उत्तर प्रदेश में राजनीतिक उथल पुथल के निहितार्थ

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हम जुदा हो गए |

किसी भी युद्ध और राजनीतिक घमासान में सबसे होशियार रणनीतिकार वही माना जाता है जो अपने पत्ते खोलने से पहले विरोधी के दांव का इंतज़ार करे और अपनी किसी भी रणनीति के साथ उस पर विरोधियों की प्रतिक्रिया  का पूर्वानुमान कर उसके लिए भी अपने दाँव सुरक्षित रखे, उत्तर प्रदेश में इस समय जो राजनीतिक हालात हैं उनके संकेत बिहार चुनाव के परिणामों और फिर पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में  ही मिल गए थे , पर उत्तर प्रदेश के दो राजनीतिक दलों भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने इन सकेतों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जिसके चलते उस योजना पर कार्य चलता रहा |

असल में आज उत्तर प्रदेश में जिस राजनीतिक उथल पुथल को राजनीतिक विश्लेषक सैफई परिवार का अंदरूनी झगडा मानकर चल रहे हैं वह परिस्थितियों का धुंधला सा परिद्र्श्य भर है, इस पूरे घटनाक्रम में केवल पारिवारिक कोण नहीं है बल्कि इससे अधिक बड़ा वैचारिक और भविष्य की राजनीति का उभरता नया समीकरण भी है| सैफई परिवार के समीकरण ने इसे इस रूप में आने का बहाना भर दे दिया है, चुनाव से पहले यह होना ही था अगर यह पारिवारिक झगडा न होता तो किसी दूसरे रूप में यह विषय सामने आता |

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की राहें उसी दिन जुदा हो गयी थीं जब बिहार के विधानसभा चुनाव को सेक्युलरिज्म की परीक्षा के रूप में भाजपा विरोधी गठबंधन के रूप में लड़ा गया था और मुलायम सिंह यादव ने इस गठबंधन में एक नाटकीय रूप से यू टर्न ले लिया था , इसी घटना के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की भविष्य की राजनीतिक भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति बन गयी थी , इसके बार आहे बगाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा की और मुलायम सिंह ने भी कई बार सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रधानमन्त्री मेरी तारीफ़ करते हैं तो मेरी ही पार्टी के अनेक लोगों को यह अच्छा नहीं लगता |

पिछले अनेक महीनों से समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव की भाजपा से बढ़ती नजदीकी पर बेचैनी है और अमर सिंह की पार्टी में फिर से वापसी और उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने से यह असमंजस इस निष्कर्ष पर पहुँचने लगा कि शायद विधानसभा चुनावों के बाद मुलायम सिंह यादव भाजपा के साथ जायेंगे और बदले में उन्हें उपराष्ट्रपति या कोई अन्य संवैधानिक पद मिल जाये क्योंकि मुलायम सिंह यादव को भी पता है कि उनकी राजनीतिक पारी अंतिम दौर में है और उनका देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना अब पूरा नहीं हो सकता |

इस समय समाजवादी पार्टी में जो घमासान चल रहा है उसके पीछे असली कारण यह है कि मुलायम सिंह यादव इसे अपनी संपत्ति मान कर चल रहे हैं और इसे अपने हिसाब से भविष्य में ले जाना चाहते हैं पर जो लोग वैचारिक कारणों से भाजपा के साथ नहीं जाना चाहते और स्वयं अखिलेश यादव जो पार्टी के इस भविष्य में अपना राजनीतिक भविष्य समाप्त होता देख रहे हैं उनके लिए मुलायम सिंह को अलग थलग कर नए सिरे से समाजवादी पार्टी की  राजनीति और कमान  अपने हाथ में लेकर इसे   नया स्वरुप देने के लिए नितीश कुमार और राहुल गांधी के साथ हाथ मिलाना  उनके राजनीतिक भविष्य को अधिक सुरक्षित रखता है| अब उत्तर प्रदेश में  यदि समाजवादी पार्टी को एक रहना है तो उसके   पास एक  ही विकल्प शेष है और वह है मुलायम सिंह यादव का सम्मानजनक रूप से पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में आकर मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाना अन्यथा अखिलेश यादव ने पार्टी के विभाजन का मन तैयार कर लिया है और अधिकतर नेता यही मानते हैं कि उनका राजनीतिक भविष्य अखिलेश के साथ सुरक्षित है  और मुलायम सिंह यादव कल की बात हो गए हैं| सबसे रोचक बात यह है कि मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक परिद्रश्य से बाहर होने से राममन्दिर आन्दोलन के उपजी कटुता का बोझ भी अखिलेश यादव को ढोना नहीं पडेगा और जो लोग धार्मिक ढंग से चीजों का विश्लेषण करते हैं वे मान लेंगे कि मुलायम सिंह यादव को १९९० के अपने कर्मों का फल मिल गया |

अखिलेश यादव ने यह जोखिम काफी सोच समझकर लेने का निर्णय लिया है क्योंकि उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक चित्र से मुलायम सिंह यादव के जाते ही पूरा राजनीतिक चित्र बदल जाता है| गेस्ट हाउस कांड के चलते बसपा प्रमुख मायावती को व्यक्तिगत रूप से मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल  यादव से चिढ है पर उनके अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव से अत्यंत मधुर सम्बन्ध हैं| इसी प्रकार अखिलेश ने बीते वर्षों में राहुल गांधी, नितीश कुमार , ममता बनर्जी , चौधरी अजीत सिंह से भी अच्छे राजनीतिक रिश्ते बना रखे हैं और यदि अखिलेश बिना मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव के नए राजनीतिक समीकरण के  साथ सामने आते हैं तो उन्हें उत्तर प्रदेश का नितीश कुमार बनने से कोई नहीं रोक सकता यह उन्हें भी पता है|

आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में अनेक मोड़ आने वाले हैं जो न केवल प्रदेश की राजनीति बल्कि देश की आगे की राजनीति को भी बदल कर रख देंगे|

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी कुशलता यह है कि उन्होंने इस उठा पटक की भनक न तो भाजपा और न ही बसपा को लगने दी जो कितने ही महीनों से अति आत्मविश्वास की शिकार होकर यह मान बैठी थीं कि उत्तर प्रदेश में बिहार का फार्मूला लागू ही नहीं हो सकता |