डा० अम्बेडकर और जाति व्यवस्था का प्रश्न

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डा० अम्बेडकर के अनेक योगदानों की चर्चा करते हुए उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को सामने लाकर उनके बहुत से समर्थक यह सिद्ध करने का प्रयास भी करते हैं कि उन्हें हिन्दू धर्म के साथ उनके सम्बन्ध और भारत की जाति व्यवस्था पर उनके विचारों तक सीमित करने से उनके साथ पूरा न्याय नहीं होता है, यह तथ्य और तर्क अपनी जगह उचित है कि डा० अम्बेडकर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे , पंरतु हिन्दू धर्म को लेकर उनके क्रांतिकारी विचारों और भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर उनके विचारों को यदि निकाल कर उनके व्यक्तित्व का आकलन किया जाए तो उनकी विशेषता समाप्त हो जाती है और उनका महत्व भी समाप्त होता दिखता है|

डा० अम्बेडकर जाति की व्यवस्था को समस्त भारत का विषय मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि जातिगत पहचान का मुद्दा केवल हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि अन्य धर्मों में भी समान रूप से यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है , भारत में रहने वाले मुस्लिम, सिख , ईसाई भी इस विशेषता से बच नहीं सके हैं , हिन्दू धर्म और अन्य धर्मों में उनके अनुसार अंतर इतना ही है कि हिन्दू धर्म में जाति विभेद और विभाजन उत्पन्न कर भेदभाव को बढ़ावा देती है जबकि अन्य धर्मों में जाति केवल व्यक्तिगत पहचान तक सीमित है और जाति भाईचारे में अवरोध खड़ा नहीं करती है|

डा० अम्बेडकर ने जाति के प्रश्न पर अत्यंत वैज्ञानिक और मौलिक ढंग से विचार किया था और इसी कारण जाति के प्रश्न या विमर्श से उन्हें अलग रखना उस मौलिकता और वैज्ञानिकता से स्वयं को वंचित करना होगा |

डा० अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पर जोरदार आक्रमण किया परन्तु उसके संदर्भ के साथ उस पृष्ठभूमि को भी समझना होगा जिसने उन्हें इस विचार पर आक्रामक और मौलिक विचार प्रस्तुत करने को प्रेरित किया|

डा० अम्बेडकर से पूर्व भारत में अनेक संत और सुधारक हुए जिन्होंने इस विषय को स्पर्श करते हुए भेदभाव से मुक्त होने की सलाह दी परन्तु डा० अम्बेडकर से पहले के सभी प्रयास अध्यात्मिक और लोगों के ह्रदय परिवर्तन के लिए प्रेरित करने वाले थे, डा० अम्बेडकर ने पहली बार इसे राजनीतिक एजेंडे  में शामिल कर कानूनी और राजनीतिक समाधान के रूप में इस पर चर्चा की और यही कारण है कि उन्होंने मनुस्मृति पर आक्रमण से अपने अभियान को आरम्भ किया और वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था से उत्पन्न असमानता को एक आध्यात्मिक और सामाजिक समाधान के रूप में न देखकर उसे राजनीतिक विषय के रूप में देखकर , राजनीतिक और कानूनी रूप से लोगों को वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को एक दंड के रूप में स्वीकार करने के लिए विवश करने का विमर्श भारतीय समाज के लिए अत्यंत नया और क्रन्तिकारी विचार था , क्योंकि इससे पूर्व इस विषय को समाज और धर्म के अधिकार क्षेत्र में मानकर इसी आधार पर इसके समाधान का प्रयास होता था |

डा० अम्बेडकर द्वारा इस विषय को राजनीतिक अधिकार क्षेत्र में लाने से सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं कर पाया और इस कारण डा० अम्बेडकर और तत्कालीन समाज में परस्पर समझ नहीं बन पायी और हिन्दू समाज को लग रहा था कि डा० अम्बेडकर की गति अधिक तेज है और डा० अम्बेडकर को लग रहा था कि हिन्दू समाज इस विषय को लेकर न तो गंभीर है और न ही उसकी गति में आवश्यक तेजी है बल्कि वह अधिक सुस्त है|

हिन्दू समाज और डा० अम्बेडकर के  वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था में अपने अपने  नजरिये  के चलते एक संवाद हीनता और अविश्वास का वातावरण बनता गया और गुजरते समय के साथ यह संवादहीनता और अविश्वास बढ़ता ही गया |

इस संवादहीनता और परस्पर अविश्वास का परिणाम था कि डा० अम्बेडकर द्वारा वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पर उनके विचारों और उनके निहितार्थ को समझे बिना भी अनेक बार उन्हें हिन्दू धर्म और समाज का शत्रु घोषित किया जाने लगा और डा० अम्बेडकर भी हिन्दू समाज में सुधार की  प्रक्रिया के किसी भी आश्वासन को एक राजनीतिक पैतरेबाजी मानकर चलने लगे और इसका परिणाम हुआ कि तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य और ईसाई मिशनरियों ने डा० अम्बेडकर को अपने ढंग से अपने लाभ के लिए उपयोग करने का प्रयास किया और इस प्रयास में कुछ अवसरों पर जब डा० अम्बेडकर उनके अधिक निकट दिखे तो उनके प्रति अविश्वास और आशंका और गहरे होते गए |

वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के प्रश्न पर डा० अम्बेडकर के मौलिक और वैज्ञानिक विचार और असहज प्रश्न पूरी तरह क्रांतिकारी रूप में हिन्दू धर्म के धार्मिक और सामाजिक स्वरुप को परिमार्जित करने की क्षमता रखते थे , परन्तु ऐसा नहीं है कि उनके द्वारा व्यक्त किये गए विचार पूरी तरह तर्कों और ऐतिहासिक भूमिका के संदर्भ को परखे बिना स्वीकार किये जाने योग्य थे और संवादहीनता और पारस्परिक अविश्वास ने तर्कों के लिए अवसर ही नहीं उत्पन्न होने दिया |

डा० अम्बेडकर ने जब कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपना अध्ययन आरम्भ किया और फिर लन्दन में आगे की शिक्षा के लिए गए तो उन्होंने पूरी तरह पश्चिमी इतिहास , परम्परा और पश्चिम में हुए राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में भारत के इतिहास और उसके राजनीतिक और सामाजिक विकास और सरंचना को परखना आरम्भ किया और इसी दौर में उन्हें व्यक्ति और समाज की संरचना में धर्म के महत्व का पता चला , परन्तु आधुनिक पश्चिम में हुए राजनीतिक घटनाक्रम ने उन्हें अतिशय प्रभावित किया और विशेष रूप से फ्रांसीसी क्रांति और उसमें  समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की अवधारणा से उत्पन्न नए विश्व के निर्माण का संकल्प उनके लिए नया मन्त्र बन गया और इसके साथ थी अमेरिका के गठन के बाद जिस प्रकार अफ्रीकी मूल के लोगों को गुलामी के अभिशाप से मुक्त करने के लिए अमेरिका में जो गृहयुद्ध हुआ और उसमें श्वेत लोगों ने अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए पहल की और उनके लिए  लड़ाई लड़ी, उसने डा० अम्बेडकर को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने भारत में प्राचीन काल में इन्हीं आदर्शों के साथ समस्त जनमानस को प्रभावित करने वाले और सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक वातावरण को अपने आभामंडल से अभिभूत करने वाले गौतम बुद्ध को आधुनिक संदर्भ में नयी  फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी क्रांति से उपजे दर्शन और सन्देश के संदेशवाहक के रूप में अपना नया पैगम्बर स्वीकार कर लिया और अपने नए वैचारिक परिवर्तन में अपना  अध्ययन समाप्त कर वापस भारत लौटने पर उन्होंने भारतीय इतिहास, दर्शन और हिन्दू धर्म के सभी पहलुओं को नए सिरे से खंगालना शुरू किया और एक आधुनिक पश्चिमी प्रभाव से प्रभावित तर्कशील युवा को विभिन्न विचारधाराओं, वादों के मध्य पूंजीवाद बनाम साम्यवाद, साम्राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद , आस्तिकता बनाम नास्तिकता और वर्ग संघर्ष बनाम सामाजिक स्थिरता के नारों के शोर में आदर्शों को गढ़ने का अवसर मिला और हिन्दू धर्म की सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन करने में उन्हें भारत की सभी समस्याओं का समाधान दिखा और यही कारण रहा कि अपना अध्ययन पूर्ण कर भारत वापस लौटने के बाद डा० अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था को देश की लगभग सभी समस्याओं का कारण सिद्ध किया और इस व्यवस्था में परिवर्तन की शर्त के रूप में ही उन्होंने अपना समस्त सामाजिक और राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित किया |

जाति व्यवस्था पर डा० अम्बेडकर के विचार जानने या उसके समाधान के लिए उनके सुझावों पर विचार करने से पूर्व उस  भूमिका को समझ लेना अत्यंत आवश्यक है जिसने उनके इन विचारों को आकार प्रदान

किया |

भारत में आम तौर पर गंभीर से गंभीर विषयों और उससे जुड़े प्रश्नों को अत्यंत भावनात्मक रूप से देखने का अधिक आग्रह रहता है और कभी कभी इस स्वभाव के चलते विषय और उसके अनेक संदर्भ और उसको लेकर होने वाली उसकी व्याख्या का संदर्भ  भी बदल जाता है, डा० अम्बेडकर के जाति व्यवस्था विषयक प्रश्न को भी इसी आग्रह से अनेक बार देखा जाता है और सहज रूप से उनके घोर समर्थक और स्वयं को अम्बेडकरवादी कहलाने वाले एक ओर और उनके द्वारा उठाए गए  प्रश्नों की गहराई में गए बिना उसकी आलोचना करने वाले दूसरी ओर इस पूरी बहस को व्यक्तिगत और भावनात्मक स्तर पर लाकर उसकी गंभीरता को नष्ट कर देते हैं|

डा० अम्बेडकर के  जीवनकाल में विशेषरूप से उनके बाल्यकाल से लेकर उनकी पढ़ाई पूरी करने तक या उसके बाद भी जिस  जातीय भेदभाव का सामना उन्हें करना पड़ा उसका संदर्भ लेकर उनके जाति व्यवस्था पर उठाये गए प्रश्नों को उनकी भावुकता मानकर उसके अधिक तार्किक और बौद्धिक पक्ष को नजरंदाज कर दिया जाता है , परन्तु डा० अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था से जुड़े प्रश्न को अपनी व्यक्तिगत समस्या या पीड़ा के रूप में अनुभव करने के स्थान पर इसके ऐतिहासिक , तार्किक और बौद्धिक पहलुओं पर अत्यंत गंभीरता से विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह हिन्दू धर्म में किसी अशालीन व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के आचरण का विषय नहीं है बल्कि यह एक व्यापक विषय है जो धर्म और इतिहास की भूमिका के साथ सामाजिक व्यवहार का अंग बन चुका है इस कारण इस पर ऐसी चर्चा आवश्यक है जो हिन्दू समाज को इस विषय पर सोचने के लिए विवश कर दे |

इसी कारण डा० अम्बेडकर ने हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर वर्ण व्यवस्था और फिर इसके जाति व्यवस्था में बदल जाने के विषय को अत्यंत व्यापक रूप से समाज के समक्ष साहसपूर्वक उठाया और इसके कारण और निवारण दोनों पर ध्यान दिया|

डा० अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था पर सबसे बौद्धिक और विचारोत्तेजक बहस को 1936 में आमंत्रित किया जब लाहोर में जात पात तोड़क मंडल के कार्यक्रम में उन्हें  अध्यक्षता के लिए चुना गया और इस आयोजन के लिए उन्होंने भाषण तैयार किया पर उसके कुछ अंश  आयोजकों को आपत्तिजनक लगे तो डा० अम्बेडकर को यह भाषण प्रस्तुत करने से रोक दिया गया परन्तु उन्होंने अपने इस भाषण को  पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया |

Annihilation of Cast नामक इस पुस्तक में डा० अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था पर आक्रमण केवल एक आलोचक या नकारात्मक रूप से हिन्दू धर्म को देखते हुए इसकी चर्चा नहीं की है बल्कि उन्होंने हिन्दू धर्म के शुभचिंतक और दूरदर्शिता के साथ इस धर्म और उसके साथ जुड़े समाज के भविष्य को लेकर चिंतित व्यक्ति के रूप में इसकी चर्चा की है|

अपने इस पूरे भाषण में जो अब पुस्तक  के रूप में भी उपलब्ध है डा० अम्बेडकर ने जो महत्वपूर्ण बातें की हैं वे इस प्रकार हैं

*हिन्दू धर्म जब तक जातीय संकीर्णता में बंटे और जाति को ही अपनी संप्रभु इकाई मानने की मानसिकता से बाहर आकर हिन्दू धर्म को एक इकाई के रूप में स्वीकार कर इसकी  जातीय पहचान के स्थान पर इसकी आध्यात्मिक और दार्शनिक पहचान के रूप में इसका परिवर्तन नहीं करता , तब तक हिन्दू धर्म एकता के स्थान पर विभाजन को प्रेरित करेगा और इस मानसिकता को धर्म का आधार बनाकर चलने से यदि राजनीतिक स्वतंत्रता भी मिल गयी तो जातियों में विभाजित और जाति के प्रति अपनी निष्ठा रखने और अपनी जाति से बाहर के व्यक्ति या समाज से पूर्वाग्रह रखने से कभी सामाजिक एकता नहीं होगी और किसी भी विदेशी आक्रमण या चुनौती के सामने हिन्दू समाज फिर अपने पहले इतिहास को दुहराते हुए पराजित होगा|

*हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था को समाप्त करने के जो भी प्रयास हुए हैं वे अधिकतर संतों या समाज सुधारकों के द्वारा हुए हैं और उनका आग्रह हिन्दुओं को अधिक उदार बनते हुए सबके साथ समान व्यवहार करने का सन्देश रहा  और समाज से कहा कि ईश्वर की नजर में सभी उसके पुत्र हैं और उनमें कोई भेद नहीं है, परन्तु किसी ने भी जाति व्यवस्था के मूल और इस भेदभाव के मूल कारण वर्ण व्यवस्था और उसे हिन्दू धर्म  ग्रंथों द्वारा दी गयी स्वीकृति की निंदा नहीं की क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल वर्ण व्यवस्था है जो मनुष्य को समान नहीं मानती और श्रेणीबद्ध रूप से असमानता को धार्मिक रूप से शास्त्रों के द्वारा समर्थन किया जाता है|

* वर्ण व्यवस्था पर आक्रमण करते हुए भी डा० अम्बेडकर वर्ण व्यवस्था को मूल वैदिक समाज में समाज निर्धारण की व्यवस्था के रूप में इसकी निंदा नहीं करते और इसमें दो प्रश्न उठाते हैं , इस वर्ण व्यवस्था को इसके मूल रूप में भले ही गुण आधारित समाज विभाजन के रूप में स्थापित किया गया हो , परन्तु कालान्तर में ऋगवेद के पुरुष सूक्त के माध्यम से और फिर अनेक स्मृतियों के माध्यम से (जिनमें मनुस्मृति प्रमुख है) इसे कुछ वर्गों के विशेषाधिकार को सुरक्षित रखने और कुछ वर्गों को विशेषाधिकारों से वंचित करने के लिए छल के द्वारा हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग बना दिया गया |

* डा० अम्बेडकर ने वर्ण व्यवस्था के आधार पर भारत के समाज को गठित करने के सुझाव और आग्रह पर अपने विचार रखते हुए इस बात का उल्लेख किया है कि वर्ण व्यवस्था के आधार पर विशेषाधिकार आधारित भेदभाव की मानसिकता में श्रीमद्भगवतगीता के समय में कुछ सुधार हुआ जब सांख्य दर्शन के प्रभाव में श्रीकृष्ण ने चारों वर्णों की बात तो की परन्तु इसे व्यक्ति के व्यक्तित्त्व में अन्तर्निहित गुणों के आधार पर बांटा और इस बात को अस्वीकार किया कि व्यक्ति के पुश्तैनी कारोबार के आधार पर आवश्यक रूप से उसका वर्ण निर्धारित होगा | परन्तु डा० अम्बेडकर ने इसके साथ ही हिन्दू धर्म और समाज की नीयत पर भी सवाल उठाया है कि वर्ण व्यवस्था को गुण के आधार पर विकसित करने का गंभीर प्रयास नहीं किया गया कि ऐसी व्यवस्था बने जो इस बात का निर्धारण कर सके कि अपने वर्ण से कौन च्युत हुआ और कौन अपने वर्ण से उन्नत हुआ , सिद्धांत रूप में भले ही वर्ण व्यवस्था को गुण आधारित बता दिया गया हो परन्तु उसे वर्ण आधारित विभाजन के आधार पर कुछ वर्गों के विशेषाधिकार को बचाए रखने और कुछ वर्गों को विशेषाधिकार से वंचित करने के लिए ही प्रयोग किया गया |

* डा० अम्बेडकर ने हिन्दू समाज में वर्ण व्यवस्था की असमानता और जातीय संकीर्णता को समाप्त करने के लिए दो क्रांतिकारी सुझाव भी दिए |

एक है अंतरजातीय विवाह और दूसरा हिन्दू धर्म में मंदिरों में  पुजारी या कर्मकांड  के लिए निर्धारित किये जाने वाले पुरोहितों के लिए राज्य की ओर से योग्यता निर्धारित की जाए और इसे जन्म आधारित पेशा न मानकर योग्यता आधारित पेशा बनाया जाए|

अपने भाषण में उन्होंने हिन्दू धर्म शास्त्रों और धर्म को जातीय संकीर्णता और भेदभाव का मूलकारण बताते हुए इन्हें नष्ट करने की बात की , परन्तु उन्होंने अपने भाषण में ही इस बात को स्पष्ट कर दिया कि वे धर्म विहीन समाज की कल्पना नहीं करते बल्कि धर्म को ही समाज और राजनीति को गति देने वाला उपक्रम मानते हैं और इस क्रम में उन्होंने गुरु नानकदेव की प्रेरणा से सिख समाज की राजनीतिक शक्ति, समर्थ गुरु रामदास की प्रेरणा से शिवाजी महाराज की राजनीतिक शक्ति का उदाहरण देते हुए हिन्दू समाज का आह्वान किया कि वे अपने धर्म में समाज को एकता के सूत्र में बांधने के स्थान पर विभाजित करने के सन्देश के साथ आधुनिक विश्व के संदर्भ में अप्रासंगिक हो रहे तत्वों को त्याग कर नए स्वरुप में हिन्दू धर्म का दर्शन करने का साहस करें ताकि हिन्दू धर्म हिन्दू समाज को एक कर सके न कि उसे विभाजित करे |