपोर्ट के आधार पर किसी भी देश की छवि और उसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान पर असर अवश्य पड़ता है और विशेष रूप से जबकि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है तो ऐसे में यह रिपोर्ट भारत के लिए काफी मायने रखती है|

कुछ महीनों पहले भारत सरकार द्वारा अमेरिका के  धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के सदस्यों को वीजा देने से इंकार करने के बाद यह नवीनतम रिपोर्ट और भी महत्वपूर्ण हो गयी है वह भी तब  जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जून में अमेरिकी राष्ट्रपति के बुलावे पर न केवल अमेरिका जा रहे हैं बल्कि वे अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित भी करने वाले है और इससे ठीक पहले अमेरिका के राज्य विभाग की रिपोर्ट में भारत के  प्रधानमंत्री के निकटतम लोगों और उनके संगठनों पर की गयी टिप्पणी अवश्य ही उनके लिए असहज स्थिति उत्पन्न करती है|