डा० अम्बेडकर और जातिव्यवस्था 2

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डा० अम्बेडकर ने दो अन्य पुस्तकें वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के घालमेल पर लिखी “ who were shudras” ? और “ Who were untouchables” और इन दोनों पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने मोटे तौर पर जो संकेत देने का प्रयास किया वह अधिक महत्वपूर्ण है और वह है मूल वैदिक सामाजिक संरचना में शूद्रों की पहचान को खोजने का प्रयास और वैदिक काल के बाद बदलते हुए काल में शूद्रों के अति शूद्र या अछूत में बदल जाने के कारण के साथ उनकी पहचान|

आश्चर्य की बात है कि इस दोनों पुस्तकों के माध्यम से डा० अम्बेडकर हिन्दू धर्म और समाज के नेताओं को जो मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक सन्देश देना चाहते थे उसे किसी ने भी समझने का प्रयास नहीं किया, यह सन्देश था डा० अम्बेडकर अपनी और अपने अछूत वर्ग को पहचान के संकट से बाहर निकालकर उसे एक ऐतिहासिक और बौद्धिक मान्यता दिलाकर भारत की सभ्यता के विशाल सागर में उन्हें विलीन करते हुए सम्मानपूर्वक हिन्दू धर्म और समाज का अंग बना देना चाहते थे|

अपनी पुस्तक “ Who were Shudras”? में डा० भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक की भूमिका में ही इस बात को स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा पुस्तक में दिए गए निष्कर्ष अंतिम नहीं माने जाने चाहिए और यह एक जटिल विषय है और वे वेदों और धर्मग्रंथों के आधार पर अपने निष्कर्षों को लेकर एक स्वस्थ बहस चाहते हैं |

अपनी पुस्तक में उन्होंने भारत में आर्यों के बाहर से आकर  आक्रमण  करने और उनके भारत में पहले से निवास करने वाली द्रविड़ या दस्यु जातियों को अपना दास बनाकर उन्हें शूद्र का दर्जा देने की पश्चिमी थ्योरी को सिरे से नकार दिया और दास, दस्यु, राक्षस को आर्यों की ही शाखाएं सिद्ध करते हुए इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि आर्य आक्रमण की थ्योरी को पहले यूरोप ने अपनी नस्ल की सर्वोच्चता सिद्ध करने के प्रयास के अंतर्गत अपने साम्राज्यवादी राजनीतिक उद्देश्य के लिए स्थापित किया और भारत में वर्ण आधारित सर्वोच्चता स्थापित करने के लोभ में यूरोप की इस धारणा को भारत में भी इतिहासकारों ने प्रश्रय दिया|

डा० अम्बेडकर ने आर्य द्रविड़ थ्योरी को लेकर भी अत्यंत रोचक तर्क दिया है, उनके अनुसार वास्तव में द्रविड़ आर्य की ही एक शाखा थे तो तमिलभाषी दक्षिण क्षेत्र से थे|

अपनी पुस्तक “ who were shudras” में डा० अम्बेडकर ने वेदों और अन्य सहायक ग्रंथों के माध्यम से कुछ अत्यंत रोचक और मौलिक थ्योरी सृजित की है|

पहला, ऋग्वेद के सर्वाधिक चर्चित और विवादित पुरुष सूक्त में पुरुष के शरीर के चार अंगों से चार वर्णों के निर्मित होने के  तथ्य को उन्होंने स्वयं ऋग्वेद की अन्य ऋचाओं और शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद सहित शतपथ ब्राहमण, वाजसनेय संहिता, नारद संहिता से तुलना करते हुए प्रश्न उठाया है कि सृष्टि के निर्माण के स्वरुप और प्रक्रिया को लेकर इनके कथन में विरोधाभास है और कहीं पुरुष को अव्यक्त से उत्पन्न तो कहीं मनु ( मनुस्मृति वाले मनु से भिन्न) से उत्पन्न बताया गया है और इसी प्रकार पुरुष सूक्त के कथित उध्दरण को छोड़कर ऋग्वेद और उसके   सहयोगी ग्रथों में  कतिपय स्थलों पर चार वर्णों की उत्पत्ति पर  अधिक ध्यान न देकर सृष्टि और उसके अन्य अंग उपांगों की उत्पत्ति पर अधिक ध्यान दिया गया है, इन विषमताओं के अपने निष्कर्ष के आधार  पर डा० अम्बेडकर का मानना है कि चार वर्णों में श्रेणीबद्ध असमानता को दैवीय विधान सिद्ध करने के लिए ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में पुरुष के शरीर के चार अंगों से निर्मित चार वर्णों के विचार को कालांतर में प्रक्षिप्त किया गया और इसीलिए अपनी पुस्तक की भूमिका में उन्होंने इस पुस्तक को धार्मिक पवित्रता से परे बौद्धिक विमर्श के दायरे में अध्ययन करने का आग्रह किया है क्योंकि पुरुष सूक्त में प्रक्षेपण के सिद्धांत से वेदों के दैवीय और ईश्वरीय ग्रन्थ स्वीकार करने की शर्त छोड़नी होगी और वेदों में किसी प्रकार का संशोधन या परिमार्जन न होने के विचार को भी त्यागना होगा|

डा० अम्बेडकर की अगली रोचक थ्योरी शूद्रों के उद्भव को लेकर है| इंडो आर्यन मूल को वे भारतीय मानते हुए आर्यों के भारत पर आक्रमण की थ्योरी को नकारते हुए  मूल रूप में आरंभिक वैदिक समाज में ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य तीन वर्ण ही  स्वीकार करते हैं और उनके अनुसार शूद्र की श्रेणी और कोई नहीं बल्कि  सूर्यवंशी  क्षत्रियों की ही शाखा थी जिन्होंने ब्राहमण कर्मकांड या वेद पाठन में ब्राहमण एकाधिकार को चुनौती दी और इसके लिए वे राजा सुदास और उनके द्वारा वशिष्ठ को हटाकर विश्वामित्र को पुरोहित बनाये जाने की घटना को अपना आधार बनाते हैं और महाभारत के उदाहरण में पैजवान के उल्लेख से भी उन्होंने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वैदिक काल में शूद्र न केवल राजा होते थे बल्कि उन्हें ब्राहमणों के बराबर का स्तर भी प्राप्त था |

अपने इन उदाहरणों के पश्चात डा० अम्बेडकर ने इस कारण को भी खोजने का प्रयास किया है कि शूद्र चौथे वर्ण में कैसे बदले और उनका स्तर वैश्य से नीचे कैसे हुआ? इसके उत्त्तर में उनकी थ्योरी है कि जिन क्षत्रिय  राजाओं ने ब्राहमणों की यथास्थिति या एकाधिकार को चुनौती दी और ब्राहमण के अतिरिक्त अन्य वर्ग के लोगों को भी पुरोहित के रूप में नियुक्त करना आरम्भ किया तो ऐसे क्षत्रियों को   उपनयन संस्कार अर्थात वेदपाठी होने या द्विज होने के  अधिकार अर्थात यज्ञोपवीत संस्कार  से वंचित किया जाने गया और धीरे धीरे उपनयन या द्विज होने अर्थात दूसरा जन्म लेने के अधिकार से वंचित होने वाले लोगों का एक वर्ग बनता गया जो शूद्र बन गया और उन्हें कालांतर में विभिन्न स्मृतियों में माध्यम से अनेक विशेषाधिकारों से वंचित किया जाता रहा |

डा० अम्बेडकर की इस रोचक थ्योरी को एक तर्क और बहस के विषय के रूप में स्वीकार किया गया है परन्तु शूद्रों के उद्भव या उनके विकास के संदर्भ में इसे अंतिम थ्योरी के रूप में स्वीकृति नहीं मिली है और यह अकादमिक रूप से अध्ययन से अधिक राजनीतिक रूप से अधिक चर्चा में रहती है और इसके राजनीतिकरण के चलते ही इसका तार्किक और शास्त्रीय अध्ययन अधिक नहीं हो सका है और जैसा कि पुस्तक के आरम्भ में ही कहा गया है कि डा० अम्बेडकर दो परस्पर विरोधी छवियों में कैद हैं और स्वयं डा० अम्बेडकर ने  अपनी पुस्तक लिखते समय यही आग्रह किया था कि इस पर शास्त्रीय और तार्किक बहस अधिक हो परन्तु हुआ इसके विपरीत और इसे पक्ष और विपक्ष के खेमे में बांटकर इसके वास्तविक अध्ययन से आम पाठकों और इस विषय में रूचि रखने वालों को इससे दूर रखा गया |

इसी प्रकार डा० अम्बेडकर की एक अन्य पुस्तक “ who were untouchables and how they become untouchables” में भी अनेक रोचक और मौलिक तथ्यों को स्पर्श किया है|

अपनी पुस्तक “ who were Shudras” के संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने वैदिक कालीन शूद्रों और वर्तमान अछूतों में अंतर स्पष्ट किया और एक ओर शूद्रों को हिन्दू समाज व्यवस्था के चार वर्णों के दायरे में स्वीकार किया तो अछूतों के उद्भव को इस चातुर्वर्ण के बाहर सिद्ध करने का भार अपने ऊपर लिया और शूद्रों को लेकर उनकी थ्योरी की भांति अछूतों के लेकर उनकी थ्योरी भी पूरी तरह मान्य और विवाद से परे नहीं है और इसका भी ऐतिहासिक विश्लेषण से अधिक राजनीतीकरण अधिक हुआ है|

डा० अम्बेडकर ने शूद्रों को चार वर्ण के दायरे में स्वीकार किया है और चारों वर्णों में पारस्परिक प्रतिस्पर्धा और विशेषाधिकार के अंतर्संघर्ष के परिणाम के रूप में शूद्र वर्ण के उद्भव का कारण सिद्ध किया है परन्तु डा० अम्बेडकर ने वेद पठन और उपनयन के संस्कार से तिरस्कृत किये जाने के बाद भी  शूद्रों में लिए उस वातावरण या संदर्भ की बात नहीं की है जिसे आधुनिक संदर्भ में दलित संदर्भ के साथ जोड़ा जाता है और उन्हें  समाज से अलग थलग , उनके स्पर्श किये जाने से अपवित्र होने या उनके साथ मेल मिलाप न रखने के वातावरण की पूर्व कल्पना कर ली जाती है और इसलिए वैदिक सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों की स्थिति में उनके साथ भेदभाव का अर्थ उन्हें विशेषाधिकार के संदर्भ में कुछ अधिकारों से वंचित किये जाने से है और यह स्थिति स्पष्ट करनी इसलिए आवश्यक है कि नैतिक संदर्भ में इस सामाजिक व्यवस्था को लेकर बहस हो सकती है परन्तु अछूत और जाति व्यवस्था में अनेक जाति- उपजातीय भेदभाव और संकीर्णता का ऐतिहासिक आधार वैदिक समाज से जोड़कर बौद्धिक आधार पर लोगों को गुमराह किया जाता है , जिसका अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है , वैदिक काल तो छोड़िये स्वयं डा० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक” who were untouchables “ में मनुस्मृति के काल तक समाज में अछूत होने या किसी वर्ग को शेष समाज से पूरी तरह अलग रखने या उसके सम्पर्क में आने से अपवित्र होने की परम्परा को पूरी तरह अस्वीकार किया है और उनके अनुसार चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के समय में भी समाज में ऐसी किसी प्रचलित परम्परा का उल्लेख नहीं मिलता है|

डा० अम्बेडकर समाज में अछूत वर्ग के निर्मित होने की तीन थ्योरी देते हैं|

पहला, सभ्यता के आरंभिक काल में जब कबीले आपस में वर्चस्व के लिए या एक दूसरे की सम्पत्ति पर अधिकार के लिए युद्ध करते होंगे तो जो लोग अपने कबीले से बिछुड़ जाते होंगे और अलग थलग या अपनी जड़ से टूट जाते होंगे (जिन्हें डा० अम्बेडकर ने “ Broken Man” कहा है) उन्हें कबीले के बाहर कबीले के लोगों की सुरक्षा और अन्य कार्य दिए जाते होंगे और उन्हें अलग थलग रखा जाता होगा और यही वर्ग धीरे धीरे समाज और सभ्यता के दायरे से बाहर रहते हुए अछूत के  रूप में प्रचलित हो गया जो अपने में जाति से अधिक वर्ग रहा होगा |

दूसरा, डा० अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म के प्रति अपने स्वाभाविक आकर्षण और मूल वैदिक परम्परा के  साथ उसके संघर्ष की थ्योरी बतायी जिसे वे स्वयं एक कल्पना स्वीकार करते हैं कि मौर्य काल से बौद्ध स्वर्ण युग के बाद पुष्यमित्र शुंग के शासन से गुप्त काल तक वैदिक पुरुत्थान के युग में बौद्ध धर्म के अनुयायियों को समाज में अछूत के रूप में मान्यता दे दी गयी |

तीसरी थ्योरी , तीसरी थ्योरी , दूसरी थ्योरी को ही आगे बढ़ाती है और कहीं कहीं डा० अम्बेडकर के हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लेने के बाद उनके इर्द गिर्द अम्बेडकरवादी आन्दोलन को प्रमुख बौद्धिक संरक्षण प्रदान करती है और डा० अम्बेडकर के नाम पर किसी भी मनगढ़ंत बात को उनके बौद्धिक विमर्श के साथ जोड़ने का आग्रह करती है|

अपनी इस थ्योरी में भारतीय समाज में अछूतों के उद्भव को वे बौद्ध धर्म के राजनीतिक रूप से क्षीण होने के बाद वैदिक परम्परा के पुरुत्थान (और जिसे डा० अम्बेडकर “ हिन्दू धर्म” का नाम देते हैं जो उनके अनुसार वैदिक परम्परा के साथ बौद्ध परम्परा का अंश भी समेटे है ) के साथ जोड़ते हैं और उनके अनुसार मनुस्मृति में समाज में अछूत वर्ग का कोई उल्लेख नहीं है और चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी समाज में अछूत परम्परा को किसी प्रचलित  सामजिक परम्परा  के रूप में उल्लेख नहीं किया है, डा० अम्बेडकर के अनुसार वैदिक काल में ब्राहमणों के लिए गोमांस या मांसाहार किसी भी प्रकार वर्जित नहीं था बल्कि यह अनेक अवसरों पर स्वागत के लिए प्रयोग होता था |

बौद्ध धर्म के समाज में प्रचलित होने के बाद जब बुद्ध के उपदेश के प्रभाव में आकर अधिकतर कृषि आधारित समाज के लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो उन्होंने गाय को अपनी कृषि अर्थव्यवस्था के उपयोग के चलते उसे पवित्र और उपयोगी मानकर उसकी बलि और उसका मांस खाने से परहेज कर दिया और सैकड़ों वर्षों तक बौद्ध धर्म के प्रभाव को देखते हुए वैदिक परम्परा ने अपने पक्ष में वातावरण बनने की प्रतीक्षा की और जब मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या कर उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग (जो कि ब्राह्मण थे) ने शासन अपने हाथ में लेकर शुंग वंश की स्थापना की ( जो कि डा० अम्बेडकर के शब्दों में एक राजनीतिक ह्त्या न होकर बौद्ध व्यवस्था के विरुद्ध वैदिक पुनरुत्थान की सुनियोजित क्रांति थी) तो वैदिक परम्परा को पुनर्स्थापित करने के लिए अनेक स्मृतियों की रचना हुई जिसमें मनुस्मृति प्रमुख थी और इसमें अनेक वैदिक सिध्दांतों को धार्मिक मान्यता दी गयी परन्तु एक प्रमुख परिवर्तन यह आया कि अहिंसा और गाय के प्रति के समाज में सम्मान का भाव देखते हुए ब्राहमणों ने गोहत्या को घोर अधार्मिक घोषित करते हुए शाकाहार को ब्राह्मणों के लिए आवश्यक घोषित किया ताकि समाज में वे सर्वाधिक सम्मानित हो जाएँ| इसी कारण जो मरी हुई गाय की खाल निकालते थे और उनका मांस खाते थे उनका सामाजिक बहिष्कार होने लगा और वे अछूत माने जाने लगे |

डा० अम्बेडकर ने वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पर जो भी टिप्पणी की है या मनुस्मृति पर उनकी जो भी टिप्पणी या लेखन है वह विवादित है और विवादित की परिभाषा यही है कि जिस विषय पर दो पक्ष हों और दोनों एक दूसरे एक दावे से सहमत न हों और इसलिए डा० अम्बेडकर के पक्ष को प्रस्तुत करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि ये सत्यापित या स्थापित तथ्य हैं|

उनकी टिप्पणियों और लेखन का संदर्भ प्रस्तुत करने का एक प्रयोजन यह है कि उनके दावों और प्रतिदावों के मध्य यह समझने का प्रयास भी किया जाए कि इस शोध और लेखन के माध्यम से डा० अम्बेडकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं या उनकी असली मंशा क्या है?

पुस्तक के आरंभ में डा० अम्बेडकर की पुस्तक “ Riddles in Hinduism” का उल्लेख किया गया है और यह पुस्तक डा० अम्बेडकर ने अपने जीवन काल के अंतिम वर्षों में अनेक पुस्तकों के साथ लिखनी आरम्भ की थी परन्तु यह पुस्तक  उनकी मृत्यु के अनेक वर्षों के बाद प्रकाशित हुई थी और विशेष रूप से 1970 के दशक में अमेरिका में ब्लैक पैंथर्स की तर्ज पर महाराष्ट्र में गठित हुए दलित पैंथर्स द्वारा डा० अम्बेडकर के साहित्य और विचारों को मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष और ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण के प्रयासों के अनुरूप सिद्ध करने के राजनीतिक अभियान के प्रकाश में यह देखना रोचक है कि हिन्दू धर्म छोड़ने की 1935 की अपनी घोषणा के एक दशक बाद भी जब 1945 में उन्होंने हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पर धर्म शास्त्रों के अपने निष्कर्ष और साक्ष्य के आधार पर पुस्तक लिखी तो उनका आग्रह जातीय दुराग्रह और वर्ग संघर्ष को जातीय संघर्ष में बदलने से अधिक एक शास्त्रार्थ और बहस को जन्म देना था और इसे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति और  सामाजिक प्राथमिकताओं के विरोधाभास का कठिन काल कहें कि डा० अम्बेडकर के उठाए गए प्रश्नों पर उस ढंग से बहस न हो सकी जिसकी आवश्यकता थी और उसका परिणाम यह हुआ कि डा० अम्बेडकर वैदिक काल से हिन्दू समाज की संरचना और उसके सुधार की गति की व्याख्या अपने अनुसार करते रहे और कभी हिन्दू समाज में सुधार की संभावना के साथ अपनी पहचान और कभी ब्रिटिश साम्राज्य के सहयोग से नए आधुनिक पश्चिमी समाज के निर्माण में अपनी  पहचान तलाशते रहे और उनकी इस अस्थिरता और उतावलेपन ने उन्हें दोनों पक्षों में एक सशंकित व्यक्तित्व बना दिया| हिन्दू धर्म के लिए वे अपना धर्म छोड़कर ईसाइयत और ब्रिटिश साम्राज्य में अपना हित देखने वाले व्यक्ति के रूप में शंका की नजर से देखे जाने लगे और ब्रिटिश साम्राज्य में भी उन्हें पश्चिमी विचारों से युक्त सुधारवादी हिन्दू के रूप में ही देखा जाता रहा जो भारत के प्रति अपने लगाव से किसी भी तरह मुक्त नहीं है|

अब अनेक दशकों के बाद जब भारत एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है और हिन्दू धर्म और उसकी सामाजिक संरचना में इतने सुधार होते जा रहे हैं जो स्वयं डा० अम्बेडकर के लिए अकल्पनीय थे तो यह अवसर है कि उन्हें नए सिरे से सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त करते हुए एक परिपूर्ण राष्ट्रनायक के रूप में उनका आकलन किया जाये |  डा० अम्बेडकर के जीवन काल में उनकी जीवनी लिखने वाले मराठी लेखक धनञ्जय कीर ने मनुस्मृति पर किये गए डा० अम्बेडकर के कठोर प्रहारों और उसके इर्द गिर्द चलाये गए अभियानों को एक चतुर राजनीतिक और सामाजिक रणनीति का हिस्सा सिद्ध किया है और उन्होंने अपनी जीवनी में  डा० अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाये जाने के उनके आन्दोलन के अनेक वर्षों बाद एक मराठी पत्रकार को दिए गए साक्षात्कार के हवाले से कहा है कि स्वयं डा० अम्बेडकर ने स्वीकार किया था कि मनुस्मृति में लिखी गयी सभी बातें निरर्थक या महत्वहीन नहीं हैं और न ही मनु कोई पागल या अमानवीय व्यक्ति थे , उन्होंने अनेक अच्छी बातें भी मनुस्मृति में लिखी हैं और मनुस्मृति को जलाने का उनका निर्णय न तो घृणा से प्रेरित था और न ही किसी वर्ग या वर्ण विशेष के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित था वरन इसका उद्देश्य हिन्दू धर्म में सामाजिक संरचना में सुधार के लिए गति प्रदान करने के लिए उसे पूरी तरह हिलाकर रख देना था ताकि सुधार की गति तेज हो सके|   

डा० अम्बेडकर के हिन्दू धर्म और इसकी सामाजिक संरचना को लेकर उनके विचारों और आन्दोलनों के संदर्भ को समझने के लिए उनके व्यक्तित्व , भारतीय संस्कृति को लेकर उनके विचार और एक राजनीतिक और सामाजिक नेता के रूप में आधुनिक स्वतंत्र भारत को लेकर उनकी दृष्टि को भी समझना होगा |

डा० अम्बेडकर के सम्बन्ध में कोई भी नजरिया बनाने से पूर्व यह धारणा दृढ़ करनी होगी कि महाराष्ट्र में अपना बचपन और आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के चलते महाराष्ट्र के भक्ति आन्दोलन , शिवाजी के मराठा साम्राज्य के स्वाभिमान और स्वतंत्रता के भाव को उन्होंने अपनी विरासत में प्राप्त किया था और इसी कारण उनका राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण पूरी तरह उनकी पुस्तक “ Who Were Shudras” की थ्योरी पर आधारित था कि भारत में एक सांस्कृतिक चेतना है और वैदिक काल से पारस्परिक और अंतर्संघर्ष के आधार पर वर्चस्व और विशेषाधिकार का निर्धारण होता रहा है और इसलिए आधुनिक भारत में इस परम्परा के अनुरूप हिन्दू सामाजिक संरचना में अछूतों के लिए उनका स्थान प्राप्त किया जा सकता है , पंरतु उसकी पहली शर्त यही है कि किसी भी स्थिति में भारत की सांस्कृतिक चेतना से अछूतों को अलग नहीं किया जा सकता और भारत के बाहर से आये धर्म और उसकी संस्कृति को अपनाकर उन्हें अपना अधिकार नहीं मिल सकता और इसी कारण उन्होंने आर्यों के आक्रमण और द्रविड़ों को अपने अधीन किये जाने के सिद्धांत का विरोध करते हुए द्रविड़ को तमिल भाषी आर्य सिद्ध किया और इसी थ्योरी को उन्होंने आधुनिक भारत में अछूतों के लिए प्रतिपादित किया और स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकार किये जाने के बाद भी हिन्दू धर्म और समाज को यह विकल्प प्रदान किया कि वे आधुनिक भारत में सामाजिक सुधार और हिन्दू धर्म की सामाजिक व्यवस्था में अपेक्षित सुधार कर व्यापक हिन्दू एकता के मार्ग को प्रशस्त कर सकें |

डा० अम्बेडकर एक कुशल राजनेता और सामाजिक नेता के रूप में धार्मिक आधार पर बहस को जन्म देकर राजनीतिक रूप से उसके समाधान के सहारे एक सामाजिक सुधार की प्रक्रिया को गति देते थे और स्वयं को एक माडल के रूप में प्रस्तुत कर हिन्दू धर्म , समाज और राजनीतिक नेताओं की इच्छा शक्ति को टटोलते थे और जिस अनुपात में उनको स्वीकार या अस्वीकार किया जाता था उसी अनुपात में उन्हें आधुनिक भारत में अछूतों की स्थिति का पूर्वानुमान होता था और उसी आधार पर वे अपनी राजनीतिक और सामाजिक रणनीति बनाते थे और उसी आधार पर तर्क और बहस करते थे |