गांधी और अम्बेडकर- भाग ३

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अपनी पुस्तक “ What Gandhi and Congress have done to untouchables”  के चौथे अध्याय में डा० अम्बेडकर ने पूना पैक्ट के लिए उत्पन्न हुई परिस्थितियाँ और इस पैक्ट तक पहुंचने के घटनाक्रम का उल्लेख किया है और इस पूरे घटनाक्रम में एक बार फिर डा० अम्बेडकर गांधी से अधिक दूरदर्शी और परिपक्व राजनेता सिद्ध होते हैं|

गोलमेज सम्मेलन भारत की राजनीति में और स्वतंत्रता आन्दोलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि इस सम्मेलन में पहली बार गांधी यह अनुभव करने लगे थे कि भारत में विभिन्न गुट और दबाव समूह वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम और वैचारिक उठा पटक के मध्य अपनी अपनी भूमिकाएं तैयार करने लगे हैं और ब्रिटिश शासन के साथ अपने स्तर पर मोल भाव और अपने एजेंडे के अनुसार अपनी राजनीतिक चालें चल रहे हैं और इस कारण गांधी ने  अपने एकछत्र नेतृत्व को नए सिरे से खंगालना आरम्भ कर दिया था, गोलमेज सम्मेलन को बिना किसी नतीजे के दिखाने से भारत में भी निराशा का वातावरण बन रहा था और इसी निराशा के वातावरण में स्वयं को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए लन्दन से वापस लौटते हुए गांधी ने रोम में एक इन्टरव्यू में भारत वापसी के साथ ही अपने सत्याग्रह आन्दोलन को फिर से आरम्भ करने की बात कही और इसी कारण भारत में लौटते ही उन्हें ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया | गांधी को गोलमेज सम्मेलन में उस अधूरे निष्कर्ष का आभास था जिसमें सभी पक्षों ने विभिन्न समुदायों के लिए आगामी संविधान में की जाने वाली व्यवस्था के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय के फैसले का अधिकार ब्रिटिश प्रधानमंत्री को दे दिया था | इसी कारण गांधी ने  पूना के यरवडा जेल से 11 मार्च 1932 को सेक्रेटरी आफ स्टेट आफ इंडिया सेमुअल होयरे को एक पत्र लिखकर इस बात की चेतावनी दी कि यदि अछूत वर्ग ( Depressed Class) के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गयी तो मैं अपने जीवन की कीमत पर भी इसका विरोध करूंगा | अपने पत्र में गांधी ने अछूतों के लिए भी वयस्क मताधिकार की मांग का समर्थन तो किया परन्तु उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र को हिन्दू धर्म के लिए घातक बताया और इस विषय को हिन्दू धर्म का नैतिक और धर्मिक विषय मानते हुए स्वयं हिन्दुओं को सदियों की इस भूल को सुधारने का अवसर निकालने की स्वतंत्रता मिलने की आवश्यकता जतायी और ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि यदि उनके विरोध के बाद भी अछूतों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गयी तो वे जेल से ही आमरण अनशन आरम्भ कर देंगे |

इस पत्र के उत्तर में सेक्रेटरी आफ स्टेट के कार्यालय से 13 अप्रैल 1932 को  जो पत्र भेजा गया उसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित था कि भारत में संविधान के निर्माण की दिशा में कोई भी प्रगति नहीं हो पा रही हैं क्योंकि विभिन्न समुदाय अपने मतभेद नहीं सुलझा पा रहे हैं और इसलिए संविधान निर्माण के कार्य की प्रगति को  बाधित किये बिना इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है कि ब्रिटिश साम्राज्य सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखते स्वयं कोई पक्ष बने बिना   ब्रिटिश संसद की अनुमति से इस सम्बन्ध में निर्णय ले और इसी भावना के अनुरूप गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट में आवश्यक संशोधन के साथ सभी पक्षों की आपसी सहमति से प्रान्तों और ब्रिटिश भारत में निम्नलिखित योजना लागू की जाती है| इस योजना के अंतर्गत “ Depressed Class” या अछूतों को सामान्य वर्ग की सीटों में भी मताधिकार प्राप्त हुआ परन्तु उन्हें कुछ समय के लिए विधायिका में विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया और उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए जिन क्षेत्रों में उनकी संख्या अधिक थी , परन्तु इस वर्ग के लोगों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी सामान्य वर्ग के साथ मत का अधिकार भी मिला अर्थात उन्हें दोहरा मताधिकार मिला |  

ब्रिटिश शासन के इस अंतिम निर्णय को सुनकर गांधी का आमरण अनशन का संकल्प अधिक दृढ़ हो गया और उन्होंने 18 अगस्त, 1932 को यरवडा जेल से अपने पत्र के माध्यम से 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन आरम्भ करने की घोषणा कर दी |

गांधी के आमरण अनशन के निर्णय की घोषणा ने ब्रिटिश शासन को घबराहट में डाल दिया और 8 सितम्बर, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने गांधी के नाम एक और पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया और अछूतों के अलग निर्वाचन क्षेत्र के निर्णय से हिन्दू धर्म के कमजोर होने की उनकी आशंका को दूर करने का प्रयास भी किया और उन्होंने अछूतों के अलग निर्वाचन क्षेत्र को मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र के स्वरुप से अलग बताया क्योंकि इसके अंतर्गत अछूतों को सामान्य हिन्दुओं के साथ सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में साथ ही  मताधिकार दिया गया है, परन्तु गांधी ने अपने निर्णय को नहीं बदलते हुए 20 सितम्बर , 1932 को अपना आमरण अनशन आरम्भ कर दिया | गांधी के इस निर्णय के तत्काल बाद डा० अम्बेडकर ने एक प्रेस वक्तव्य जारी कर गांधी के निर्णय पर चुटकी ली और उन्होंने कहा , “ वास्तव में तो गांधी ने आमरण अनशन की घोषणा की है परन्तु वे मरना नहीं चाहते बल्कि अधिक जीवित रहना चाहते हैं” | गांधी के इस अनशन ने एक राष्ट्रीय संकट खड़ा कर दिया और चूंकि ब्रिटिश शासन इस प्रस्ताव को वापस लेने को तैयार नहीं था पंरतु यह गुंजायश छोडी थी कि यदि सम्बंधित पक्ष आपस में किसी नए फार्मूले पर सहमत हो जाएँ तो इसके स्थान पर नए फार्मूले को स्वीकार कर लिया जाएगा |

गोलमेज सम्मेलन में स्वयं गांधी और कांग्रेस ने जिस सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहा और जिस सत्य से मुंह चुराते रहे, तत्कालीन भारतीय राजनीति का वही सत्य और चुनौती उनके समक्ष नए स्वरुप में उपस्थित हो गयी  और वह थी  डा० अम्बेडकर का अछूतों के नेता के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में एक शक्ति बन जाना|

ब्रिटिश शासन के इस प्रस्ताव के बाद कि यदि सम्बंधित पक्ष आपस में कोई नया फार्मूला तैयार कर लें तो इस नए फार्मूले को ही संविधान में स्थान दिया जायेगा , गांधी के सम्मान और जीवन की रक्षा के लिए पूरा देश और कांग्रेस केवल एक व्यक्ति की ओर देख रही थी और वह थे डा० अम्बेडकर|

डा० अम्बेडकर ने इस  पूरे घटनाक्रम में अपनी दुविधा का उल्लेख किया है और उनके अनुसार उनके समक्ष दो कठिन विकल्प थे , एक ओर उन अधिकारों की रक्षा जिनके लिए उन्होंने संघर्ष किया और जिन अछूतों और उनके अधिकारों के लिए वे सदैव संघर्ष करते रहे उन्हीं अधिकारों को प्राप्त करने के बाद उनमें बदलाव की चुनौती उनके समक्ष थी और दूसरी ओर मानवता का सवाल था और एक व्यक्ति के जीवन का सवाल था , अंत में डा० अम्बेडकर ने मानवता के लिए अपने कर्त्तव्य को चुना और गांधी के साथ प्रसिद्ध पूना पैक्ट किया जिसके अंतर्गत अछूतों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के प्रावधान को हटाकर सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में ही उनके लिए अलग आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी और इसके साथ ही अनेक ऐसे संकल्प लिए गए जिसके अनुसार अछूतों को हिन्दू समाज , राजनीति और व्यवस्था में समान स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सार्थक और सक्रिय प्रयास किये जाने वाले थे |

गांधी के आमरण अनशन की घोषणा से पूना पैक्ट तक के राजनीतिक घटनाक्रम का विस्तारपूर्वक वर्णन डा० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में किया है और उनके दो जीवनीकारों धनजंय कीर और नरेन्द्र जाधव ने भी इस घटनाक्रम का वर्णन किया है परन्तु इस पूरे घटनाक्रम में कुछ तथ्य ही महत्व के हैं| केवल कांग्रेस के नेता और अनेक सामाजिक नेता ही डा० अम्बेडकर को समझौते के लिए दबाव नहीं दे रहे थे बल्कि उनके अनेक सहयोगी भी इस बात को लेकर चिंतित थे कि यदि गांधी के जीवन पर ख़तरा आया तो इसका कलंक डा० अम्बेडकर और समस्त अछूत समाज पर आ जाएगा और हिन्दू धर्म और समाज में इस समस्या को लेकर जो भी जागरूकता और संवेदनशीलता आयी है वह क्षण भर में नकारात्मक स्वरुप ग्रहण कर लेगी और इस कारण डा० अम्बेडकर के सहयोगियों को भी यह लगता था कि इस अवसर पर गांधी का जीवन बचाना ही प्राथमिकता है|

गोलमेज सम्मेलन से पूना पैक्ट तक के राजनीतिक घटनाक्रम ने गांधी और डा० अम्बेडकर को एक अजीब राजनीतिक धरातल पर खड़ा कर दिया , दोनों न तो मित्र थे, न शत्रु थे , न समान आयु के थे और न ही किसी भी राजनीतिक या वैचारिक विषय में एक मत के थे फिर भी दोनों तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति में ऐसी ताकत थे जिनकी अवहेलना असम्भव थी |

गांधी ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लोहा लेने वाले और देश को स्वराज का स्वप्न दिखाने वाले एक युग पुरुष लोगों की निगाह में थे तो स्वतंत्रता के बाद के जिस भारत का स्वरुप आकार ले रहा था उस आधुनिक और प्रगतिशील भारत की कल्पना असम्भव थी यदि डा० अम्बेडकर को उसका हिस्सेदार नहीं बनाया जाए| और इसी कारण यह प्रश्न  गांधी और तत्कालीन कांग्रेस से इतिहास को करना ही चाहिए कि उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए डा० अम्बेडकर को राजनीतिक रूप से समायोजित करने का प्रयास क्यों नहीं किया? उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों को सही संदर्भ में , सही मंच पर और सही ढंग से प्रस्तुत कर राजनीतिक अधिकारों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के उनके उन प्रयासों को समय रहते उचित स्थान क्यों नहीं दिया गया , आखिर जिस गति और प्रयास को आधुनिक भारत का हिस्सा बनाया ही गया|

1927 में डा० अम्बेडकर ने जब अछूतों के लिए महाद सत्याग्रह करते हुए सार्वजनिक रूप से जलाशयों के उनके प्रयोग की मांग उठायी और फिर मंदिरों में भी अछूतों के प्रवेश की मांग को लेकर आन्दोलन और सत्याग्रह का दौर आरम्भ किया तो डा० अम्बेडकर ने समस्त राजनीति को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया और तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक नेताओं के विचारों में परिवर्तन का दौर आरम्भ होने लगा और वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही आधुनिक भारत का भाग्य निर्माण हो इस आग्रह को चुनौती मिलने लगी , परन्तु 1927 में महाद सत्याग्रह  से 1932 में पूना पैक्ट तक के  घटनाक्रम में जो भी दौर बीता उसने भारत के भाग्य को बदलकर रख दिया और यदि इन्हीं वर्षों में डा० अम्बेडकर के प्रयासों और उनकी दूरदर्शिता को सही संदर्भ में देखा गया होता तो शायद डा० अम्बेडकर ने 1935 में  भविष्य में  हिन्दू धर्म छोड़ने के अपने निर्णय की घोषणा न की होती और हिन्दू धर्म डा० अम्बेडकर को अपने सामाजिक सुधारकों की लम्बी श्रृंखला में एक आधुनिक और क्रांतिकारी सुधारक के रूप में गर्व से याद कर रहा होता |

अछूतों को अलग निर्वाचन क्षेत्र के विषय पर जब गांधी ने अनशन किया तो न केवल उनके प्राण बल्कि उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा भी डा० अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक कीमत पर बचाई क्योंकि पूना पैक्ट के बाद जब गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 की व्यवस्था के अनुरूप केन्द्रीय और प्रांतीय विधानसभा के चुनाव 1937 में जब पहली बार साथ हुए तो डा० अम्बेडकर को इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी परन्तु उन्होंने इसकी परवाह किये बिना गांधी के प्राण बचाए जिन्होंने स्वयं डा० अम्बेडकर से स्वयं यरवडा जेल में पहली मुलाक़ात में कहा था कि ” डा० मेरे प्राण अब तुम्हारे हाथ में हैं” |

इस प्रकरण की तुलना यदि मोहम्मद अली जिन्नाह की हठधर्मिता से की जाए तो यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि यदि जिन्नाह के समक्ष गांधी ने ऐसी स्थिति उत्पन्न की होती तो शायद उसका परिणाम क्या होता ? शायद गांधी को भी डा० अम्बेडकर के साथ अनेक मतभेदों के बाद भी उनपर भरोसा था, फिर भी गांधी ने पहले आगा खान और फिर मोहम्मद अली जिन्नाह को अधिक महत्व दिया और डा० अम्बेडकर को नहीं यह एक पहेली है|

डा० अम्बेडकर और गांधी के आपसी संबंधों के मध्य एक और तत्कालीन महापुरुष को स्मरण करना समीचीन होगा , जिन्होंने वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में और हिन्दू जाति व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन से हिन्दू एकता के संकल्प में डा० अम्बेडकर का सहयोग किया वे थे विनायक दामोदर सावरकर जिन्हें वीर सावरकर भी कहा जाता है| 1927 में महाद सत्याग्रह हो, चार वर्ण आधारित व्यवस्था का उन्मूलन हो, या फिर 1935 में हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्म में धर्मान्तरित होने की घोषणा के बाद इस निर्णय को तत्काल प्रभाव में लाने से रोकने के लिए प्रेरित करना हो इन सभी कार्यों में डा० अम्बेडकर को वीर सावरकर का पूरा सहयोग मिला और एक ओर गांधी और डा० अम्बेडकर में चार वर्ण को ठीक करने या उसके उन्मूलन पर परस्पर मतभेद था ,क्योंकि गांधी अछूतों को पंचम वर्ण से शूद्र वर्ण में लाने को तैयार थे पंरतु  चातुर्वर्ण को हिन्दू धर्म की वैज्ञानिक और सामाजिक प्रणाली के अनुरुप व्यवस्था मानते थे और इसे नष्ट करने के समर्थन में नहीं थे  (अपने पुश्तैनी कारोबार  को अपनाने , अंतरजातीय विवाह की व्यवस्था न होने को वे सामाजिक व्यवस्था के स्थिर और नैतिक बने रहने का अनिवार्य कारक मानते थे, परन्तु आगे चलकर जब स्वयं गांधी से ही प्रश्न होने लगे कि जाति से बनिया होते हुए भी उन्होंने वकालत क्यों पढ़ी और फिर जब उनके ही एक बेटे से ब्राहमण कन्या से विवाह कर लिया तो गांधी ने वर्ण व्यवस्था में उपस्थित जाति व्यवस्था को एक बुराई मानना आरम्भ किया)  , जबकि डा० अम्बेडकर के अनुसार जातीय असमानता का कारण चार वर्ण की व्यवस्था थी जिसे हिन्दू धर्म से समाप्त किया जाना आवश्यक है| पंरतु वीर सावरकर चार वर्ण को हिन्दू एकता के लिए अवरोध मानते थे और उनके इस विचार की प्रशंसा डा० अम्बेडकर ने की थी और इसी कारण सावरकर डा० अम्बेडकर को 1935 में हिन्दू धर्म छोड़कर जाने के स्थान पर इसमें रहते हुए इसके सुधार के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित करने में सफल रहे थे |  

डा० अम्बेडकर के अधिकतर लेखन और कार्यों का मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक विश्लेषण नहीं हुआ है| किसी भी व्यक्ति के विचार शून्य में निर्मित नहीं होते अपने आस पास के वातावरण , संस्कारों , अध्ययन के आधार पर आये ज्ञान, अनुभव और संपर्क में आये लोगों के द्वारा प्राप्त ज्ञान और अनुभव का विश्लेषण जब व्यक्ति अपने आधार पर करता है तो अपने ऐतिहासिक संदर्भ , पारिवारिक और सामाजिक परम्परा के अनुकूल एक भविष्य का खाका तैयार करता है , जिसमें वह विचारों के साथ जीवित रहना चाहता है | अपने स्तर पर हर कोई यह प्रयास करता है और इसी प्रयास के अंतर्गत इतिहास, परम्परा और अपने आस पास के घटनाक्रम को देखने का प्रयास करता है|

डा० अम्बेडकर ने अपने बौद्धिक अभियान के आरंभिक दिनों से जब उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में जाति व्यवस्था पर अपना पहला रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया था और उसके बाद अपने समस्त राजनीतिक कालखंड से जीवन के अंतिम दिनों में लिखी गयी उनकी पुस्तकों से यह स्पष्ट रहा कि उन्होंने भारत को एक प्राचीन और विशाल सभ्यता के रूप में देखा और इसके अनेक उतार चढ़ाव को अनुभव करते हुए , इसमें समय समय पर होने वाले वैचारिक अंतर्संघर्ष के बाद भी इस भूमि के मौलिक विचारों और साधना पद्धतियों के दायरे में ही अपने अधिकारों के लिए प्रयासों और उसमें मिली सफलता को ही उन्होंने अपने विचार और संघर्ष का आधार बनाया था , भारत की सभ्यता की विशालता , उदारता और गहराई के आधार पर उन्हें पूरा विश्वास था कि जिस प्रकार वैदिक परम्परा का उत्कर्ष , फिर बौद्ध विचार का प्रवाह और फिर पुष्यमित्र शुंग के काल से गुप्त काल तक पुनः वैदिक परम्परा का पुरुत्थान का युग रहा , उसी परम्परा के अनुरूप आधुनिक भारत भी उनके आक्रोश, विद्रोह और कठिन प्रश्नों को समाहित करते हुए भारत की सभ्यता की विशालता में मुख्यधारा में स्थान अवश्य देगा और यही कारण है कि उनका लेखन और कार्य एक आक्रोश और विद्रोह की भूमिका तैयार करता है परन्तु एक नए विमर्श के लिए और जड़ता को तोड़ने के लिए|

डा० अम्बेडकर को नए स्वरुप में और नए संदर्भ में देखने और पढ़ने की आवश्यकता है ताकि उनकी घर वापसी करते हुए उनके साहित्य, विचार और राजनीतिक सक्रियता से उन्हें भारत की सभ्यता की विशालता से काटकर उन्हें भारत विरोधी विचारों के साथ खड़ा करने के प्रयासों की कुचेष्टा को षडयंत्र सिद्ध किया जा सके|