गांधी और अम्बेडकर भाग२

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गांधी और अम्बेडकर के आपसी सम्बन्ध और टकराव – गांधी के साथ अपने संबंधों और विशेष रूप से उनके और कांग्रेस के द्वारा अछूतों के सम्बन्ध में किये गए प्रयासों और उन पर अपनी टिप्पणी के साथ 1945 में डा० अम्बेडकर ने  एक पुस्तक प्रकाशित की “ What Congress and Gandhi have done to untouchables “ | इस पुस्तक में अत्यंत विस्तार से वर्ष 1917 से 1945 तक के राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर अछूतों के सम्बन्ध में कांग्रेस के प्रयासों की समीक्षा की गयी है| इस पुस्तक के सभी आयामों को यहाँ प्रस्तुत कर पाना संभव नहीं हो सकता |

अपनी पुस्तक में डा० अम्बेडकर ने वर्ष 1917 में ब्रिटिश संसद में सेक्रेटरी स्टेट फार इंडिया मोंटेग्यू द्वारा ब्रिटिश इंडिया में सीमित आधार पर स्वशासन की दिशा में किये जाने वाले प्रयास की घोषणा के बाद भारत में होने वाली राजनीतिक हलचल के संदर्भ से अपना आरम्भ किया है और 1917 में हुए कांग्रेस अधिवेशन में अछूतों के लिए पारित किये गए प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि 1895 के बाद पहली बार कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में सामाजिक सुधार को लेकर कोई प्रस्ताव पारित किया , इसके ऐतिहासिक कारण की चर्चा करने के बाद कि कांग्रेस की स्थापना के साथ ही सोशल कांफ्रेंस को कांग्रेस का सामाजिक आयाम दर्जा दिया गया और अनेक वर्षों तक दोनों के अधिवेशन भी साथ साथ होते रहे और प्रस्ताव भी साथ ही पारित हुए परन्तु 1895 के बाद कांग्रेस ने स्वयं को पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों पर केन्द्रित कर लिया और वर्ष 1917 में जब मोंटेग्यू सुधार के द्वारा भारतीय प्रतिनिधियों के चुनाव का अवसर उत्पन्न हुआ तो कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न स्वयं को भारत में सबसे बड़ा और सबका प्रतिनिधि दिखाने का खड़ा हुआ और इस क्रम में पहले मुस्लिम लीग के साथ 1916 में  लखनऊ पैक्ट हुआ और फिर उस पैक्ट को समर्थन देने के लिए अछूतों के संगठन ने इस समस्या के प्रति जागरूक होने की शर्त कांग्रेस के समक्ष रखी और उसी जागरूकता का परिणाम रहा कि कांग्रेस ने करीब दो दशक के बाद सामाजिक सुधार को अपने एजेंडे में शामिल किया |

इस पुस्तक के दूसरे अध्याय में डा० अम्बेडकर ने 1919 में भारत की राजनीति और कांग्रेस पर पूरी तरह गांधी के छा जाने की भूमिका की चर्चा करते हुए , अछूतों की समस्या पर गांधी की इच्छाशक्ति को पहली चुनौती देते हुए उनके प्रयासों पर शंका के बादल खड़े किये हैं|

अपनी पुस्तक में अत्यंत विस्तार से 1922 में बारदोली में सम्पन्न हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पारित हुए प्रस्तावों का उल्लेख उन्होंने किया है जिसके अनुसार असहयोग आन्दोलन , सविनय अवज्ञा आन्दोलन के साथ तिलक स्वराज कोष की स्थापना की गयी जिसका उद्देश्य पूरे देश से  1करोड़ रूपये एकत्र करना था जिसका उपयोग कांग्रेस के जनाधार को मजबूत करने और अधिक लोगों तक स्वराज का सन्देश ले जाने के लिए कांग्रेस की मशीनरी को चुस्त दुरुस्त करना था  और इसके साथ इस कार्यसमिति में अनेक रचनात्मक कार्यक्रम की योजना भी निर्मित हुई जिसे “बारदोली कार्यक्रम” कहा गया और इस कार्यक्रम में अछूतों के लिए बेहतर जीवन उपलब्ध कराने के प्रयास के अंतर्गत उनकी सामाजिक, मानसिक और नैतिक स्थिति में सुधार के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता अनुभव करते हुए उनके बच्चों को राष्ट्रीय स्कूलों में शिक्षा के लिए प्रेरित करते हुए उन्हें अन्य नागरिकों की तरह समान सुविधाएं प्रदान कराने के लिए प्रयास की आवश्यकता अनुभव करते हुए इसके लिए प्रयास करने का आग्रह हुआ|

बारदोली कार्यक्रम के प्रस्ताव को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा पारित किया गया और कार्यसमिति के समक्ष इसके क्रियान्वयन के लिए इसे रखा गया और बारदोली कार्यक्रम के अछूतों के हिस्से के लिए एक अलग समिति गठित की गयी और स्वामी श्रद्धानंद , सरोजिनी नायडू, आई. के , याग्निक और जी बी देशपांडे को इस समिति की जिम्मेदारी दी गयी | इस प्रस्ताव के अनुसार देश भर में अछूतों की स्थिति में सुधार के लिए कुल दो लाख रूपये निर्धारित किये गए| इस कार्यसमिति का प्रस्ताव अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के लखनऊ अधिवेशन में इसे स्वीकार कर लिया गया परन्तु इसमें एक संशोधन करते हुए अछूतों के लिए जमा की जाने वाली राशि को बढ़ाकर पांच लाख कर दिया गया| परन्तु इस समिति के कार्य आरम्भ करने के पूर्व इसके एक सदस्य स्वामी श्रद्धानंद ने अपना त्यागपत्र दे दिया और उनका त्यागपत्र स्वीकार करते हुए उनके स्थान पर गंगाधर राव बी देशपांडे को अछूतों के लिए गठित उपसमिति का संयोजक नियुक्त कर दिया गया |

डा० अम्बेडकर ने बारदोली कार्यक्रम के अंतर्गत अछूतों को लेकर किये गए संकल्प की गंभीरता पर सवाल उठाये हैं और स्वामी श्रद्धानंद के उपसमिति से हटने को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए  उनका आकलन है कि देश भर में अछूतों की संख्या को देखते हुए गंभीरतापूर्वक उनकी स्थिति में सुधार के लिए किसी भी प्रयास के लिए पांच लाख की राशि काफी कम थी और इस राशि के लिए भी स्वामी श्रद्धानंद को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था  और  इस कार्य के लिए तिलक स्वराज फंड से कम राशि का आवंटन एक वास्तविकता थी जिसका विषय स्वामी श्रद्धानंद ने उठाया और चूंकि स्वामी श्रद्धानंद आर्य समाज पृष्ठभूमि से थे और अछूतों के विषय को लेकर वास्तव में परिणामकारक प्रयास कर रहे थे तो इसी कारण उन्हें बारदोली संकल्प की अछूतों की उपसमिति से हटा दिया गया   और फिर  बारदोली कार्यक्रम के दो वर्ष के उपरान्त बंबई में आयोजित 1923  की कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पारित प्रस्ताव में “ अछूतों की समस्या में कुछ सुधार के लिए कांग्रेस के प्रयासों की सराहना करते हुए इस दिशा में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा से अधिक प्रयास का आग्रह किया गया”|

दूसरे शब्दों में एक बार फिर कांग्रेस ने सामाजिक विषय से अपना पल्ला झाड़ लिया और अछूतों के विषय को धार्मिक मानते हुए हिन्दू महासभा से इस विषय में विशेष प्रयास करने का अनुरोध किया |  

स्वामी श्रद्धानंद की सराहना करते हुए डा० अम्बेडकर का मानना था कि स्वामी जी उन हिन्दू संतों में से थे जो ह्रदय से हिन्दू समाज व्यवस्था में सुधार के लिए प्रयासरत थे और उनके स्थान पर देशपांडे को अछूतों के लिए उपसमिति का संयोजक नियुक्त करना यह प्रमाणित करता है कि कांग्रेस अछूतों के विषय पर गंभीरता से सामाजिक सुधार की दिशा में प्रयासरत नहीं थी और इसी कारण  1923 में अछूतों के विषय को हिन्दू महासभा की ओर धकेल कर कांग्रेस ने अपनी जान छुड़ा ली |

अपनी पुस्तक के दूसरे अध्याय में डा० अम्बेडकर ने 1921 से  तिलक स्वराज कोष के अंतर्गत एकत्र किये गए धन और उसके खर्च का ब्योरा देते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कुल एक करोड़ रूपये का अपने अनुसार उपयोग हुआ और इस कारण यह तर्क स्वीकार करना कठिन है कि कांग्रेस के पास धन का अभाव था और इस कारण अछूतों के लिए कार्य्रकम की उपसमिति को कम धन उपलब्ध कराया गया और यही नहीं तो आगे चलकर इस कार्यक्रम को शिथिल कर दिया गया , डा० अम्बेडकर इस उपसमिति को कम धन उपलब्ध कराने और हिन्दू समाज संरचना में सुधार के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति स्वामी श्रद्धानंद को इस समिति से हटाकर इस विषय में कोई जानकारी या रूचि न रखने वाले व्यक्ति देशपाण्डे को इसका संयोजक नियुक्त करने की घटना को कांग्रेस और गांधी का एक सुनियोजित प्रयास मानते हैं जो अछूतों के प्रति उनकी सही भावना को व्यक्त करता है जो इसके लिए कदापि गंभीर नहीं हैं और देश में स्वशासन की दिशा में बढ़ रहे प्रयासों के मध्य अछूतों की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को देखते हुए कांग्रेस प्रस्तावों और प्रचार से स्वयं को अछूतों का हितैषी सिद्ध करने का प्रयास कर रही है|

इसी वर्ष कांग्रेस का सदस्य बनने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें रखीं गयीं और डा० अम्बेडकर ने गांधी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे कांग्रेस की सदस्यता की अनिवार्य शर्त में रूप में अछूत परम्परा का त्याग करने और अपने घर में सेवक के रूप में अछूत को रखने को भी इन अनिवार्य शर्तों में रख दें , परन्तु गांधी अछूत समस्या को एक सामाजिक और धार्मिक विषय बताते रहे| बारदोली कार्यक्रम में अछूतों को  लेकर रचनात्मक कार्यक्रम के ढील ढाले रवैये के बाद कांग्रेस सदस्यता के लिए अछूत परम्परा के त्याग को अनिवार्य शर्त बनाने के प्रस्ताव पर गांधी के मौन से डा० अम्बेडकर को उनकी नीयत पर शंका होने लगी |  

अपनी पुस्तक के तीसरे अध्याय में डा० अम्बेडकर ने सबसे चर्चित और रोचक विषय गोलमेज सम्मलेन और  उसके बाद के अध्यायों में  पूना पैक्ट  का उल्लेख किया है|   

डा० अम्बेडकर ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए उन परिस्थितियों और घटनाक्रम का उल्लेख किया है जिसमें गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुआ | गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट 1919 के अंतर्गत एक व्यवस्था थी जिसके अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य को  इस एक्ट के दस वर्ष पूरे होने के बाद एक शाही आयोग की नियुक्ति करनी  थी जो संविधान के कार्यकलाप की जाँच करते हुए इसमें आवश्यक सुधारों की सलाह देता| इस व्यवस्था के अनुरूप 1928 में एक शाही आयोग की नियुक्ति की गयी और जान साइमन की अध्यक्षता में यह आयोग बना , भारत के लोगों को  यह आशा थी कि इस आयोग में भारत के लोगों को भी शामिल किया जाएगा परन्तु तत्कालीन सेक्रेटरी स्टेट फार इंडिया बर्केन्हेड ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और इसे एक संसदीय आयोग के रूप में रखने का निर्णय किया और इस निर्णय का भारत में भारी विरोध हुआ और साइमन कमीशन का विरोध हुआ जिसके चलते ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से निर्णय लिया गया कि साइमन कमीशन के कार्य की समाप्ति के बाद भारत के नए संविधान के लिए होने वाली चर्चा में  भारत के प्रतिनिधियों को  शामिल किया जाएगा |इसी घोषणा के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य ने लन्दन में एक गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया |

12 नवम्बर 1930 को ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने आधिकारिक रूप से भारतीय गोलमेज सम्मेलन का उद्घाटन किया | डा० अम्बेडकर ने इस सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण घटना की संज्ञा दी है और उनके अनुसार यह भारत के नए संविधान के निर्माण की दिशा में और नए संविधान में देश में अछूतों की स्थिति के लिए ऐतिहासिक अवसर था| ऐसा पहली बार हुआ जब अछूतों को अलग से प्रतिनिधित्व मिला और डा० अम्बेडकर के साथ दीवान बहादुर आर श्रीनिवासन इस सम्मेलन में उनके प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए |

गोलमेज सम्मेलन में कुल नौ समितियां बनायी गयीं और इसमें एक समिति अल्पसंख्यक थी जिसे अल्पसंख्यक समस्या के समाधान का मार्ग खोजना था |

गोलमेज सम्मलेन की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए डा० अम्बेडकर ने तत्कालीन कांग्रेस और अछूत विषय पर उनकी भूमिका को लेकर उभरे अविश्वास और इस दिशा में उनके प्रयासों की गंभीरता को लेकर डा० अम्बेडकर के मन में उमड़ रहे प्रश्नों का तथ्यात्मक कारण उन्होंने बताया है|

1919 में मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड संविधान सुधार के माध्यम से अछूतों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता बतायी गयी थी, परन्तु उन्हें एक मामूली प्रतिनिधित्व देने के अतिरिक्त कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ |

इसी के चलते डा० अम्बेडकर ने गोलमेज सम्मेलन में भारत के नए संविधान में अछूतों की स्थिति और उनके संरक्षण के लिए एक ज्ञापन प्रस्तुत किया और इसमें नए संविधान में अछूतों के लिए ( जिन्हें इस ज्ञापन में Depressed Class  कहा गया है) समान नागरिकता, मौलिक अधिकार ,  समान अधिकारों के स्वतंत्र उपभोग का अधिकार, अछूतों के सामाजिक बहिष्कार से उनका संरक्षण और सामाजिक बहिष्कार को दण्डित करना , भेदभाव से संरक्षण , विधायिका में पर्याप्त प्रतिनिधित्व , सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग की गयी  |

गोलमेज सम्मेलन के प्रस्तावों को पारित कर दिया गया परन्तु इनमें सहमति नहीं बन सकी थी , परन्तु इस सम्मेलन से यह तथ्य स्थापित हो चुका था कि संवैधानिक और राजनीतिक कारणों से अछूत एक अलग इकाई बन चुके थे और प्रथम गोलमेज सम्मेलन में डा० अम्बेडकर द्वारा अछूतों के लिए सुझाये गए प्रावधानों के आधार पर ही स्वतंत्र भारत के संविधान में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए अनेक प्रावधान शामिल किये गए और भारत आधुनिक संदर्भ में  एक प्रगतिशील व सामाजिक रूप से समरस समाज बनकर उभरा , परन्तु गोलमेज सम्मेलन के द्वितीय सत्र में जब कांग्रेस की ओर से गांधी ने इसमें प्रतिनिधित्व किया तो डा० अम्बेडकर के प्रस्तावों और सुझावों पर गांधी की प्रतिक्रिया और असहयोग ने इन दोनों  के मध्य अविश्वास को तो बढ़ाया ही , भारत में हिन्दू समाज की सामाजिक संरचना में सुधार के सामाजिक और राजनीतिक प्रयासों को और तेजी से गति देने का अवसर भी चूक गया ताकि भारत की स्वतंत्रता से पूर्व यह समन्वय एक आकार लेता और जातिगत असमानता के साथ हिन्दू धर्म को लांक्षित करने के बौद्धिक प्रयासों और छलावे को अधिक अवसर प्राप्त न हो पाता|

गोलमेज सम्मेलन के द्वितीय सत्र के वातावरण और उसकी कार्यवाही का जो विवरण डा० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में उपलब्ध कराया है वह निश्चित रूप से गांधी को लेकर अनेक सवाल खड़े करता है कि आखिर उन्होंने डा० अम्बेडकर के उन प्रयासों का सहयोग क्यों नहीं किया जिसके चलते मुस्लिम साम्प्रदायिक जिद का सामना किया जा सकता था , इस सम्मेलन के वातावरण और कार्यवाही के विवरण से यह रहस्य एक प्रश्न बनकर उपस्थित होता है कि आखिर गांधी ने उस राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय क्यों नहीं दिया जिसके चलते मुस्लिम साम्प्रदायिक ब्लैकमेल से बचा जा सकता था और एक मजबूत हिन्दू शक्ति स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीयता की परिभाषा निर्धारित कर सकती थी और देश में अनेक विमर्श और संदर्भ को निरर्थक सिद्ध किया जा सकता था |

गोलमेज सम्मेलन के प्रथम सत्र का कांग्रेस ने बहिष्कार किया था , पंरतु प्रथम सत्र में अनेक दूरगामी प्रभाव के प्रस्तावों पर विचार हुआ और इस सत्र में डा० अम्बेडकर एक दूरदर्शी , संविधान वेत्ता और अछूतों से नेता से अधिक एक व्यापक दृष्टि वाले विद्वान राजनेता के रूप में लोगों के सामने आये और इस सम्मेलन में उनकी सक्रियता और उत्सुकता ने गांधी को भी गोलमेज सम्मेलन के द्वितीय सत्र से पूर्व डा० अम्बेडकर से मुलाकात के लिए विवश किया और गांधी ने इरविन से समझौते के बाद गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने का निर्णय लिया |

गोलमेज सम्मेलन के प्रथम सत्र में कांग्रेस के शामिल न होने के निर्णय को व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता भी है| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूरे इतिहास को देखते हुए और इसके पटल पर गांधी के अवतरित होने के अनेक पहलुओं को स्पर्श करते हुए इस पुस्तक में सदैव आग्रह रहा है कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में गांधी एक यथास्थितिवादी नेता के रूप में तत्कालीन विश्व व्यवस्था में चल रही उठा पटक में न्यूनतम विद्रोह के साथ न्यूनतम क्रांतिकारी आन्दोलन के प्रणेता थे , जिन्होंने कम्युनिज्म और मजदूर आन्दोलन को  साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विकल्प के रूप में उभरने से रोक तो रखा ही था और अपने असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन से सशत्र क्रांति के बिना भी ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त होने का दिलासा भारत के लोगों को दिला रखा था |

जब साइमन कमीशन भारत में आया और उसके बाद जब प्रथम गोलमेज सम्मेलन लन्दन में आयोजित हुआ तो उस समय भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन की ओर देशवासियों का रुख तेजी से बढ़ रहा था और सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद , बटुकेश्वर दत्त तेजी से देश के युवाओं को प्रभावित कर रहे थे और कांग्रेस में भी सुभाष चन्द्र बोस गांधी के तरीके को वैचारिक आधार पर चुनौती दे रहे थे और क्रांतिकारी आन्दोलन और कांग्रेस का युवा धड़ा तेजी से समतामूलक साम्यवादी सामाजिक और आर्थिक दर्शन के अनुकूल नए राजनीतिक और आर्थिक दर्शन की तलाश में था और इस उथल पुथल के काल में गांधी एक यथास्थितिवादी राजनेता थे जिन्होंने एक आध्यात्मिक आवरण में राजनीति को समाहित करते हुए आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर यथास्थिति को बनाये रखने के लिए भारत के मानस में स्थित आध्यात्मिक चेतना का राजनीतिक उपयोग करते हुए किसी भी स्तर पर क्रांति को व्यापक स्वरुप ग्रहण करने से रोक दिया और इसी कारण उनके समकालीन  क्रांतिकारी  विचारक या नेताओं को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा चाहे सावरकर हों, सुभाष चन्द्र बोस हो, सरदार भगत सिंह हों या फिर डा० अम्बेडकर हों|

गोलमेज सम्मेलन के द्वितीय सत्र के अनुभवों ने डा० अम्बेडकर को इस बात के लिए विवश किया कि उन्होंने गांधी पर काफी कड़ी टिप्पणियाँ अपनी पुस्तक में की हैं| डा० अम्बेडकर ने गांधी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने सुनियोजित ढंग से इस सम्मेलन को असफल किया और उन्होंने ओछी मानसिकता का परिचय दिया और कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य प्रतिनिधियों का अपमान किया और गांधी इस सम्मेलन में देश को जोड़ने वाले प्रतिनिधि के स्थान पर एक अयोग्य व्यक्ति सिद्ध हुए|

डा० अम्बेडकर ने गांधी के बारे में ऐसे विचार क्यों व्यक्त किये , इसकी भूमिका जान लेनी भी आवश्यक है| गोलमेज सम्मेलन के द्वितीय सत्र में संघीय ढांचा समिति के समक्ष 15 सितम्बर 1931 के अपने भाषण में गांधी ने अछूतों के बारे में अपने विचार व्यक्त किये  , “ कांग्रेस ने अपने आरम्भ काल से ही तथाकथित “ अछूतों” के विषय को लिया है और एक समय था जब कांग्रेस में सोशल कांफ्रेंस का सत्र भी साथ होता था जिसके लिए स्वर्गीय रानाडे ने अपनी ऊर्जा लगायी| उनकी अध्यक्षता में सोशल कांफ्रेंस ने “ अछूतों” के सुधार के लिए अनेक प्रयास किये |परन्तु 1920 में कांग्रेस ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया और अश्पृश्यता को समाप्त करने के विषय को राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया| जिस प्रकार कांग्रेस हिन्दू मुस्लिम एकता को ध्यान में रखती है उसी प्रकार सभी समुदायों में एकता स्वराज की प्राप्ति की आवश्यक शर्त है और इसी कारण अश्पृश्यता का निवारण भी पूर्ण स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है| कांग्रेस ने 1920 में जो स्थिति ग्रहण की थी उस पर अब तक कायम है और इस दिशा में आरम्भ से कार्य किया है और इस कारण यह वास्तव में और सही अर्थों में राष्ट्रीय है” |

डा० अम्बेडकर ने 1920 में कांग्रेस के इस प्रयास और संकल्प की गंभीरता को चुनौती देते हुए एक बार फिर 1922 के बारदोली प्रस्ताव में अछूतों के लिए कार्यक्रम को सही रूप में लागू न करने और फिर इस विषय को हिन्दू महासभा के हावाले कर देने के तथ्य को गांधी के भाषण और व्यवहार में अन्तर के रूप में प्रस्तुत किया है| गोलमेज सम्मेलन की कार्यवाही का जिक्र करते हुए डा० अम्बेडकर ने 17 सितम्बर 1931 की कार्यवाही का उल्लेख किया है जब पहली बार अलग अलग वर्गों के संवैधानिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न विचार के लिए आया तो गांधी ने स्पष्ट शब्दों में हिन्दू मुस्लिम सिक्ख की भांति अछूतों के लिए किसी विशेष प्रावधान के प्रस्ताव पर विचार करने से इन्कार के साथ ही इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही|

डा० अम्बेडकर ने अल्पसंख्यक समिति के समक्ष गांधी के व्यवहार की चर्चा करते हुए लिखा है कि गांधी का पूरा प्रयास अल्पसंख्यक मामले में अछूतों को अलग थलग करने का था और इसे हिन्दू मुस्लिम और सिक्ख तक सीमित रखने का था | इस पूरे सम्मेलन में गांधी और डा० अम्बेडकर के मध्य सत्र के दौरान गर्मागर्म बहस हुई और अंत में ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री राम्से मैकडोनाल्ड ने नवम्बर 1931 में एक अल्पसंख्यक समझौते का मसोदा रखा और इसमें “ अछूतों” को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता देते हुए उनके लिए भी प्रतिनिधित्व निर्धारित किया गया | इस प्रस्ताव के बाद गांधी ने आक्रोश से भरा काफी भावुक और लंबा भाषण दिया और उन्होंने “ अछूतों” को अलग इकाई के रूप में मान्यता देने के किसी भी प्रयास को हिन्दू धर्म में विभाजन का प्रयास बताया और डा० अम्बेडकर को इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार की ओर से नामित प्रतिनिधि बताया और भारत के समस्त अछूतों के नेता होने के उनके दावे पर सवाल खड़े करते हुए चुनौती दी कि अछूतों के असली नेता गांधी स्वयं हैं | परन्तु इस भाषण में गांधी ने एक बात कही जो कुछ अजीब लगती है उन्होंने कहा कि “ यदि अछूत अपना धर्म बदलकर मुस्लिम या ईसाई बन जाते हैं तो मुझे यह स्वीकार है ,परन्तु यदि हिन्दू धर्म के भीतर ही वे दो अलग अलग इकाई बन जाते हैं तो मुझे यह अस्वीकार है और जो लोग अछूतों के राजनीतिक अधिकारों की बात करते हैं वे भारत को नहीं समझते और भारत की समाज संरचना को नहीं समझते और इसलिए ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध मरते दम तक करूंगा चाहे ऐसा करने वाला मैं अकेला व्यक्ति साबित होऊं”

इस सम्मेलन ने स्वतंत्र भारत में भविष्य के लिए अनेक समस्याओं का आधार प्रदान कर दिया और हिन्दू धर्म और समाज में सुधार के राजनीतिक प्रयासों की पहल से एक सार्थक और सकारात्मक सन्देश का अवसर हाथ से निकल गया | इस पुस्तक के लेखक ने अनेक बार इस तथ्य को दुहराया है कि डा० अम्बेडकर और गांधी के मध्य आपसी सम्बन्ध और टकराव के आधार पर लेखक का अपना कोई निष्कर्ष नहीं है और यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इन घटनाओं के आधार पर क्या निष्कर्ष निकाल पाते हैं ? पंरतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि डा० अम्बेडकर ने 1927 में महाड सत्याग्रह किया और उसके बाद मंदिरों में अछूतों के प्रवेश और सार्वजनिक तालाबों या कुँओं पर अछूतों के पानी पीने के अधिकार को लेकर उनके प्रयास और सत्याग्रह का गांधी ने समर्थन नहीं किया और जब गोलमेज सम्मेलन में राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए पिछले अनेक दशकों से देश की राजनीति में अछूतों की राजनीतिक जागरूकता और उनके राजनीतिक नेतृत्व को नजरअंदाज करते हुए उन्हें एक उभरती हुई शक्ति के रूप में मान्यता नहीं दिया और डा० अम्बेडकर को अछूतों के नेता के रूप में या दूरदर्शी राजनेता के रूप में अमान्य करने में अपना पूरा जोर लगाया तो इसी असहयोग और उपेक्षा ने डा० अम्बेडकर को यह निष्कर्ष निकालने पर विवश किया होगा कि हिन्दू धर्म और समाज उनकी योग्यता और दूरदर्शी प्रयासों के बाद भी उन्हें स्वीकार करने या मान्यता देने को तैयार नहीं है और इसी कारण हिन्दू धर्म में उन्हें अपना और अपने लोगों का भविष्य अंधकारपूर्ण लगा और इन घटनाक्रमों ने उन्हें हिन्दू धर्म से बाहर जाने के उनके विचार को जन्म दिया और उन्होंने 1935 में अपने जीवन काल में हिन्दू धर्म त्याग देने की घोषणा की  |

यह निष्कर्ष भविष्य में हुए घटनाक्रमों से और प्रमाणित हो जाता है कि जब गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधि किसी निष्कर्ष पर नहीं आ सके तो सम्मेलन की ओर से यह सर्वसम्मत निर्णय लिया गया कि समिति के अध्यक्ष के रूप में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड जो भी निर्णय लेंगे वह सभी पक्षों को स्वीकार होगा और जब मैकडोनाल्ड ने अछूतों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र और दोहरे मताधिकार की व्यवस्था कर दी तो इसके विरोध में गांधी ने आमरण अनशन किया पंरतु कुल मिलाकर आमरण अनशन को समाप्त करने के लिए जो समझौता हुआ उसका तकनीकी पक्ष कुछ भी रहा हो पंरतु दो बातें इससे प्रमाणित हो गयीं कि भारत की राजनीति में अछूत एक शक्ति हो गए थे और डा० अम्बेडकर उनके नेता थे | कांग्रेस ने और गांधी ने इस तथ्य को झुठलाने का प्रयास किया और डा० अम्बेडकर को स्वाधीनता आन्दोलन में एक रचनात्मक पात्र के रूप में नहीं चित्रित किया परन्तु गोलमेज सम्मेलन के प्रथम सत्र से ही उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए सुझावों और कार्यक्रमों के आधार पर ही भारत के राजनीतिक और संविधानिक अधिकार की भूमिका बनती गयी और इस कारण यह प्रश्न गांधी और कांग्रेस को लेकर उठना स्वाभाविक है कि उन्होंने डा० अम्बेडकर को समायोजित करने का प्रयास क्यों नहीं किया जबकि उन्हें समायोजित करते हुए और आवश्यक मान्यता देते हुए अनेक ऐतिहासिक प्रश्नों और विमर्शों का सहज समाधान किया जा सकता था |