अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग पर उठे सवाल

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अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग से पहले पाकिस्तान पर उसका रुख साफ़ हो

नई दिल्ली, अमेरिका के रक्षा मंत्री आश्टन कार्टर की भारत यात्रा में भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर के साथ दोनों देशों के मध्य हुई सैन्य सहमति पर देश में सहमति बनती नहीं दिख रही है | अमेरिकी रक्षा मंत्री की यात्रा में दोनों देशों के मध्य इस बात पर सहमति बनी है कि अमेरिका भारत के सैन्य ठिकानों का प्रयोग अपने सैनिकों के लिए कर सकता है जिसमें कि एयर बेस और नौ सेना के बेस शामिल हैं | इस सहमति के एक दिन बाद पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने एनडीए सरकार से आग्रह किया है कि वह ऐसे किसी सैन्य समझौते पर अमेरिका के साथ हस्ताक्षर न करे क्योंकि यह भारत की गुट निरपेक्ष नीति के विपरीत होगा और भारत अमेरिका का सैन्य सहयोगी बन जाएगा जिससे कि उसकी विदेश नीति और रणनीतिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी क्योंकि रूस जैसे देशों के साथ भी भारत के सैन्य सहयोग के रिश्ते रहे हैं |

ए के एंटोनी के साथ अनेक रणनीतिक विषयों के जानकार भी अमेरिका पर आँख मूंदकर भरोसा करने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि अमेरिका ने अभी तक सैन्य सहित सभी मामलों में भारत के हितों के अनुरूप कोई काम नहीं किया है , चाहे वह पाकिस्तान पर आतंकवाद के विरुद्ध दबाव डालना हो, भारत को सैन्य रक्षा उपकरण से जुडी तकनीक उपलब्ध कराना हो या फिर परमाणु से जुड़े विषय हों |

अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार के सैन्य सहयोग के लिए अपने बेस का उपयोग उनके सैनिकों के लिए करने देने के विकल्प का अर्थ यह भी है कि कल को  यदि  अमेरिका  किसी सैन्य अभियान में शामिल होता है तो उस अभियान में भारत भी साझीदार माना जाएगा और कोई आवश्यक नहीं कि अमेरिका का हर सैन्य अभियान भारत के हितों को ध्यान में रखकर किया जाए |

हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती दखल और साउथ चाइना सी में मौजूद ऊर्जा के स्रोतों को देखते हुए अमेरिका चीन की घेराबंदी करना चाहता है पर भारत को यह देखना होगा कि क्या उसके हित चीन से सैन्य टकराव में  हैं या फिर वह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति के चलते उस क्षेत्र में हो रहे टकराव को भारत की धरती पर लाने का खतरा मोल ले सकता है |

आने वाले दिनों में यह विषय गंभीर चर्चा का विषय बन सकता है |