डा० अम्बेडकर और हिन्दू धर्म भाग २

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अपने जीवन काल में डा० अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म की सामाजिक व्यवस्था का पुरजोर तरीके से विरोध किया और इसकी वर्ण व्यवस्था से उत्पन्न असमानता को हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी बताया ,परन्तु उनके निधन के अनेक दशकों बाद जब 1987 में महाराष्ट्र सरकार के प्रयासों से उनके लेखन और भाषणों का संग्रह प्रकाशित हुआ तो “ Riddles in Hinduism” नामक पुस्तक विवाद का कारण बनी और महाराष्ट्र से बाहर जब उत्तर भारतीय राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश में सामाजिक परिवर्तन का राजनीतिक आन्दोलन “ बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” के नारे तले पहुंचा तो इस पुस्तक में प्रकाशित अनेक सामग्री इस आन्दोलन का वैचारिक आधार बन गयी और इसे अम्बेडकरवादी विचारधारा का अभिन्न अंग बना दिया गया | इस पुस्तक के कुछ अंशों  को लेकर महाराष्ट्र में विवाद भी हुआ और राज्य के हिंदूवादी राजनीतिक दल ने इसे लेकर जो विरोध किया उसके परिणामस्वरुप दंगे भी हुए और अन्त में इस पुस्तक के साथ महाराष्ट्र सरकार की ओर से अलग से सफाई के रूप में प्रकाशित किया गया कि उन अंशों से महाराष्ट्र सरकार सहमत नहीं है|

“ Riddles in Hinduism” में यह भाग राम और कृष्ण को लेकर है और कुछ ऐसे प्रश्न उठाये गए हैं या कहें कि कुछ ऐसे आरोप लगाए हैं जो इन दोनों को विष्णु का अवतार मानने वाले आस्थावान हिन्दू समाज के लोगों को आपत्तिजनक लग सकते हैं| हालांकि पूरी पुस्तक पढ़ने पर और जीवन भर डा० अम्बेडकर द्वारा हिन्दू धर्म की आलोचना जिन कारणों और आधारों पर  की जाती रही और वैचारिक आलोचना में जिस शालीनता और मर्यादा का पालन डा० अम्बेडकर करते आये थे उस पृष्ठभूमि में इस पूरी पुस्तक में राम और कृष्ण पर की गयी उनकी टिप्पणियाँ उनकी मौलिक टिप्पणियाँ हैं या उनके नाम पर इसे प्रक्षिप्त कर इसके आस पास एक राजनीतिक और बौद्धिक विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया इस तथ्य से इन्कार भी नहीं किया जा सकता |

राम और कृष्ण पर जो टिप्पणियाँ की गयी हैं वो टिप्पणियाँ लम्बे समय से बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के  विमर्श का हिस्सा रही हैं या फिर आम तौर पर ईसाई मिशनरियां इन तर्कों के सहारे हिन्दू धर्म पर प्रहार करते हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए इनका प्रयोग करती दिखती हैं ताकि हिन्दुओं के दो आदर्श पुरुष और संस्कृति के मानबिंदु राम और कृष्ण को लोगों की नजरों में दूषित किया जा सके  दूषित और हिन्दुओं में  इनके  आदर्श के प्रति भ्रम  उत्पन्न की जा सके| यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि डा० अम्बेडकर ने अपने जीवन काल में अपने लेखन, भाषण या अन्य माध्यमों से स्वयं को व्यक्त करने के क्रम में राम और कृष्ण के आदर्श को कभी लांक्षित करने का प्रयास नहीं किया और उनका पूरा ध्यान मनु पर था और वर्ण व्यवस्था पर था और उन्होंने स्वयं इस तथ्य को स्वीकार किया थी  कि ईसाई मिशनरियां भारत में हिन्दुओं का  धर्मान्तरण करने  के लिए कृष्ण को ईसा मसीह के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास करती हैं और इसी आधार पर ईसाई धर्म को श्रेष्ठ बताती हैं पर इस प्रयास में उनकी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है| ( Christianizing the Untouchables) | ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि राम और कृष्ण के बारे में जो भी अध्याय इस पुस्तक में डा० अम्बेडकर के निधन के बाद प्रकाशित हुआ है उसमें अपने हिसाब से हेर फेर हुई हो| इसका अधिक विस्तार आगे के पृष्ठों में है|  

“ Riddles In Hinduism”में जो प्रश्न राम और कृष्ण को लेकर उठाये गए हैं वे कोई नए नहीं हैं और विशेष रूप से बौद्ध साहित्य का अंश लम्बे समय से रहे हैं और स्वयं को वामपंथी और विशेष रूप से कम्युनिष्ट व द्रविड़ राजनीति के वैचारिक विमर्श से जुड़े लोग इन प्रसंगों की चर्चा अधिक करते हैं |

जैसे राम का सुग्रीव के भाई बालि का वध करना अनैतिक था , क्योंकि यह संघर्ष दो भाइयों का था और राम ने इसमें हस्तक्षेप करते हुए अपने आर्य आदर्शों के खोखलेपन का प्रदर्शन किया|

राम का अपनी पत्नी सीता के प्रति आचरण पूरी तरह नारी विरोधी था और उन्होंने सीता के सम्मान के बजाय अपने सम्मान की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया था और युद्ध समाप्त होने के बाद सीता की अग्नि परीक्षा लेना, नारी उत्पीड़न के बराबर था जो राम को मर्यादा पुरुष के पद से नीचे ले जाता है|

इसी प्रकार अयोध्या में लौटकर राजतिलक होने के बाद अपनी प्रजा में सीता को लेकर हो रही काना फूसी के चलते गर्भवती स्थिति में सीता की जानकारी के बिना गोपनीय ढंग से लक्ष्मण को आदेश देकर राम ने उन्हें फिर से वन में भेज दिया | वर्षों बाद जब राम को महर्षि वाल्मीकि से पता चला कि लव और कुश राम के पुत्र हैं तो राम ने एक बार फिर सीता को अपने सतीत्व की परीक्षा देकर अपना महारानी का स्थान लेने का आग्रह किया और इस बार सीता ने महारानी बनने के स्थान पर धरती की गोद में समा जाना अधिक उचित समझा|

राम के व्यक्तित्व पर तीसरा आरोप जो उन्हें मर्यादा पुरुष के स्तर से नीचे लाता है वह है एक शूद्र शम्बूक का वध| रामराज्य में असमय मृत्यु नहीं होती थी परन्तु एक दिन राजदरबार में एक ब्राहमण अपने पुत्र का शव लेकर आया जिसकी असमय में मृत्यु हो गयी थी और जब राम ने नारद से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आपके राज्य में एक शूद्र ने वर्ण व्यवस्था द्वारा स्थापित नियम का भंग किया है और वह ब्राहमण अवस्था प्राप्त करने के लिए तप कर रहा है जो कि किसी शूद्र के  लिए वर्जित है और वर्ण व्यवस्था के इसी नियम भंग के चलते आपके राज्य में ब्राह्मण के पुत्र की असमय मृत्यु हुई है और इस तथ्य को जानकर राजा राम ने शम्बूक की खोज करनी आरम्भ की और काफी प्रयासों के बाद एक घने जंगल में शम्बूक तपस्या करता दिखाई पड़ा और राजा राम ने  उसकी गर्दन को धड़ से अलग कर उसका वध कर दिया |

राम पर उठाये गए इन प्रश्नों के साथ कृष्ण की नैतिकता पर अनेक प्रश्न खड़े किये गए हैं | जैसे खांडवप्रस्थ में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में कृष्ण की अग्रपूजा को लेकर शिशुपाल की आपत्ति के बाद उसके द्वारा की जाने वाली असभ्यता की गिनती करते हुए कृष्ण का सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन को धड़ से अलग कर देना |

बौद्ध स्रोतों के उल्लेख के आधार पर प्राचीन हिन्दू व्यवस्था में भाई, बहन के मध्य विवाह, पिता- पुत्री के मध्य विवाह और सम्बन्ध जैसे विषयों को सिद्ध करने के लिए राम और सीता को भाई बहन भी इस पुस्तक में सिद्ध करने का प्रयास हुआ है| इसी प्रकार ब्रह्मा सहित कुछ अन्य ऋषियों के उदाहरण से यह सिद्ध करने का प्रयास हुआ है कि प्राचीन हिन्दू व्यवस्था में नैतिकता और व्यवस्थित पारिवारिक संस्था जैसी चीज नहीं थी|

कृष्ण का गोकुल में गोपियों के संग रास रचाना , गोपियों का वस्त्र हरण| रुक्मिणी का हरण | कृष्ण का अनेक विवाह करना | कृष्ण का अपनी बहन सुभद्रा का अर्जुन से विवाह करवाना | नरकासुर के वध के बाद उसकी कैद में रही 16,000 स्त्रियों से विवाह करना | महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय के लिए अनेक अनैतिक मार्ग अपनाना आदि |

इसके साथ ही वैदिक काल में ब्राहमणों द्वारा गोमांस को आतिथ्य का प्रतीक बनाकर रखना , ब्राहमणों द्वारा मदिरा का सेवन करना , वैदिक काल में ऋषियों की पत्नियों के साथ इंद्र सहित अन्य देवताओं का व्यभिचार | वैदिक काल सहित महाभारत काल तक ऋषियों का अनैतिक और कामुक चरित्र और उपनिषद काल में भी परिवार संस्था का सम्मान न होते हुए नियोग जैसी अराजक और अनैतिक व्यवस्था के उल्लेख से “ Riddles in Hinduism” ने देश के बौद्धिक समाज के समक्ष ईमानदार बौद्धिक विमर्श के लिए अत्यंत कठिन विकल्प प्रस्तुत कर दिए और इन अतिशय विवादित उल्लेखों और प्रश्नों के साथ मनुस्मृति पर किये गए आक्रमण ने एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिसकी पृष्ठभूमि में डा० अम्बेडकर के हिन्दू धर्म के साथ सम्बन्ध इतने कटु हो जाते हैं कि उनकी घरवापसी का कोई भी   प्रयास  लगभग ऐसे बिंदु पर जाता हुआ दिखाई देता है  जहां से वापसी लगभग असंभव दिखाई देती है, परन्तु इन तथ्यों के बाद भी कुछ संभावना बच जाती है , क्योंकि यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है कि “ Riddles in Hinduism” में उपर्युक्त सभी तथ्यों और उल्लेखों में से मनुस्मृति के आधार पर  हिन्दू  सामाजिक सरंचना और समाज व्यवस्था को लेकर किये आक्रमणों  के अतिरिक्त अधिकतर  विषय ऐसे हैं जिन पर डा० अम्बेडकर ने अपने जीवन काल में अपने लेखों , भाषणों में कभी  कोई उल्लेख नहीं किया और हिन्दू धर्म को लेकर उनका पूरा ध्यान इसकी समाज व्यवस्था, चार वर्ण की संरचना और वैदिक काल से मनुस्मृति काल तक चार वर्ण की विसंगतियों को दिखाना, ऋग्वेद में पुरुषसूक्त के उस बहुचर्चित श्लोक को बाद के काल में प्रक्षिप्त सिद्ध करना था जिसमें चार वर्णों के विभाजन का वर्णन है और चार वर्ण की इस परिकल्पना में विसंगति और   और इसके मौलिक स्वरुप में इसे न बचा पाने की असफलता से उभरे उनके प्रश्न  और समाज के विस्तार के साथ श्रेणीबद्ध रूप से वर्ण आधारित असमानता को बनाये रखने के लिए   कुछ वर्णों को विशेष सुविधा और विशेषाधिकार देने के क्रम में मनुस्मृति सहित अनेक स्मृतियों को इसके लिए उन्होंने  दोषी ठहराया  है   और   इसी बौद्धिक विमर्श के इर्द गिर्द  उनका आक्रमण उनके बौद्धिक विमर्श और आन्दोलन का प्रमुख और निरंतर पक्ष था , ऐसे में “ Riddles in Hinduism” में उनके निधन के अनेक वर्षों के बाद प्रकाशित उनके विचार और तथ्य इस अवधारणा और संदेह को अधिक जन्म देते हैं कि एक बौद्ध अनुयायी होने के चलते उन्होंने अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अपने प्रतिद्वंदी धर्म पर आक्रामक होने की स्वाभाविक रणनीति अपनाई या फिर उनके नाम पर उन तथ्यों को प्रक्षेपित किया गया जिन्हें उनके लिए प्रमाणित कर पाना डा० अम्बेडकर के लिए अब संभव नहीं है| “ Riddles in Hinduism” के “ Riddles of Ram and Krishna” नामक अध्याय में अनेक विसंगतियां हैं जैसे अनेक स्थानों पर मूल स्रोत का उल्लेख नहीं है या फिर पुस्तक में नीचे फूटनोट में लिख दिया गया है कि इस तथ्य को प्रमाणित करना या फिर इसके स्रोत के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता , अनेक स्थानों पर बातें अधूरी रह गयी हैं और उस स्थान को खाली छोड़ दिया है| | राम के सम्बन्ध में जितनी भी आपत्तिजनक बातें है या फिर जिन्हें मनगढ़ंत कहा जा सकता है उनका आधार या तो बौद्ध जातक रामायण है या फिर सनसनीखेज और आरोपजनक बातों का मूल स्रोत ही नहीं बताया गया है या फिर वाल्मीकि रामायण के उन सर्गों और श्लोकों को स्रोत दिखाया गया है जो आपस में मेल नहीं खाते  | इसी प्रकार इस पुस्तक के विवादित या आपत्तिजनक अंशों को संस्कृत ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद का आधार दिया गया है , जबकि अपने जीवन काल में डा० अम्बेडकर ने संस्कृत ग्रंथों के आधार पर जो पुस्तक लिखी उसमें उन्होंने संस्कृत के विद्वानों के मौलिक लेखन को भी आधार बनाया है , केवल यूरोप के अंग्रेजी अनुवाद वालों को नहीं |

डा० अम्बेडकर ने वेदों, स्मृतियों , उपनिषद सहित अनेक संस्कृत ग्रन्थों के हवाले से जो पुस्तक अपने जीवन काल में लिखी थी वे दो पुस्तकें थीं “ Who were Shudras?” और “ Who were untouchables” और इन दोनों ही पुस्तकों में मूल संस्कृत ग्रंथों के स्रोतों को लेकर डा० अम्बेडकर का भाव और उनकी शैली उनके निधन के बाद प्रकाशित पुस्तक से पूरी तरह भिन्न है| अपने जीवन काल में प्रकाशित दोनों ही पुस्तकों में उन्होंने वेदों, स्मृतियों और उपनिषदों के प्रति अवमानना का भाव प्रदर्शित नहीं किया है और अपनी प्रस्तावना में भी उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि उनका स्रोत संस्कृत के अंग्रेजी अनुवाद के अतिरिक्त लोकमान्य तिलक और आर्य समाज के लेखन भी रहे हैं और उनके जीवन काल में प्रकाशित दोनों पुस्तकों में एक बौद्धिक और तार्किक व्यक्ति की भांति पूरी गरिमा और मर्यादा के साथ तथ्यों के दायरे में बात की गयी है , परन्तु उनके निधन के बाद प्रकाशित पुस्तक को लेकर संदेह होना स्वाभाविक है क्योंकि इस पुस्तक की भूमिका कांचा इलैया ने लिखी है और उन्होंने अपनी भूमिका में पूरी तरह डा० अम्बेडकर के विचारों के प्रतिकूल बातें की हैं |

डा० अम्बेडकर ने 1927 में जब महाड़ सत्याग्रह किया और इसी सत्याग्रह में उन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया था और   तो भी इस सत्याग्रह के कारण को घोषित करते हुए उन्होंने अपने समर्थकों को महाभारत का उदाहरण दिया और इस संघर्ष को हिन्दू धर्म के विरुद्ध नहीं वरन् हिन्दू धर्म में सुधार के लिए उसी तरह अर्जुन का संघर्ष बताया जैसा उन्होंने अपने ही बन्धु बांधवों के विरुद्ध किया था और डा० अम्बेडकर के अनुसार उनका संघर्ष भी हिन्दू धर्म में सुधार के लिए अपने ही बन्धु बांधवों से है|

इसी प्रकार जब इस सत्याग्रह में उनके सामने यह प्रस्ताव आया कि इस अभियान को हिन्दू धर्म के चातुर्वर्ण में एक वर्ण विशेष के विरुद्ध घोषित किया जाए तो उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया और इस वर्ण को अपना शत्रु मानने से मना किया  और स्वयं को हिन्दू धर्म के भीतर एक सुधारक की आवाज बताया जिसका संघर्ष चातुर्वर्ण व्यवस्था की विसंगति से है न कि हिन्दू धर्म या उसके किसी वर्ण से|  

इसी प्रकार डा० अम्बेडकर अपने समर्थकों को द्रोणाचार्य के आत्मसम्मान और कच की तरह निष्ठा की शिक्षा देते थे| यह अजीब बात है कि यदि डा० अम्बेडकर को हिन्दू समाज संरचना में एक वर्ण विशेष से घृणा होती तो वे उस वर्ग के व्यक्ति द्रोणाचार्य  को आदर्श क्यों बताते ? इसी प्रकार कच भी देवों के गुरु वृहस्पति का पुत्र था ( कच देवों के गुरु वृहस्पति के पुत्र थे और असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के सहयोग से मृत संजीवनी का रहस्य सीखना चाहते थे और इस क्रम में जब कच को देवयानी से वास्तविक प्रेम हो गया तो भी उसने अपने कर्तव्य को प्रमुखता दी और देवयानी के प्रेम के सहारे मृत संजीवनी विद्या सीख ली)  तो यह उदहारण भी क्यों आता? यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्ति का सहज मनोविज्ञान होता है कि वह उसी को आदर्श के रूप में देखता है जिससे वह घृणा नहीं करता | ऐसे में जब “Riddles in Hinduism” में कांचा इलैया की भूमिका पढ़ी जाती है तो आश्चर्य में डाल देती है , वे ईसाइयों के जेसुइट ग्रुप को दोष देते हैं कि वे भी हिंदुत्व का विरोध नहीं करते और राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के प्रयासों की चर्चा करते हैं कि डा० अम्बेडकर के निधन से पहले बौद्ध धर्म स्वीकार करने के उनके निर्णय के बाद भी हिन्दू के रूप में उनके जन्म लेने के चलते उनकी घर वापसी का प्रयास इस संगठन की ओर से किया जा रहा है और इस क्रम में उन्होंने हिन्दू धर्म और समाज संरचना में हो रहे सुधारों से इन्कार नहीं किया है | इसी प्रकार कृष्ण को यदुकुल का घोषित करते हुए भी  उन्हें पिछडा न मानकर वर्ण व्यवस्था का पोषक बताते हैं जिन्होंने जरासंध और कंस का वध किया क्योंकि वे शोषित  वर्ग से थे और उनका वध कर  कृष्ण ने यथास्थिति को स्थापित किया| कांचा इलैया की यह भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भूमिका डा० अम्बेडकर के विचार और दर्शन से मेल खाने से अधिक 1972 में महाराष्ट्र में आरम्भ हुए दलित पैंथर्स के विचार और दर्शन से मेल अधिक खाती है , जिसने अम्बेडकरवाद के सहारे मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष और ईसाई मिशनरी के हितों के अनुरूप एक भ्रामक वैचारिक विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया और 1980 के दशक में इसी वैचारिक विमर्श के आधार पर देश के उत्तर भारतीय राज्यों में दलित आन्दोलन की जड़ें जमायी गयीं जिसका अधिक उद्देश्य सामाजिक समरसता और सामजिक न्याय नहीं था वरन् मार्क्सवादी और ईसाई मिशनरी के गठबंधन से हिन्दू धर्म और समाज को कमजोर करना था और इस कार्य के लिए डा० अम्बेडकर की पुस्तक “ Riddles In Hinduism” के आधार पर एक वितंडावाद खड़ा किया गया और इसका बौद्धिक विश्लेषण होने से अधिक इसे विवाद बढ़ाने और जातीय टकराव के लिए उपयोग किया गया |

डा० अम्बेडकर ने अपने जीवन में अपने लेखन और भाषण में वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध अपने संघर्ष को मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष के नजरिये से नहीं देखा और कांचा इलैया की व्याख्या भी उनसे मेल नहीं खाती और इस कारण पुस्तक की भूमिका में कांचा इलैया के कृष्ण को लेकर  कथन डा० अम्बेडकर के भारत में ईसाई मिशनरियों के विचार के साथ मेल कराये जाएँ तो आशंका अधिक गहरा जाती है क्योंकि कृष्ण को ईसा मसीह के साथ खड़ा करते हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाने के प्रयास का उल्लेख डा० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तिका “ Christianizing the untouchables” में किया है और इस आधार पर यह प्रमाणित होता है कि डा० अम्बेडकर के निधन के बाद प्रकाशित हुई उनकी पुस्तक “ Riddles in Hinduism” को डा० अम्बेडकर के विचारों और लेखों से असंगत ही पाया जाएगा |

डा० अम्बेडकर के हिन्दू धर्म छोड़ने के संकल्प के बाद देश विदेश में ईसाई मिशनरियों ने न केवल उन्हें घेरे रखा बल्कि अनेक माध्यमों से इस बात को उनके  जीवन काल में प्रचारित करते रहे कि अमेरिकन बैपटिस्ट चर्च में उनका बपतिस्मा होने वाला है और डा० अम्बेडकर को इस सम्बन्ध में अनेक सम्मेलनों और समाचार पत्रों में यह स्पष्ट करना पड़ा कि अमेरिकन बैपटिस्ट चर्च के लोग उनके सम्पर्क में रहते हैं परन्तु उनका ईसाई धर्म स्वीकार करने का इरादा नहीं है|

वर्ष 2014 में भारत में एक ईसाई मिशनरी आगस्टीन कंजमला ने अनेक बर्षों के शोध के बाद “ Future of Christian         Mission in India” पुस्तक लिखी और उसमें अत्यंत विस्तार से भारत में दलित आन्दोलन का उल्लेख किया और इसके लिए गाड की स्पिरिट को श्रेय दिया और इसी क्रम में दावा भी किया डा० अम्बेडकर ने वर्ष 1939 में अमेरिकन बैपटिस्ट चर्च के पादरी से गुप्त रूप से बपतिस्मा का आग्रह किया था , यह दावा भी उसी क्रम का हिस्सा है जो डा० अम्बेडकर को अपने दायरे में लाने के लिए ईसाई मिशनरियों ने उनके जीवन काल में किया था |

इस तथ्यों के प्रकाश में और डा० अम्बेडकर के निधन के बाद प्रकाशित पुस्तक में उनकी शैली और मूल स्रोतों के साथ विसंगति को  देखते हुए यह निष्कर्ष निकालना अतिशियोक्ति नहीं है कि 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स के गठन के बाद डा० अम्बेडकर के नाम पर उनके साहित्य को मनमाना रूप देकर मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष और ईसाई मिशनरी के मिश्रण से एक नया वाद स्थापित किया गया और उसी आधार पर उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत में वामसेफ जैसे संगठनों ने डा० अम्बेडकर का नाम लेकर उनके विचार और भाव से उपजी विश्वसनीयता का लाभ उठाकर  सामाजिक न्याय के नाम पर वर्ग संघर्ष की तर्ज पर जातीय संघर्ष का बीज बोया  और इसे अम्बेडकरवाद का नाम देकर डा० अम्बेडकर को एक संकीर्ण जातीय और नकारात्मक स्वरुप से दिया गया |