डा० अम्बेडकर और धर्म परिवर्तन की घोषणा

0
70
Image- Forward press

डा० अम्बेडकर और धर्म परिवर्तन की घोषणा -गोलमेज सम्मेलन से पूना पैक्ट के मध्य के घटनाक्रम हिन्दू समाज और गांधी पर प्रभाव डाल रहे थे और देश के प्रमुख मंदिरों में अछूतों के प्रवेश के लिए संगठित प्रयास आरम्भ हो गए और गांधी ने स्वयं  इस दिशा में प्रयास आरम्भ किये और रंगा अय्यर ने केन्द्रीय विधानसभा में अस्पृश्यता निवारण बिल प्रस्तुत किया और बाम्बे लेजिस्लेटिव काउन्सिल में भी श्रीमान बोले ने इसी आशय का बिल प्रस्तुत किया| इसी दौरान गुरुयऊर मंदिर में अछूतों के प्रवेश को सुनिश्चित न होने की दिशा में अनशन करने का निर्णय गांधी ने लिया जिसे उन्होंने बाद में टाल दिया | इसी प्रकार गांधी ने अछूतों की समस्या को लेकर हिन्दू समाज को जागरूक करने की दिशा में “ हरिजन” नामक पत्र भी आरम्भ किया|

इन्हीं विषयों पर चर्चा के लिए गांधी ने डा० अम्बेडकर को चर्चा के लिए यरवडा जेल में बुलाया और डा० अम्बेडकर के जीवनीकार धनञ्जय कीर के  अनुसार 4 फरवरी 1933 को यरवडा जेल में  दिन में  12.30 पर दोनों की भेंट हुई और गांधी ने रंगा अय्यर का  और डा० सुब्बारायन का   अछूतों के सम्बन्ध में और गुरुययूर मंदिर में अछूतों के प्रवेश सबंधी बिल का समर्थन करने का अनुरोध किया , परन्तु डा० अम्बेडकर ने इन दोनों बिलों के समर्थन से इन्कार कर दिया क्योंकि उनके अनुसार इनमें अछूत प्रथा को एक पाप की संज्ञा नहीं दी गयी थी चातुर्वर्ण संबंधी विषय पर भी इसमें कोई चर्चा नहीं थी|

इस बातचीत में एक बात निकलकर आयी कि गांधी चातुर्वर्ण को समाप्त करने के पक्षधर नहीं थे और अछूतों को अलग पांचवें वर्ण से शूद्र की श्रेणी में लाने के पक्षधर थे परन्तु डा० अम्बेडकर चातुर्वर्ण व्यवस्था को जातीय विभेद का कारण मानते थे और इसे नष्ट किये जाने को हिन्दू धर्म में परिवर्तन की आवश्यक शर्त मानते थे  |

12 फरवरी 1933 को मंदिर प्रवेश बिल और इस आन्दोलन के सम्बन्ध में डा० अम्बेडकर ने बयान जारी कर इसका समर्थन करने से इन्कार कर दिया | इसी दौरान वीर सावरकर ने रत्नागिरी में निर्मित नए मंदिर के उदघाटन के लिए डा० अम्बेडकर को बुलावा भेजा और इस आमन्त्रण को अस्वीकार करते हुए डा० अम्बेडकर ने सावरकर की इस बात के लिए प्रशंसा की कि उन्होंने चातुर्वर्ण को समस्या मानते हुए इसे नष्ट करने का समर्थन किया है ,परन्तु डा० अम्बेडकर अब अछूतों की समस्या के विषय पर धार्मिक और सामाजिक आधार पर समाधान के दायरे से बढ़कर इसके राजनीतिक समाधान के लिए अधिक सक्रिय हो रहे थे  

यह वह दौर था जब लोगों को  इस बात पर आश्चर्य हुआ कि जब पूना पैक्ट के बाद रूढ़िवादी हिन्दू हिन्दू धर्म और समाज संरचना में सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रहे थे तो डा० अम्बेडकर ने अपना ध्यान इस सुधार में सहयोग से हटाकर अछूतों के लिए नयी संवैधानिक व्यवस्था में अधिक से अधिक राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने पर लगा दिया और गांधी ने अस्पृश्यता विरोधी लीग को बदलकर हरिजन सेवक संघ कर दिया था और इसके केन्द्रीय बोर्ड में डा० अम्बेडकर को स्थान दिया था परन्तु डा० अम्बेडकर ने यह कहते हुए इससे अपना सम्बन्ध तोड़ लिया कि इसका उद्देश्य अछूत समस्या के समाधान से अधिक अछूतों को कांग्रेस का सदस्य बनाना था और डा० अम्बेडकर को यह भी असुरक्षा सताने लगी थी कि अछूतों के मध्य उनकी लोकप्रियता और पकड़ को भी कम करने का प्रयास किया जा रहा है|

दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार अछूत परम्परा को  लेकर बिल और मंदिरों में उनके प्रवेश के बिल को लेकर आशंकित थी और उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कांग्रेस के इन प्रयासों से अछूतों में एक जागरूकता आ रही है जो राजनीतिक जागरूकता में बदलकर व्यापक स्वाधीनता आन्दोलन का अंग बन सकती है और इस जागरूकता को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इन बिलों को पारित होने से रोकने में रोड़े अटकाने आरम्भ किये और उन दिनों केन्द्रीय विधानसभा में किसी भी बिल को लाने के लिए वायसराय की अनुमति होनी आवश्यक थी और वायसराय किसी भी बिल को वीटो करते हुए उसे कानून का स्वरुप लेने से रोक सकता था और इसी के अनुरूप वायसराय ने इन सुधारों में अवरोध खड़ा किया और डा० अम्बेडकर शनैः शनैः नयी संवैधानिक व्यवस्था में अपने समुदाय के लिए समुचित गारंटी की अपेक्षा में ब्रिटिश सरकार के अधिक निकट जाने लगे और कांग्रेस व गांधी पर उनका अविश्वास बढ़ता गया | |

यही वह दौर था जब डा० अम्बेडकर का अछूतों के साथ हिन्दू धर्म छोड़ने का संकल्प मजबूत बन रहा था |

गोलमेज सम्मेलन के बाद वैश्विक परिस्थितियाँ बदल रही थीं और ब्रिटिश साम्राज्य अपने आर्थिक हितों के लिए अमेरिका पर अधिक निर्भर हो रहा था और  अनेक दबावों के मध्य भारत में नए संविधान और स्वशासन का खाका ब्रिटिश संसद धीरे धीरे तैयार कर रही थी और इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस मुस्लिम लीग को साथ लेकर ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा उठाये गए साम्प्रदायिक विभाजन के मुद्दे  और विभिन्न समुदायों के एक मंच पर आने की चुनौती का सामना कर रही थी और डा० अम्बेडकर नयी संविधानिक और राजनीतिक भूमिका में अछूतों के लिए उनका अलग स्थान और अधिकार दिलाने के लिए सामाजिक और राजनीतिक दोनों आधार पर संघर्ष कर रहे थे |

इसी दौरान 27 मई, 1935 को डा० अम्बेडकर की पत्नी रमा बाई का निधन हो गया और इस घटना ने डा० अम्बेडकर पर दोहरा प्रभाव छोड़ा | एक ओर पहली बार उन्होंने स्वयं को अंदर से कमजोर पाया और दूसरा हिन्दू धर्म के साथ उनका अंतिम जुड़ाव भी समाप्त हो गया क्योंकि उनकी पत्नी रमा बाई अत्यंत धार्मिक और आस्थावान महिला थीं , जिन्होंने अछूतों की स्थिति के समाधान के रूप में हिन्दू धर्म से अलग होने के   विकल्प को कभी  नहीं सोचा और बाल  विवाह के आरंभिक दिनों से जिन कठिनाइयों का सामना करते हुए रमा बाई ने डा० अम्बेडकर का साथ दिया और सारी असुविधा, कष्ट और पीड़ा का बोझ अपने ऊपर लेते हुए अम्बेडकर को अपना अध्ययन और फिर अपना मिशन पूरा करने के लिए उन्हें सभी घरेलू परेशानियों से दूर रखा उस त्याग और समर्पण के चलते डा० अम्बेडकर रमाबाई के जीवनकाल में उनकी हिन्दू धर्म में आस्था देखते हुए हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म में शामिल होने के विकल्प की घोषणा करने का साहस शायद नहीं कर सके   , परन्तु उनके निधन ने उनमें आमूलचूल परिवर्तन कर दिया और उन्होंने अक्टूबर , 1935 को योला सम्मेलन में अछूतों के साथ हिन्दू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म में शामिल होने की घोषणा की ,हालांकि इस घोषणा की चर्चा तो बहुत हुई परन्तु इस घोषणा को लेकर अगले एक वर्ष तक अनेक चर्चाएँ होती रहीं और स्वयं अछूतों की ओर से और डा० अम्बेडकर के अछूत वर्ग में भी  हिन्दू धर्म के बाहर जाने के सुझाव का खुले दिल से स्वागत नहीं हुआ और उनकी महार जाति छोड़कर अन्य अछूत जातियां विशेष रूप से जाटव जाति  इस निर्णय से सहमत नहीं थी और इसका विरोध कर रही थी   क्योंकि हिन्दू धर्म में सुधार की गति तेजी पकड़ रही थी और अछूतों को हिन्दू धर्म और समाज संरचना में अपने भविष्य के लिए संभावना दिख रही थी तो  ऐसी स्थिति में धर्म परिवर्तन से किसी को लाभ नहीं दिख रहा था और विशेष रूप से इस्लाम और ईसाई धर्म में परिवर्तन के बाद उनकी स्थिति में सुधार के स्थान पर  देश से ही उनके  अलगाव की संभावना अधिक थी और दूसरी ओर इस घोषणा को अछूतों की स्थिति में सुधार से अधिक हिन्दू धर्म को कमजोर करने वालों के लिए अधिक सुखद समाचार माना जा रहा था  और इस कारण डा० अम्बेडकर ने इस्लाम या ईसाई धर्म को विकल्प के रूप में स्वीकार करने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज करना आरम्भ कर दिया और ईसाई मिशनरियों और इस्लाम के प्रतिनिधियों को निराश ही होना पड़ा, अपनी धर्मांतरण की घोषणा के बाद डा० अम्बेडकर ने सिख धर्म स्वीकार करने के विकल्प पर गंभीरता से काम किया और इस सम्बन्ध में उन्होंने कांग्रेस , हिन्दू महासभा के नेताओं से लंबा विचार विमर्श भी किया और हिन्दू महासभा और कांग्रेस के नेता इस्लाम और ईसाइयत के स्थान पर सिख धर्म स्वीकार करने के डा० अम्बेडकर के विकल्प को कुछ हद तक स्वीकार करते दिखे क्योंकि उनकी नजर में सिख धर्म भारत की भूमि से उपजी उपासना पद्धति का ही अंग है और इस कारण इस धर्म को स्वीकार करने से अछूतों का राष्ट्रीय लगाव समाप्त नहीं होगा |

हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा के एक दो वर्ष बाद डा० अम्बेडकर ने इस विषय को ठंडे बस्ते में डाल दिया और स्वयं को  हिन्दू धर्म के शत्रु के रूप में नहीं वरन् हिन्दू धर्म के सुधारक के रूप में ही अपनी भूमिका को बनाये रखा और अपनी घोषणा के बाद भी अघोषित रूप से यह सन्देश हिन्दुओं को देते रहे कि आधुनिक विश्व व्यवस्था के अनुकूल हिन्दू धर्म और समाज संरचना में क्रांतिकारी सुधार की आवश्यकता है| डा० अम्बेडकर ने अपने धर्म परिवर्तन की घोषणा से हिन्दुओं को सोचने पर विवश किया और सभी राजनीतिक नेता जो भारत में  हिन्दुओं की संख्या और उनके भविष्य को लेकर तनिक भी चिंतित नहीं थे और धर्मांतरण जैसे विषयों को राजनीतिक दायरे से बाहर मानते थे , उन्हें हिन्दू समाज के एक बड़े वर्ग के हिन्दू धर्म से अलग होने से हिन्दू समाज के कमजोर होने और उसकी संख्या घटने  की चिंता सताने लगी क्योंकि भारत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है और इस बात के प्रमाण भी हैं कि देश में मुस्लिम और ईसाइयों की बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण धर्मांतरण रहा है और एक इतिहासकार होने के चलते डा० अम्बेडकर न केवल इस तथ्य से परिचित थे बल्कि इस घोषणा के प्रभावों से परिचित थे और इसी कारण उन्होंने घोषणा के बाद इस विषय को समाज में अध्ययन के लिए छोड़ दिया  और इसके लिए हिन्दू समाज में सुधार की दिशा में प्रयास के लिए पूना पैक्ट को स्वीकार करने की मानसिकता बढ़ी और एक आधुनिक भारत की भूमिका बनने लगी |

डा० अम्बेडकर की धर्मांतरण की घोषणा का हिन्दू समाज पर सकारात्मक परिणाम हुआ और 1936 में मैसूर की राज्य सरकार ने प्रसिद्ध दशहरा पर्व में हरिजनों को प्रवेश की अनुमति दी, त्रावणकोर राज्य ने एक आदेश पारित करते हुए राज्य द्वारा नियंत्रित 1,600 मंदिरों को अछूतों के लिए खोल दिया  | इस निर्णय के बाद हिन्दू महासभा ने ग्वालियर और इन्दोर के शासकों से भी ऐसे ही उदाहरण प्रस्तुत करने का अनुरोध किया |

कुल मिलाकर डा० अम्बेडकर की हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा ने अपेक्षित परिणाम दिखाए , इस विषय पर चर्चाएँ आरम्भ हुईं , अछूत वर्ग में भी इस विषय पर अलग राय थी और हिन्दू धर्म और समाज कुछ परिवर्तनों के लिए स्वयं को तैयार कर रहा था, परन्तु इस घटना के बाद देश में वातावरण अब पूरी तरह राजनीतिक आधार पर अपनी तैयारियों का चलने वाला था और अगले कुछ वर्षों तक डा० अम्बेडकर ने स्वयं को अनेक रूपों में  ढालने की तैयारी करनी आरम्भ कर दी थी | जिनकी चर्चा आगे के पृष्ठों में होगी |