जम्मू कश्मीर में बिगड़ते हालात : जिम्मेदार कौन?

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राजनीतिक गठबंधन अवसर या भूल|

राजनीति में सबसे सरल काम बिना जिम्मेदारी लिए दूसरे की आलोचना करना होता है| इस पैमाने पर यदि देश के प्रमुख विपक्षी दलों को तौला जाए तो जम्मू कश्मीर के निरंतर बिगडते हालात के बाद भी जिस संयम और राजनीतिक सूझ बूझ का परिचय उन्होंने दिया है और इस पूरे विषय का राजनीतिकरण होने से बचा कर रखा है उसके लिए वे प्रशंसा के पात्र है , पर इसके विपरीत देश के सत्ताधारी दल और भारत सरकार के रुख को देखें या इस विषय पर उनकी रणनीति को समझने का प्रयास करें तो पूरी तरह निराशा ही हाथ लगती है|

करीब एक माह बाद देश में सत्तासीन गठबंधन को तीन वर्ष पूरे हो जायेंगे और जिस अपेक्षा और जनादेश के साथ इस सरकार ने कमान संभाली थी उसमें देश के बहुत से अनसुलझे मुद्दों पर कुछ नए सिरे से प्रयास करने और उन्हें देशहित में सुलझाने की अपेक्षा भी थी |

देश में सत्तासीन दल जिस राजनीतिक विचारधारा का वाहक है उसने देश की आजादी से लेकर अब तक करीब छः दशक में जम्मू कश्मीर की विवादित स्थिति या उसमें असामान्य स्थिति का दोष कांग्रेस और विशेषकर जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और उनकी इस मुद्दे पर रही सोच को दिया और इसके विरोध में श्यामाप्रासाद मुखर्जी द्वारा आरम्भ की गयी दूसरी राजनीतिक धारा के माध्यम से एक नए सिरे से पूरे मामले को समझने और उसी संदर्भ में इसका राजनीतिक समाधान निकालने के लिए इस राजनीतिक धारा को सशक्त करने का आह्वान देश की जनता से किया और पिछले आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली भारी विजय के पीछे कहीं न कहीं जम्मू कश्मीर के मुद्दे को लेकर नए प्रयोग और नए फार्मूले की जनता की अपेक्षा भी जनादेश में प्रकट हुई |

जनता के इसी विश्वास का परिणाम था कि जब भारतीय जनता पार्टी ने अपनी राजनीतिक विचारधारा की प्रतिबद्धता से ठीक उलट आम तौर पर अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वाली पीडीपी के साथ राजनीतिक गठबंधन किया तो भी देश की जनता ने केंद्र की भाजपा नीत सरकार और उसके नेतृत्व पर विश्वास बनाये रखा परन्तु जैसे जैसे समय व्यतीत हो रहा है इस पूरे मामले पर  भारत सरकार और उसके रणनीतिकारों की दिशाहीनता और अपरिपक्वता जाहिर होती जा रही है|

जम्मू कश्मीर के पूरे मामले में न तो प्रदेश सरकार और न ही केंद्र सरकार किसी स्पष्ट नीति के साथ सामने आ पायी है| कभी तो प्रदेश की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सुशासन के एजेंडे से अलगाववाद और आतंकवाद पर विजय प्राप्त करने का दर्शन लेकर सामने आती हैं तो कभी अपने सहयोगी भाजपा के दबाव में राष्ट्रवादी एजेंडे पर पत्थर का जवाब गोली से देने की नीति अपनाती हुई नजर आती हैं , पर उनकी इस राजनीतिक अपरिपक्वता और दिशाहीनता का परिणाम यह हुआ है कि पूरे प्रदेश में एक राजनीतिक शून्यता और जनता व सरकार के मध्य एक विश्वासहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसका सीधा लाभ अलगाववादियों और सीमा पार आतंकी आकाओं को मिल रहा है|

एक ओर जहां जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पूरी तरह दिशाहीन हैं तो वहीं उनकी सहयोगी भाजपा और उनके वैचारिक सहयोगी पूरी दुनिया में   फैले राष्ट्रवादी उन्माद और सोशल मीडिया पर तेजी से पाँव पसार रहे  सीना ठोंक राष्ट्रवादी अभियान के शोर में अपनी राजनीतिक लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए राज्य के पूरे विषय को न तो सही संदर्भ में देख पा रहे हैं और न ही इसके उचित समाधान के लिए गंभीर दिख रहे हैं|

बीते दिनों राज्य में सेना पर पत्त्थर फेंके जाने की घटनाओं का मामला हो, उसके जवाब में सेना की ओर से कथित रूप से किसी युवक को जीप पर बांधे जाने की घटना हो या फिर तीन दशक के बाद पहली बार लोक सभा उपचुनाव में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा, मतदान के बहिष्कार का मामला हो , इन सभी मामलों ने पूरे राज्य की ओर न केवल ध्यान खींचा है बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जम्मू कश्मीर की स्थिति कहीं अधिक गंभीर होती जा रही है|

दिनोंदिन गंभीर हो रही इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है? जब देश की जनता ने , राजनीतिक दलों ने और यहाँ तक कि जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों ने भी भारत सरकार और सत्ताधारी दल और उनके वैचारिक सहयोगियों को अपना पूरा सहयोग दे रखा है तो अब वे अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते |

जम्मू कश्मीर की समस्या को बिगड़ते हुई देखकर इसे शेष देश में एक मुद्दा बनाये रखने की हल्की राजनीति करने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिए और न ही इसकी तुलना इजरायल और फिलीस्तीन से करने की ऐतिहासिक भूल करनी चाहिए जो भूल इन दिनों हो रही है जब पत्थरबाजी का मुकाबला करने के लिए सेना को इजरायल की सेना की तर्ज पर छूट दिए जाने के स्वर सुनने को मिलते हैं| क्योंकि एक तो इजरायल और फिलीस्तीन तथा कश्मीर का मामला पूरी तरह अलग है| इजरायल का संघर्ष फिलीस्तीन से है जिसे दुनिया भर ने एक अलग देश के रूप में मान्यता दे रखी है और इजरायल के भीतर निवास करने वाले अरब मूल की   मुस्लिम जनसंख्या  के साथ इजरायल की आंतरिक राजनीति में राजनीतिक बयानबाजी और फिलीस्तीन के अधिकार वाले क्षेत्रों से इजरायल पर होने वाली हिंसा को आपस में मिलाने की भूल नहीं करनी चाहिए और जो ऐसा करने का साहस करना चाहते हैं क्या वे इजरायल की तरह मानवाधिकार के उल्लंघन के आरोपों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर   होने वाले उसके निरंतर बहिष्कार और पूरी दुनिया में अलग थलग होने का  दबाव झेलने की स्थिति में हैं?  हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इजरायल का विरोध करने के बाद भी पश्चिमी जगत उसके साथ है क्योंकि कहीं न कहीं इजरायल की यहूदी मान्यता और पश्चिमी देशों की ईसाई मान्यता का मूल एक है , पर भारत को पश्चिमी देशों से मिलने वाला सहयोग इस शर्त पर आधारित है कि  अरब के इस्लामी देशों के बीच  इजरायल जिस प्रकार एक सफल आधुनिक लोकतांत्रिक देश है उसी  तरह   पाकिस्तान के मुकाबले  भारत एक सफल विविधतावादी लोकतांत्रिक देश है जो दक्षिण एशिया में स्थिरता और विकास की गारंटी है|

जम्मू कश्मीर का  मामला भारत का आतंरिक मामला है और समस्या पत्थर फेंकने वाले युवकों से नहीं है बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करने वाले और उन्हें उकसाने का प्रयास करने वालों से है और किसे  नहीं पता कि ऐसा प्रयास करने वाले इन घटनाओं के माध्यम से राज्य सरकार और भारत सरकार पर दबाव डालकर उसे बातचीत की मेज पर लाकर पूरे मुद्दे को  अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित करने का प्रयास कर रहे हैं इसलिए  इस मुद्दे में भारत सरकार को अत्यंत संयम और कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देने की आवश्यकता है न कि सस्ती लोकप्रियता के लिए पत्थर के मुकाबले गोली जैसे जुमलों को बढ़ावा देकर | यदि इसी प्रकार की अपरिपक्वता और गैर जिम्मेदार रवैया अपनाया गया तो कश्मीर मुद्दे पर भारत को वर्षों से मिल रही अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति पर गलत प्रभाव पडेगा और पाकिस्तान के दुष्प्रचार को बल मिलेगा |

केंद्र में सत्तासीन सरकार ने लगभग तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर अत्यंत सतही और कैजुवल रवैया अपना रखा है और अब तक यही पता नहीं चल सका कि इस मुद्दे पर सरकार का रुख क्या है? सरकार स्वयं इस मामले में पूरी तरह भ्रमित है और सबके सहयोग से कोई रास्ता निकालने  का प्रयास करने में ( विशेष रूप से कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के सहयोग से )  अपनी पराजय मानती है और परिणाम है कि समस्या दिन प्रतिदिन बिगडती जा रही है|

 

जैसा कि आलेख में आरम्भ में कहा गया कि किसी का विरोध करना अत्यंत सरल होता है और यदि अभी तक देश में अनेक पीढियां यह सुनकर बड़ी हुईं हैं कि जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के चलते यह समस्या है तो अब तो नए दौर में इसके समाधान के लिए कोई प्रयास होना चाहिए या केवल नेहरू और गांधी की आलोचना करते हुए इस समस्या को और गंभीर होने दिया जाएगा क्योंकि गलती किसी की भी हो उसका दुष्परिणाम तो अंत में देश को भुगतना पड़ता है|