गांधी और अम्बेडकर- भाग १

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मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता है और जो आधुनिक भारत के इतिहास में एक पैगम्बर का दर्जा सा प्राप्त कर चुके हैं और गांधी को महात्मा के रूप में स्वीकार करने का जो दबाव और आग्रह लोगों के मन मस्तिष्क पर रहता है उसके चलते उनका वस्तुनिष्ठ ( Objective) आकलन कर पाना किसी के लिए भी  एक कठिन कार्य सिद्ध होता है और ऐसे में गांधी और अम्बेडकर के मध्य जो सम्बन्ध रहा उसके सभी पहलुओं की जांच करते हुए उसके निष्कर्ष निकाल पाना कि कौन सही और कौन गलत था, अत्यंत दुष्कर  कार्य है और इसीलिये इस अध्याय में लेखक की ओर से कोई निष्कर्ष निकालने की चेष्टा नहीं की गयी है कि गांधी और अम्बेडकर के आपसी संबंधों में कौन सही या कौन गलत है , बल्कि परिस्थितियों और तात्कालिक राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों के आकलन से यह देखने का प्रयास किया गया है  कि दोनों में कौन अपने उद्देश्य और आदर्शों के लिए अधिक प्रतिबद्ध था ?

मोहनदास करमचंद गांधी के एक अधिवक्ता से लेकर  दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध सत्याग्रह करते हुए अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए अहिंसक रूप से राज्य को अपने अनुकूल झुका लेने के सफल प्रयोग के बाद  आन्दोलनकारी के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने तक उनके जीवन का एक चरण रहा , पंरतु प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे भारत में ही रहे और अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है कि गांधी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के  लिए सैनिकों की भर्ती के लिए अभियान का हिस्सा भी  रहे थे |

जिन दिनों भारतीय राजनीति में गांधी का प्रवेश हुआ वह अनेक अर्थों में, अनेक स्तरों पर विचारधाराओं के संक्रमण का काल था, यूरोप अपने आतंरिक संघर्षों और युद्धों की एक नयी विभीषिका  प्रथम विश्व युद्ध का सामना कर चुका था, रूस में बोल्शेविक क्रांति ने मार्क्सवादी कम्युनिष्ट विचारधारा को पूंजीवादी  शोषण  और औद्योगिक क्रांति से सशक्त हुई  लोभ आधारित साम्राज्यवादी विचारधारा के विरुद्ध एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में मजदूरों और कामगारों में मध्य स्थापित कर दिया था , इसी के साथ प्रथम विश्व युद्ध के परिणामस्वरुप तुर्की में सदियों पुरानी खिलाफत संस्था के ध्वस्त होने से जिहाद और क्रूसेड की मध्यकालीन स्मृतियाँ डरा रही थीं और नए स्वरुप में ईसाई व मुस्लिम संघर्ष की भूमिका भी तैयार हो रही थी, यूरोप में विचारधाराओं का परस्पर टकराव किसी भी नयी व्यवस्था को स्वरुप ग्रहण नहीं करने दे रहा था और पश्चिमी विश्व को ही आधुनिकता का प्रतीक मानते हुए आधुनिकता, पश्चिमीकरण , परिष्कृत ईसाइयत और यूरोप के प्रबोधन काल में उत्पन्न राजनीतिक और सामाजिक विचारधाराओं की पृष्ठभूमि में इनके घालमेल से  परतंत्र भारत में एक असमंजस और गहरी निराशा का भाव व्याप्त था और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की अधीनता करते हुए उसकी नौकरी करने वाले मध्य वर्ग और कुलीन वर्ग के लोग या फिर रियासतों से जुड़े लोग ही आधुनिकता से परिचित थे और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य भी केवल कुलीन वर्ग, मध्य वर्ग और रियासतों से जुड़े लोगों तक ही आधुनिकता और विचारधारा का विमर्श जाने देना चाहता था ताकि उसके साम्राज्य के हितों को सुरक्षित रखने वाले वर्ग का निर्माण हो सके और उसका साम्राज्य और उसके व्यापारिक हित सुरक्षित रहें और क्रांतिकारी विचार और क्रांतिकारी अभियान से जुड़े लोग समाज की अगुवाई न कर सकें |

गांधी की विचारधारा और कार्यशैली ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के अधिक अनुकूल सिद्ध होने लगी क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने राज्य के विरुद्ध प्रतिकार की एक ऐसी शैली विकसित की थी जो ईसाइयत के आदर्शों के अनुकूल कष्ट सहन करते हुए सामने वाले को  ह्रदय परिवर्तन के लिए विवश करती थी और तब तक कष्ट सहन करने का आग्रह रखती थी जब तक सामने वाले का ह्रदय परिवर्तन न हो जाए | यह विचारधारा और कार्यशैली ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के अनुकूल और किसी भी क्रांतिकारी विचार या अभियान को कुंद करने के लिए पर्याप्त थी |

1857 में भारत में प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने जब भारत का शासन सीधे अपने हाथों में ले लिया तो उन्होंने कुछ बातों पर विशेष ध्यान दिया और वे थे, भारत को एक सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से विभाजित और असंगठित राष्ट्र के  रूप में सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से सिद्ध करने के लिए इसके प्रमुख शक्ति केन्द्रों को कमजोर करना और इस प्रयास में उन क्षेत्रों और लोगों को ब्रिटिश सेना से दूर रखा जाने लगा जो राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत थे और इसी के साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान , बलिदान के भाव से  प्रेरित और आधुनिक विचारों के प्रभाव में आकर पश्चिमी जगत के अनुरूप सामाजिक और राजनीतिक रूप से आधुनिक भारत के निर्माण का स्वप्न देखने वाले लोगों पर विशेष नजर रखते हुए उनके लिए विशेष प्रयास किये जाने लगे | इसी प्रयास के अंतर्गत राष्ट्रीय पुनर्जागरण के केंद्र बंगाल को विभाजित किया गया और शिवाजी के मराठा स्वाभिमान के संस्कारों में पले राष्ट्रीय स्वशासन के भाव को दबाने के लिए इस क्षेत्र से उभरने वाले क्रांतिकारियों और राजनेताओं को विचारधाराओं के जाल में उलझाया गया ताकि संयुक्त प्रतिकार का सामना ब्रिटिश साम्राज्य को न करना पड़े|

1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के क्षितिज पर गांधी के पदार्पण के साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य को तीन बड़ी समस्याओं का समाधान मिल गया| पहला, तुर्की में खिलाफत संस्था के ध्वस्त होने के बाद संयुक्त भारत (जिसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी था) के मुस्लिम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जिहाद नहीं छेड़ सके और उन्हें गांधी ने खिलाफत आन्दोलन में साथ ले लिया |

गांधी के सविनय अवज्ञा और असहयोग आन्दोलन से जिस जनांदोलन की भूमिका बनी उसके चलते देश के लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करने और स्वशासन की बात करने का मौक़ा मिल गया जिससे क्रांतिकारी संगठनों और उनके तरीके से आजादी प्राप्त करने बनाम  गांधीवादी तरीके से आजादी प्राप्त करने की बहस चल पड़ी और क्रांतिकारियों का दबाव ब्रिटिश साम्राज्य पर कम हो गया |

गांधी ने  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कुलीन वर्ग और मध्य वर्ग के दायरे से बढ़ाकर आम जनता तक ले जाने का निर्णय लिया और इस प्रयास में पूंजीवादी बनाम कम्युनिज्म बहस में शोषक और शोषित के ध्रुवीकरण के मध्य अब गांधी भी एक आवाज बनकर आ गए और बड़े पैमाने पर मजदूर और कामगार भी आजादी की मुहिम का हिस्सा बने तो कम्युनिज्म उनकी एकमात्र विचारधारा नहीं रही |

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के क्षितिज पर गांधी के पदार्पण की इस पृष्ठभूमि को यदि ध्यान में रखते हुए हम उनके और डा० अम्बेडकर के संबंधों का आगे आकलन करेंगे तो हमें इनके आपसी रिश्तों के अनेक पहलू सरलता से समझ में आ सकेंगे |

गांधी और अम्बेडकर के आपसी रिश्तों के उलझाव को समझने के लिए तात्कालिक विश्व राजनीति और भारत पर उसके प्रभाव के साथ इसके उन गैर राजनीतिक पहलुओं को भी समझना आवश्यक है जिनकी चर्चा आम तौर पर नहीं होती |

जिन परिस्थितियों में गांधी का पदार्पण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में हुआ था उससे पूर्व दो तीन गैर राजनीतिक परिवर्तन विश्व राजनीति पर प्रभाव डाल रहे थे, अमेरिका की क्रांति से न केवल ब्रिटिश उपनिवेश से अलग होकर एक शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य की स्थापना हो चुकी थी , वरन् इसने यूरोप से इतर एक नयी विचारधारा और व्यवस्था को जन्म देना भी आरम्भ कर दिया था, ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिस्पर्धा फ्रांस से भले हो रही थी और उनमें कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट ईसाई मत के विस्तार और आदर्शों के विस्तार की प्रतिस्पर्धा भी थी परन्तु दोनों ही और यहाँ तक कि रूस का आर्थोडाक्स चर्च भी ईसाई मत के कुछ मूल सिद्धांतों पर एकमत था , पंरतु संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना और फिर उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में अश्वेत गुलामी प्रथा के विरुद्ध हुए गृह युद्ध ने समस्त विश्व में एक नयी सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा का मार्ग प्रशस्त कर दिया था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राजनीतिक व्यवस्था में समान अधिकार और उपनिवेशवाद की शोषणवादी अर्थव्यवस्था के विकल्प में थियोसोफिकल सोसायटी और प्योरिटन विचारधारा भी राजनीति को आध्यात्म आधारित व्यवस्था का विकल्प दे रहे थे|

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में अमेरिका एक नयी व्यवस्था के विकल्प के रूप में लोगों को आकर्षित कर रहा था और एक नए विश्व के निर्माण का स्वप्न सभी की आखों में पल रहा था और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष एक बड़ी चुनौती भारत में अपने साम्राज्य और व्यापारिक हितों का पोषण करते हुए क्रांतिकारी सुधारों और विचारों से भारत को दूर रखना था  और इस क्रम में ब्रिटिश साम्राज्य ने ब्रिटिश भारत में और रियासतों में पनप रहे कुलीन वर्ग और मध्य वर्ग को कुछ राजनीतिक सुधारों से संतुष्ट करने की रणनीति अपनायी और इसी कारण 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में राजनीतिक सुधारों के माध्यम से कुलीन और मध्य वर्ग को राजनीतिक व्यवस्था और सत्ता में कुछ हद तक भागीदारी देकर सामाजिक सुधारों और समानता के अधिकार और विचार से अधिकाँश जनता को दूर रखने की रणनीति अपनाई और इसके लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी काफी हद तक इस रणनीति का सहयोगी बना लिया और यही कारण रहा कि महादेव गोविन्द रानाडे ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आस पास 1887 में  सोशल कांफ्रेंस नामक संगठन की स्थापना की और प्रार्थना समाज नामक अपने संगठन के माध्यम से भी हिन्दू समाज में सामाजिक सुधार के कार्यक्रम को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रम के साथ जोड़ दिया और अनेक वर्षों तक सोशल कांफ्रेंस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सामाजिक सुधार आयाम समझा जाता था, दोनों के अधिवेशन और प्रस्ताव साथ साथ होते थे परन्तु बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वयं को सोशल कांफ्रेंस से अलग कर लिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रमुख उद्देश्य राजनीतिक घोषित कर दिया गया और यह क्रम तब तक चलता रहा , जब  1909 में मोंटे मिर्लो सुधार और 1918 में  मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के अंतर्गत सीमित स्वशासन और सरकार निर्धारित की गयी और जब  केन्द्रीय विधानसभा और प्रांतीय विधानसभा में भारत के लोगों को प्रतिनिधित्व देने की बात आयी तो देश के विभिन्न वर्गों के अलग प्रतिनिधित्व की बातें उठायी गयीं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को देश के राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में सभी वर्गों से बातचीत करनी पड़ी तो इस दिशा में 1916 में लखनऊ समझौते के द्वारा मुस्लिम लीग के साथ मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर बात बनी और इसी समय देश में पहली बार अछूतों ने स्वयं के लिए भेई  अलग प्रतिनिधित्व की मांग उठायी और चूंकि  अछूतों को हिन्दू धर्म का अंग माना जाता था तो मुस्लिम और सिख की भांति हिन्दू धर्म से अलग समुदाय के रूप में उन्हें चिन्हित किये जाने से रोकने की आवश्यक शर्त थी  कि उनके प्रति हिन्दू समाज की धारणा में परिवर्तन आये और यह विषय राजा राममोहन राय के ब्रह्म समाज की विचारधारा , महादेव गोविन्द रानाडे के प्रार्थना समाज और रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद की वेदान्त की शिक्षाओं के माध्यम से उठा तो परन्तु इस दार्शनिक प्रयास को सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के साथ नहीं जोड़ा गया और ब्रिटिश साम्राज्य अपनी इस रणनीति में सफल रहा कि अमेरिका की स्थापना से आरम्भ हुई नयी विचारधारा से भारत को अलग रखा जा सके और इसका परिणाम यह हुआ कि सामाजिक परिवर्तन से होते हुए   राजनीतिक अधिकार की प्रक्रिया उलट गयी और मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के द्वारा जब विभिन्न साम्प्रदायिक और सामाजिक वर्गों को अलग प्रतिनिधित्व की बात सामने आयी तो राजनीतिक अधिकार की मांग से सामाजिक परिवर्तन की मांग तेज हो गयी  और यह जटिलता समाज के समक्ष के सामने आयी कि राजनीतिक अधिकार तो कुछ वर्षों और दशकों के प्रयास के प्राप्त हो सकते हैं, परन्तु सामाजिक परिवर्तन और उसके मूल में स्थित धार्मिक अवधारणा को लेकर किसी भी मानसिक परिवर्तन के लिए लम्बे समय की आवश्यकता होती है और जब ब्रिटिश भारत में राजनीतिक अधिकार और स्वशासन का चरणबद्ध दौर आरम्भ हुआ तो हिन्दू धर्म और समाज में अछूतों को लेकर बहस और उनकी स्थिति के अध्ययन के लिए गांधी और डा० अम्बेडकर में परस्पर अविश्वास का वातावरण बन गया और 1920 के बाद से देश की आजादी तक दोनों के मध्य एक दूसरे के प्रति अविश्वास होते हुए भी एक दूसरे की उपेक्षा और अवहेलना का साहस नहीं बन सका और गांधी और अम्बेडकर दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित भी किया और आधुनिक भारत के निर्माण में और हिन्दू धर्म व सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी  सुधार के लिए हिन्दुओं को विवश भी किया और व्यापक हिन्दू एकता के लिए मार्ग प्रशस्त भी किया |

गांधी और अम्बेडकर के आपसी संबंधों की जटिलता को तत्कालीन वैचारिक और राजनीतिक परिस्थिति को समझे बिना पूरी ईमानदारी से नहीं समझा जा सकता और इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनके टकराव के संदर्भ को सही अर्थों में समझा जा सकता है |