डा० अम्बेडकर और हिन्दू धर्म भाग ३

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“ Riddles In Hinduism” के एक अध्याय  का शीर्षक  “ Madness of Manu” है  और इस अध्याय  मनुस्मृति के अनेक श्लोकों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि तत्कालीन हिन्दू व्यवस्था में स्त्री की स्थिति दोयम दर्जे की थी और विचित्र बात यह है कि मनु को इसके लिए दोषी सिद्ध करते हुए वैदिक काल में अनेक विदुषी स्त्रियों गार्गी , अपाला का उल्लेख करते हुए डा० अम्बेडकर स्वीकार करते हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों को सम्मान और उनकी विद्वता की स्वीकृति थी और यह अध्याय अधिक तार्किक दिखता है और इस विषय पर अपने जीवन काल में भी डा० अम्बेडकर ने लिखा और बोला था,  मनु पर उनका अधिकतर आक्रमण एक उनकी एक सोची समझी रणनीति का अंग है और उनके जीवनीकार धनञ्जय कीर ने उल्लेख भी किया है कि अपने जीवन काल में डा० अम्बेडकर ने इस बात को स्वीकार किया था कि मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाना और उस पर आक्रमण उनकी रणनीति का अंग था और इस अभियान से और मनु पर आक्रमण से उन्हें हिन्दू धर्म के प्रमुख स्तम्भ को हिलाने का अवसर मिल रहा था ताकि हिन्दू धर्म में सुधार की गति अधिक तीव्र हो और विशेष रूप से हिन्दू धर्म में बौद्धिकता को नियंत्रित करने वाले वर्ण अधिक सक्रिय हों और इसी कारण मनु पर आक्रमण उनकी रणनीति का अंग था , क्योंकि वे स्वयं भी स्वीकार करते थे कि मनु कोई पागल व्यक्ति नहीं थे और उन्होंने अनेक उपयोगी बातें भी की हैं और मनु से उनका विरोध मात्र है कि मनु ने वर्ण व्यवस्था को और कठोर करने के लिए शास्त्रीय, तार्किक और धार्मिक अधिकार प्रदान किये और इसी प्रकार उन्होंने चार वर्णों के दायरे  से बाहर पंचम वर्ण और वर्ण शंकर लोगों को समाज में अवमानना का स्तर प्रदान कराया |  

ऐसे में उनके निधन के बाद प्रकाशित पुस्तक के एक अध्याय का शीर्षक “ Madness of Manu” अपने आप में यह प्रश्न खड़ा करता है कि शीर्षक को सनसनीखेज बना दिया गया परन्तु उस अध्याय की सामग्री उतनी उत्तेजक और विवादित नहीं है वरन् अनेक तथ्यात्मक आधार पर वैचारिक आदान प्रदान और विमर्श को प्रेरित करती है, रही बात   भारत में स्त्रियों की दशा को लेकर  मनु पर आक्रमण की तो इसका एक और भी कारण है, देश , विदेश में होने वाले बौद्धिक विमर्श में इस विषय पर दो पक्ष के मध्य बौद्धिक , तार्किक बहस चलती थे, एक पक्ष  मनु से पहले गौतम बुद्ध को इसके लिए दोषी ठहराता था और महापरिनिर्वाण सुत्त में बुद्ध द्वारा अपने निकटतम शिष्य आनंद को बौद्ध मठ में भिक्षुणियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध के उनके कथन को इसके प्रमाण के  रूप में प्रस्तुत करता था  जाता था और  बुद्ध के दर्शन में  स्त्रियों को समान दर्जा  न देने का दावा करता था,  और इसी अवधारणा का खंडन करने के लिए डा० अम्बेडकर ने अत्यंत आक्रामकता से अपनी विद्वता का उपयोग करते हुए मनुस्मृति से अनेक श्लोकों के माध्यम से मनु को स्त्री पर प्रतिबन्ध लगाने वाला नियम रचित करने वाला सिद्ध करने का प्रयास किया |

डा० अम्बेडकर के मनुस्मृति पर लगातार आक्रमण और उन्हें हिन्दू धर्म की प्रगतिशीलता में बाधक तत्व के रूप में देखने का एक ऐतिहासिक कारण है उस संदर्भ को समझे बिना हम मनुस्मृति पर डा० अम्बेडकर के आक्रमण को आधे अधूरे संदर्भ में ही समझ पायेंगे |

डा० अम्बेडकर ने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा पास की तो उनकी महार जाति में इसे एक उपलब्धि माना गया और उनका अभिनंदन किया गया और इस अवसर पर उनके अध्यापक ने उन्हें गौतम बुद्ध की एक जीवनी सौंपी और इस पुस्तक के प्रभाव से  डा० अम्बेडकर ने  भारत के इतिहास और परम्परा को एक नए दृष्टिकोण  के साथ देखना आरम्भ किया और वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल के भारत में उन्होंने पहले वैदिक काल, फिर वैदिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह के रूप में बौद्ध धर्म के राजधर्म के रूप में विकसित होने और एक व्यापक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के रूप में विकसित होते देखा और डा० अम्बेडकर के अनुसार मौर्य काल बौद्ध व्यवस्था का स्वर्ण काल था , हालांकि उन्होंने चाणक्य के अर्थशास्त्र की प्रशंसा की है और बौद्ध दर्शन के समाज में व्यापक प्रभाव के परिणाम के रूप में इस पुस्तक को अपेक्षाकृत अधिक उदार और तार्किक माना है जिसका उद्देश्य वर्ण व्यवस्था की श्रेणीबद्ध असमानता के हितों को बचाने के स्थान पर राज्य व्यवस्था और समाज व्यवस्था के लिए कानून बनाना रहा है|

डा० अम्बेडकर पुष्यमित्र शुंग के काल को एक प्रतिक्रान्ति का दौर मानते हैं जब हिन्दुओं ने एक बार फिर वैदिक काल की व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयास के रूप में सामाजिक और राजकीय प्रभाव प्राप्त किया और वैदिक व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयास में मनुस्मृति की रचना की गयी और इसमें दो विशेष प्रयास किये गए कि समाज में वह वर्ग जो चार वर्ण के दायरे में नहीं आ पा रहा था और  स्वाभाविक रूप से उसका आकर्षण बौद्ध धर्म और श्रमण परमपरा की ओर था और इसके साथ स्त्री को भी वैदिक व्यवस्था में अधिक पाबंदियां होने के चलते उनके भी बौद्ध धर्म और श्रमण परम्परा की ओर झुकने की संभावना थी और इसी कारण डा० अम्बेडकर का अपना निष्कर्ष है कि मनुस्मृति में योजनाबद्ध रूप से पंचम वर्ण के प्रति समाज में हीन भावना का निर्माण किया गया ताकि समाज में अपने प्रति असम्मान का भाव देखते हुए यह वर्ग बौद्ध धर्म और व्यवस्था के प्रति आकर्षित नहीं होगा और अधिकतर यही वर्ग समाज का श्रमिक वर्ग था जो समाज की गतिशीलता के लिए उत्तरदायी था और इस कारण उसे रोकना आवश्यक था  और इसी के साथ स्त्री को भी बौद्ध धर्म या व्यवस्था के प्रति आकर्षित होने से रोकने के लिए उस पर अत्यंत कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए और मनुस्मृति में वर्ण शंकर जातियों की सूची पर भी सवाल उठाते हुए डा० अम्बेडकर इसे तात्कालिक राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल वर्ण व्यवस्था को अधिक कठोर करने और अंतर्जातीय विवाहों को रोकते हुए वर्ण व्यवस्था के सामने उत्पन्न हो रही चुनौती से बचने के लिए चतुर प्रयास की संज्ञा देते हैं , उनके अनुसार मनुस्मृति में वर्ण शंकर की लम्बी सूची से महाभारत काल से ही अंतर्जातीय विवाहों की परम्परा दिखती है और वर्ण शंकर के रूप में उतपन्न हुई नयी जातियों को चातुर्वर्ण में समाहित करना और वर्ण व्यवस्था के अनुरूप उनके लिए सामाजिक कानून निर्माण करना एक नयी चुनौती हो गयी थी |

डा० अम्बेडकर के अपने निष्कर्षों और उनके खंडन में दिए गए तर्कों पर यदि इस पुस्तक में चर्चा की गयी तो इस पुस्तक का दायरा न केवल व्यापक हो जाएगा बल्कि यह एक धार्मिक बहस का स्वरुप ग्रहण कर लेगा , इसलिए इस पुस्तक का उद्देश्य केवल उन ऐतिहासिक संदर्भों और परिस्थितियों का उल्लेख भर कर देना है जिसकी पृष्ठभूमि में डा० अम्बेडकर ने मनुस्मृति को हिन्दू धर्म और समाज की अनेक समस्याओं के लिए उत्तरदायी ठहराते हुए इसकी निंदा और इसके विचारों के त्याग को हिन्दू धर्म और समाज के न्यायप्रिय और युगानुकूल होने की पहली शर्त ठहरायी|

मनुस्मृति को लेकर डा० अम्बेडकर के विचारों की जो ऐतिहासिक और वैचारिक भूमिका रही है और अपने विचारों को लेकर जिस प्रकार उन्होंने  जीवन के अपने अधिकाँश समय में निरंतरता बनाए रखी , उसे देखते हुए मन में यह विचार अवश्य आता है कि यदि हिन्दू धर्म की उनकी आलोचना और समीक्षा में राम और कृष्ण पर उनके विचारों को भी स्थान प्राप्त होता तो अपने जीवन काल में भी उन्होंने इन अति विवादित और आपत्तिजनक संदर्भों को अवश्य अपनी चर्चा का हिस्सा बनाया होता और इसी कारण इस आशंका और संदेह से इनकार कर पाना कठिन है कि उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित उनकी पुस्तक में वैदिक काल, हिन्दू धर्मशास्त्र और दर्शन सहित मनुस्मृति पर  अधिकतर विचार उनके हैं पर सुविधानुसार डा० अम्बेडकर के साहित्य में कुछ ऐसे प्रसंग भी जोड़ दिए गए हैं जो बौद्धिक विमर्श के लिए मार्ग प्रशस्त करने के स्थान पर , राजनीतिक टकराव को अधिक सहज बनाते हैं और इसी कारण डा० अम्बेडकर के हिन्दू धर्म पर विचारों की समीक्षा करते हुए उनके जीवन काल में उनके लेखन और भाषण में जिन विषयों और संदर्भों पर निरंतरता कायम रही है और जिन विचारों का ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ सिद्ध किया जा सकता है उन्हीं विचारों को डा० अम्बेडकर के विमर्श का हिस्सा मानकर चलना अधिक तार्किक पक्ष दिखता है और इसी कारण “ Riddles in Hinduism” में उनके कुछ प्रश्न तार्किक दिखते हैं और कुछ संदेह और आशंका को जन्म देते हैं और इन्हीं प्रश्नों को तथाकथित दलित , मार्क्सवादी और ईसाई मिशनरी के संयुक्त गठबंधन ने हिन्दू विरोधी संयुक्त प्रयास का हिस्सा बना रखा है और इस कारण इस आधार पर  डा० अम्बेडकर पर कोई निष्कर्ष निकालने से पूर्व सतर्कता बरतने की आवश्यकता है , क्योंकि डा० अम्बेडकर ने अपने जीवनकाल में व्यक्तित्व , लेखन , भाषण और व्यवहार से  यह सिद्ध कर दिया था कि वे व्यापक संदर्भ में किसी विषय को देखते थे और भावनात्मक आवेश या अपने  व्यक्तिगत जीवन के  अनुभव को व्यापक संदर्भ के विषयों से सम्बंधित विचारों पर किसी भी  स्थिति में हावी नहीं होने देते थे और वैचारिक असहमति या विरोध के बाद भी  किसी महापुरुष को उसके व्यक्तिगत जीवन से लांक्षित करना भी उनके स्वभाव का अंग नहीं था जो कि आज दलित, मार्क्सवादी ईसाई मिशनरी का प्रमुख एजेंडा है और यही कारण है कि महाराष्ट्र के समाज सुधारक ज्योतिबा फुले या तमिलनाडु के पेरियार से डा० अम्बेडकर का नजरिया इस मामले में अलग था कि उन्होंने हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था और इसकी सामाजिक संरचना पर आक्रमण करते हुए भी किसी भी वर्ण के प्रति कटुता और द्वेष प्रदर्शित नहीं किया और न ही किसी वर्ण के दिन प्रतिदिन के जीवन या रहन सहन और इसके क्रियाकलाप को अपनी आलोचना और निंदा का विषय बनाकर पूरे आन्दोलन को वैचारिक संदर्भ से हटाकर व्यक्तिगत संघर्ष में परिवर्तित किया हो, ऐसा निष्कर्ष निकालने के पीछे एक और कारण भी है, आम तौर पर कम्युनिष्ट इतिहासकार और हिन्दू विरोधी लेखक, इतिहासकार जो हिन्दू धर्म से सम्बंधित ऐतिहासिक धर्म ग्रंथो को मिथक और कपोल कल्पित सिद्ध करने का प्रयास करते हैं वे आम तौर पर पुराणों, महाभारत और उपनिषद सहित वेदों और उसके पूरक ग्रंथों को किसी भी स्तर पर ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं करते परन्तु डा० अम्बेडकर के लेखन के साथ ऐसा नहीं है , उन्होंने जब भी हिन्दू धर्म या समाज के बारे में कुछ भी लिखा है तो वेदों, पुराणों, उपनिषदों और महाभारत को एक ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है और इसी प्रकार हिन्दू कालगणना को भी अपने साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है जब उन्होंने त्रेतायुग, सतयुग , द्वापर और कलयुग के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए उसकी सार्थकता या उसकी प्रासंगिकता की चर्चा की है|

डा० अम्बेडकर का वेदों, पुराणों, उपनिषदों और महाभारत को ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना उनकी इस धारणा के अनुरूप है जिसके अनुसार वे भारत को एक पुरानी सभ्यता का स्थान मानते हैं और इसमें समय समय पर विभिन्न संस्कृतियों और इतिहास के विलय और निर्माण के क्रम को स्वीकार करते हैं , उनकी यह अवधारणा उन कम्युनिष्ट और हिन्दू विरोधी प्रयासों और अवधारणा से भिन्न है जिसमें भारत की प्राचीनता को प्रयासपूर्वक कम करके आंका जाता है|

 , डा० अम्बेडकर के आक्रमणों को   इस प्रकाश में भी  देखा जा सकता है  कि सम्भवतः बौद्ध धर्म में शामिल होने से पूर्व उन्होंने हिन्दू धर्म को एक प्रतिस्पर्धी और प्रतिद्वंदी धर्म के रूप में नहीं देखा हो और उसकी सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक संरचना तक स्वयं को सीमित रखा क्योंकि इस व्यवस्था में सुधार से वे उस धर्म को अपनी परिभाषा और आदर्शों के दायरे में लाना चाहते रहे हों और इसी कारण जिस धर्म का वे स्वयं अंग थे उस धर्म के इतिहास, परम्परा और आदर्शों के मूलभूत स्तम्भ  पर आक्रमण  का अर्थ था अपने आदर्शों और मूल्यों पर आक्रमण और इसी कारण उन्होंने हिन्दू धर्म से अलग होने के बाद श्रमण परम्परा के अनुरूप वैदिक परम्परा पर एक प्रतिस्पर्धी और प्रतिद्वंदी के अनुरूप आक्रमण किया जो किसी भी प्रकार अस्वभाविक नहीं है परन्तु हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि हिन्दू धर्म का हिस्सा रहते हुए और यहाँ तक कि हिन्दू धर्म छोड़ने की इच्छा व्यक्त करने के दो दशक बाद भी डा० अम्बेडकर हिन्दू धर्म को अपनी परिभाषा और आदर्शों के अनुरूप देखने का प्रयास करते रहे और इस प्रयास में उन्होंने हिन्दू धर्म में सुधार के जो क्रांतिकारी और सामयिक सुझाव दिए उन्हें तत्कालीन  धार्मिक , सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व अंगीकार नहीं कर पाया और न केवल एक क्रांतिकारी , तेजस्वी और सुधारवादी हिन्दू अपने बीच से गंवा दिया जो कि हिन्दू परम्परा की समृद्ध विरासत में एक और गौरवशाली नाम होता ,बल्कि उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों और सुझावों के साथ हिन्दू धर्म को  अधिक विशाल , सशक्त और संगठित होने का अवसर भी खो दिया  | आज भी देर नहीं हुई है और शरीर से डा० अम्बेडकर हमारे मध्य नहीं हैं पर उनके प्रश्नों और सुझावों पर नए सिरे से विचार कर हम उनकी घर वापसी कर सकते हैं| डा० अम्बेडकर की उपेक्षा और कुछ अर्थों में बहिष्कार के साथ उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों के संदर्भ को समझे बिना उन्हें हिन्दू विरोधी और कभी कभी राष्ट्रविरोधी तक सिद्ध करने का जो प्रयास उनके जीवन काल में तात्कालिक राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व में होता था उसी परिपाटी का पालन कहीं न कहीं आज भी हो रहा है और डा० अम्बेडकर को पूर्वाग्रह से देखा जाता है न कि उनका वस्तुनिष्ठ आकलन होता है |