क्या होगा राजनीति का भविष्य ?

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मैंने मोटे तौर पर इतिहास में पीछे जाकर कुछ पन्ने पलटे और उस आधार पर भविष्य को समझने की कोशिश की | इस क्रम में मैंने पचीस वर्षों के कालखंड को पैमाना बनाया और विश्व में हुई उथल पुथल के आधार पर भारत की राजनीति को समझने की कोशिश की |

पहला काल खंड है 1939 से 1964- इस समय पूरे विश्व में जबरदस्त घटनाएँ हुईं | विश्व में वैचारिक आधार पर असमंजस की स्थिति थी | एक ओर कम्युनिज्म, फासिज्म और उपनिवेशवाद के विरुद्ध उभरता राष्ट्रवाद | इस कालखंड में भारत में कुछ भी उथल पुथल हुई पर इस पचीस वर्ष के कालखंड में भारत में राष्ट्रवाद केंद्र में रहा और सारे उथल पुथल और वैचारिक उठा पटक के बाद भी मध्यमार्गी विचार के साथ गांधीजी और नेहरू जी ने पूरे कालखंड को प्रभावित किया|

दूसरा कालखंड- 1964-1989- इस कालखंड में दुनिया में शीत युद्ध ने एक नया स्वरुप ग्रहण किया और कम्युनिष्ट विचारधारा ने एशिया में अपने पैर फैलाए और इस कालखंड में पूरी दुनिया कम्युनिष्ट विचारधारा के साये में रही , या तो उसके साथ रही या उसे हराने के रास्ते तलाशती रही | इस दौर में भारत की राजनीति में इंदिरा गांधी का वर्चस्व रहा ( 1984 से 1989 तक  राजीव गांधी का शासन भी इंदिरा गांधी के प्रभाव क्षेत्र में था) | इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए कम्युनिष्ट विचार की ओर झुकाव किया और यह काल भारत में भी कम्युनिष्ट प्रभाव का ही रहा |

तीसरा कालखंड 1989-2014- इस कालखंड का आरम्भ बर्लिन दीवार के पतन , सोवियत संघ के टूटने के साथ ही कम्युनिष्ट विचार के प्रभावहीन  होने के आरम्भ से  हुआ और इस पूरे काल में विश्व में एकध्रुवीय अमेरिकावाद , पूंजीवाद , वैश्वीकरण के नाम पर कारपोरेट शोषण और लोभ का कल्चर का आरंभ हुआ | भारत की राजनीति पर इस वैश्विक घटनाक्रम का असर यह हुआ कि भारत में हिंदूवादी राजनीति के साथ भारतीय राजनीति पर दक्षिणपंथी विचार केंद्र में आया और इस पूरे कालखंड में पूरी राजनीति में दक्षिणपंथ उसी प्रकार हावी रहा जिस प्रकार जिस प्रकार 1964 से 1989 तक कम्युनिज्म हावी था|

अब चौथा कालखंड 2016 से आरम्भ हो चुका है और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने और भारत में विमुद्रीकरण की घटना ऐतिहासिक घटना है | इस दोनों ही  घटनाओं के आधार पर भले ही ऐसा प्रतीत होता हो कि अब गैर इस्लामवाद दुनिया की राजनीति के केंद्र में है और व्यक्ति आधारित राजनीति का ही भविष्य है  पर इतिहास से यदि सीख ली जाये तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस बार के  कालखंड में  जनकल्याणवाद , आध्यात्म प्रेरित राजनीति और अन्तःकरण की शुद्धता के विचार के आधार पर लोग एकजुट होंगे और विचारधारा , वादों की कटुता , पाखंडी धार्मिक विचार पीछे छूट जायेंगे |

क्योंकि कम्युनिज्म ने यदि धर्म और आस्था को सार्वजनिक या व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह नकार दिया तो पूंजीवाद और  दक्षिणपंथी राजनीति ने धर्म के पाखण्ड और कटु  साम्प्रदायिक स्वरुप को ही अपनी राजनीतिक पूंजी बना ली और कारपोरेट के हाथों का खिलोना बन गयी |

वर्तमान स्थिति में विश्व की जो स्थिति है उसमें संकीर्ण राष्ट्रवाद , सैन्य राष्ट्रवाद, नस्लवाद , फासीवाद , कम्युनिज्म, इस्लामवाद  फिर से लौट नहीं सकते क्योंकि बीते एक शताब्दी में मानव सभ्यता ने इससे लड़ाई लड़ी है क्योंकि ये सभी विचार व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरोधी हैं और एक संस्थागत व्यवस्था से अपने विचार को दूसरों पर थोपने का प्रयास करते हैं, परन्तु पूंजीवाद और धर्म  के पाखण्ड के  गठजोड़ ने आस्था के दुरूपयोग से  बीते पचीस वर्षों में एक भ्रष्ट व्यवस्था को आगे बढाया है| अब सभी पुरानी विचारधारा से बंधे लोग अपनी स्वतंत्रता को पाने का प्रयास करेंगे और मिलजुलकर पाखण्ड और छद्म विचारधाराओं  से विद्रोह कर एक  विचाराधारामुक्त जनकल्याणवादी आध्यात्मिक सूत्र से प्रेरित शुद्ध अन्तःकरण की राजनीति की ओर जायेंगे जहाँ कि समाज के वे वर्ग जो अब तक सत्ता से वंचित हैं अपनी हिस्सेदारी के लिए सामने आयेंगे और जो सत्ता और शक्ति का उपभोग कर चुके लोगों को छोड़कर नए वर्गों की आकांशा पूरी करेगा वही जननायक होगा  |  परन्तु अब जनक्रांति हिंसक नहीं लोगों के मन में होगी और वैचारिक परिवर्तन लायेगी |