किसान क्रान्ति यात्रा और सरकार का रवैया

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नई दिल्ली, अक्टूबर| देश में पिछले एक वर्ष से इस बात पर चर्चा हो रही थी कि 2 अक्टूबर 2018 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती मनाई जायेगी और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस जयन्ती को अपनी महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छता अभियान से  जोड़कर इसके अनेक राजनीतिक मायने निकालने के लिए लोगों को विवश कर दिया|

परन्तु राष्ट्रपिता की जयन्ती पर जब देश की राजधानी दिल्ली के प्रवेश द्वार से किसान क्रान्ति यात्रा के नाम से चल रही भारतीय किसान यूनियन की किसान यात्रा में पुलिस और किसानों के मध्य टकराव के दृश्य सामने आये तो ऐसा लगा मानों देश की राजनीति का वह छुपा चेहरा सामने आ गया जिसमें महापुरुषों के नाम पर मनाई जाने वाली जयन्ती और उनके संकल्प और सपनों पर अमल करने में बनी गहरी खाई ही राजनीति का सत्य है|

जिस समय देश के  दो प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी महात्मा गांधी की राजनीतिक विरासत पर देश के दो अलग कोनों से अपना अधिकार जताने में व्यस्त थे उसी समय देश का अन्नदाता किसान अपनी मांगों को लेकर पुलिस से जद्दोजहद कर रहा था |

2 अक्टूबर का आरम्भ ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में महात्मा गांधी की राजनीतिक विरासत पर हक़ जताने के संघर्ष के साथ आरम्भ  हुआ| दिन व्यतीत होते होते महात्मा गांधी की जयन्ती एक राजनीतिक सन्देश के साथ आगे बढी| परन्तु एक बड़ा प्रश्न किसान क्रान्ति यात्रा और उसके साथ पुलिस के टकराव को लेकर खड़ा हो गया जो हमें कुछ तो संकेत करता है|

पिछले चार वर्षों में जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता संभाल रही है यह पहला अवसर नहीं है जब किसानों ने  अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन  किया है या फिर देश के किसी हिस्से में यात्रा  निकाली है| परन्तु केंद्र सरकार की जो प्रतिक्रिया ऐसे प्रदर्शनों को लेकर रहती है उससे  यही निष्कर्ष निकलता है कि केंद्र सरकार किसानों के मुद्दे पर किसी स्पष्ट रणनीति के साथ काम करती नहीं दिखती |

केंद्र सरकार ऐसे मुद्दों पर बड़ा सतही रवैया अपनाती दिखती है और ऐसे विषयों को तब तक गंभीरता से नहीं लेती जब तक उसे इन मांगों या प्रदर्शनों में कोई राजनीतिक नुकसान होता नहीं दिखता | किसानों के ऐसे प्रदर्शनों या यात्राओं के बाद भी यदि सत्ताधारी पार्टी को चुनावों में सफलता मिल जाती है तो पार्टी ऐसे मुद्दों से निश्चिन्त हो जाती है और अगले किसी चुनाव में किसानों के मुद्दे पर किसी नुकसान को भांपकर ही इस विषय पर कुछ सक्रियता दिखाती प्रतीत होती है|

भारतीय जनता पार्टी के इस रवैये के चलते किसानों का मुद्दा और उनसे जुडा विषय तभी चर्चा में आता है जब देश में कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव होने वाला होता है और ऐसे अवसर पर भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लगता है कि देश के अन्य विपक्षी दल किसानों को उसके विरुद्ध इस्तेमाल कर रहे हैं और इसी कारण किसानों के आन्दोलनों को कभी कभी शहरी नक्सल तत्वों से प्रेरित और संचालित तक भाजपा की ओर से बता दिया जाता है|

परन्तु क्या वास्तव में देश में कृषि की स्थिति और इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की स्थिति इतनी संतोषजनक है कि उन्हें आन्दोलन करने की आवश्यकता नहीं है , धरातल पर स्थिति इससे पूरी तरह उलट है| पिछले दो ढाई दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी स्थितियां बनी हैं कि सरकारों ने  योजनाबद्ध तरीके से कृषि क्षेत्र को उपेक्षा की नजर से देखा है और पहले गेट समझौता और जो बाद में विश्व व्यापार संगठन बन गया उसके नियमों के अधीन सभी विकासशील देशों की कृषि व्यवस्था को ध्वस्त कर उसे बड़े कारपोरेट हाथों में सौंपने का आधार बनाया जाने लगा और भारत में किसानों की मूलभूत समस्या उनका उत्पादन और उनके उत्पादन के लिए देश और विदेश में बाजार मोहैया कराने और विश्व व्यापार संगठन के नियमों को अपने किसानों के अनुकूल करने के लिए आवश्यक दबाव या प्रयास किसी भी सरकार की ओर से नहीं किया जाता है, एक ओर जहां बड़े पश्चिमी देश अपने किसानों को  सरकारी संरक्षण देते हैं और उनके उत्पादन को विदेशी बाजारों में खपाने के लिए अपने निर्यात को बढाने के लिए हर स्तर पर आवश्यक दबाव बनाते हैं तो वहीं भारत में नीतिगत स्तर पर यह निर्णय ही  नहीं लिया जाता कि देश की विदेश नीति, रक्षा नीति की तरह कृषि क्षेत्र को भी हर संभव सहयोग दिया जाए और देश में किसानों को सुविधाएं प्रदान की जाएँ कि वे उत्पादन करें और फिर उनके उत्पाद को घरेलू और विदेशी बाजारों में खपाया जाए|

नीतिगत स्तर पर यह कठिन नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि देश के नीतिनिर्धारक इस समाधान के बारे में परिचित नहीं हैं पर असली समस्या है इस समाधान को रोकना |

अंग्रेजों ने जब भारत पर अधिकार किया तो उनकी पहली नजर भारत में सदियों से चली आ रही ग्रामीण स्वावलंबी अर्थव्यवस्था पर पडी और इस स्वावलंबी व्यवस्था में जिस प्रकार गाँव स्वयं में एक पूरी इकाई था उसे तोड़े बिना न तो उन्हें अपने उपनिवेश के लिए सस्ते  मजदूर मिल सकते थे और न ही भारत में देशी हुनर को समाप्त किये बिना विदेशी कम्पनियों में बनने वाले उत्पाद से भारत को पाटा जा सकता था और यही कारण है कि 1853 से पहले अत्यंत प्राचीन काल से भारत एक प्रमुख निर्यातक देश था जिसे योजनाबद्ध तरीके से एक आयातक देश में बदल दिया गया और देश की आजादी के बाद भी यही व्यवस्था चलती आ रही है जिसमें शहरों को विकसित करने के लिए और शहरों में सस्ते मजदूर उपलब्ध कराने के लिए कृषि व्यवस्था और गांवों को कमजोर किया जाता है ताकि किसान उतना  ही उत्पादन करे जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक है और शेष समय वह शहर में जाकर मजदूरी करे |

वर्तमान सरकार ने जब से केंद्र में सत्ता संभाली है इसने चुनावों को जीतना और इसके लिए संसाधन एकत्र करने में ही अपनी अधिक शक्ति लगाई है जिसका परिणाम है कि धनपशु लोगों के हितों के विपरीत कोई भी निर्णय ले पाना या ऐसी नीति का निर्माण करना जो धनपशुओं के  हितों के विपरीत हो इस सरकार के लिए संभव नहीं है और यही कारण है कि किसानों को बार बार  अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है और पुलिस से टकराव लेना पड़ता है|