डा अम्बेडकर की विरासत की जंग का सच

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दूरदर्शी समाज सुधारक

भारतीय संविधान सभा के संविधान प्रारूप ( drafting committee)  समिति के अध्यक्ष डा भीमराव अम्बेडकर की विरासत की जंग एक रोचक मोड़ पर पहुँच गयी है और इस पूरी विरासत की जंग को नया रोचक मोड़ तब मिला जब केंद्र में भाजपा नीत गठबंधन की सरकार आने के बाद से इस पूरे प्रयास को सरकारी तंत्र का जामा पहना कर इसे एक पर्व का स्वरुप दे दिया|

डा आंबेडकर की 125वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में पूरे एक वर्ष से देश  भर में कार्यक्रमों का अभियान चल रहा है  और इस पूरे अभियान के अंतर्गत देश की लगभग सभी राजनीतिक विचारधारों और स्वयं को गैर राजनीतिक कहते हुए भी राजनीतिक दखल रखने वाली विचारधारों और संगठनों ने इस पूरे अभियान में भीमराव आंबेडकर के विचारों को अपनी विचारधारा के अनुकूल बताते हुए उनके साथ स्वयं को जोड़ने का भरपूर प्रयास किया|

इस प्रयास में कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी दल और भाजपा के साथी विचारधारा के सहयोगी भी शामिल हैं |

आज देश में  डा भीमराव आंबेडकर को लेकर हो रही इस व्यापक बहस के पीछे के सच को भी समझने की आवश्यकता है | आम तौर पर माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनावों को देखकर सभी राजनीतिक दल अम्बेडकरवाद के साथ स्वयं को जोड़ रहे हैं ताकि उन्हें इसका राजनीतिक लाभ मिल सके पर इसके पीछे का सच इससे कहीं अधिक जटिल है |

डा भीमराव आंबेडकर ने पिछले एक शताब्दी से भी अधिक समय से देश में आरम्भ हुए सामाजिक परिवर्तन की क्रांतिकारी धारा को एक नयी दिशा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विशेष रूप से देश की स्वतंत्रता के उपरांत देश के नए संविधान के निर्माण में भूमिका होने के कारण इस सामाजिक परिवर्तन के अनेक पहलुओं को संविधान में शामिल करने में सफल रहे और इनमें दलितों के साथ भेदभाव की समाप्ति , अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं |

देश की स्वतंत्रता से पूर्व देश में सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक  सुधार के जो भी आन्दोलन चले उनका केंद्र बंगाल, दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र  मुख्य रूप से रहे और इन सभी सामाजिक परिवर्तनों में भारत के स्वरुप को पूरी तरह पुनर्परिभाषित करने का आग्रह था और आरम्भ में इन धाराओं और प्रयासों के विरोध के बाद भी जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ समाज को इन प्रयासों का समर्थन मिला और परम्परावाद के नाम पर सामजिक जड़ता और पुरातनपंथी सोच को जारी रखने की जिद रखने वाली सामाजिक ताकतें या राजनीतिक दल समाज में अप्रासंगिक होते गए |

देश में संविधान की स्थापना के बाद भी देश में सामाजिक सुधार और परिवर्तन की धारा और परम्परावाद के नाम पर इसे रोकने की दो धाराएं सामान रूप से विद्यमान हैं |

डा भीमराव आंबेडकर की विरासत को लेकर हो रही जंग को इसी संदर्भ में देखने की आवश्यकता है | विशेष रूप से दक्षिण भारत में केरल और तमिलनाडु और महाराष्ट्र में एक शताब्दी पहले आरम्भ हुए सामाजिक परिवर्तन आन्दोलन की धारा को  देश के उत्तर भारतीय राज्यों तक पहुँचने में संविधान लागू होने के बाद भी तीन दशक से अधिक समय लग गए और डा राममनोहर लोहिया , कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं के राजनीतिक प्रभाव के बाद भी सामाजिक स्तर पर सामाजिक  परिवर्तन एक आन्दोलन नहीं बन सका जैसा कि केरल में नारायण गुरु, महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले , तमिलनाडु में पेरियार की अगुवाई में हुआ था |

डा भीमराव आंबेडकर और ज्योतिबा फुले के शक्तिशाली विचार के बाद भी नए लोकतांत्रिक स्वरूप में  इनके ही गढ़ महाराष्ट्र में इस विचार को राजनीतिक शक्ति नहीं मिल पाने के विषय पर गंभीर चिंतन और मंथन के बाद दलितों के संगठन वाम सेफ ने एक नयी रणनीति के साथ उत्तर भारत में सामाजिक  परिवर्तन को राजनीतिक शक्ति देने का निर्णय किया और गैर राजनीतिक तौर पर काम कर रहे डी एस 4 को 1984 में बहुजन समाज पार्टी के रूप में राजनीतिक दल का स्वरूप दे दिया गया और स्वर्गीय कांशीराम इसके संस्थापक बने |

ठीक इसी समय मूल रूप में महाराष्ट्र में केन्द्रित और मध्य काल के दो हिन्दू साम्राज्य दक्कन में विजयनगर और महाराष्ट्र में शिवाजी के हिन्दवी साम्राज्य की तर्ज पर भारत में मुग़ल पूर्व हिन्दू भारत को स्थापित करने के लिए प्रयासरत संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उत्तर भारत की ओर बढ़ने वाली इस सामाजिक  परिवर्तन की धारा को देख लिया था और इसी समय 1980 के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश में उत्पन्न हो रही राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए अपने हिन्दू राष्ट्र के अभियान को लेकर दो स्तरीय रणनीति अपनाई

एक ओर तो आक्रामक हिन्दू अभियान के तहत इस्लाम और ईसाई खतरों से आगाह करते हुए हिन्दुओं में अगले कुछ वर्षों में अपनी पहचान खो देने के सन्देश के साथ उनमें असुरक्षा का भाव उत्पन्न कर उन्हें अपने झंडे तले सामाजिक और राजनीतिक रूप से एकत्र करना और दूसरा सामाजिक समरसता के लिए प्रयास करते हुए हिन्दू को जातियों में विभाजित समूहों की जगह एक सामान समूह के रूप में एकत्र करना और इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1983 में अपने प्रथम सरसंघचालक डा हेडगेवार की जन्मशताब्दी पर तत्कालीन विचारक दात्तोपंत ठेंगडी की अगुवाई में “ सामाजिक समरसता मंच” बनाकर दलितों और पिछड़ों को हिन्दू समूह की  मुख्य धारा में  लाने के प्रयास आरम्भ किये |

पिछले कुछ वर्षों में डा भीमराव आंबेडकर की विरासत की जंग अधिक तेज हो गयी है क्योंकि इस समय देश में विचाराधारा और बौद्धिक स्तर पर एक खालीपन की स्थिति है या यूं कहें कि संक्रमण की स्थिति है क्योंकि देश के भीतर आये सामाजिक , आर्थिक और पीढीगत बदलाव के चलते और कांग्रेस की वंशगत राजनीति के चलते  अनेक राजनीतिक और आर्थिक विचार समय के साथ पुराने पड़ गए हैं और ऐसा केवल कांग्रेस के साथ ही नहीं सभी राजनीतिक विचारों के साथ हो रहा है चाहे वामपंथी कम्युनिष्ट हों , समाजवादी हों या फिर दक्षिणपंथी हिन्दूवादी दल हों |

ऐसे में सभी राजनीतिक दल और विचार डा भीमराव आंबेडकर को अपने अनुरूप ढालकर उनकी विरासत के साथ स्वयं को जोड़कर देश में हो रहे सामाजिक परिवर्तन के राजनीतिक लाभ के लिए प्रयासरत हैं जबकि सच यह है कि कोई भी राजनीतिक दल या विचार इस विषय पर देश की जनता के मूड को भांपने की जहमत भी नहीं उठा रहा है |

जिस  आक्रामक  ढंग से डा आंबेडकर को अपनाने की होड़ चल रही है उससे यह बात तो सिद्ध होती है कि एक शताब्दी पहले दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में सामाजिक परिवर्तन की जो धारा चली थी वह अब उत्तर भारत में प्रवेश कर चुकी है और सभी राजनीतिक दल और विचार अपने ढंग से इसकी व्याख्या कर रहे हैं |

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस धारा को अपने अनुरूप ढालने का प्रयास कर रहा है और इस पूरी बहस को देश में सामाजिक परिवर्तन की पहली बुनियाद बन चुके ब्राह्मणवाद के विरुद्ध विरोध के बजाय व्यापक हिन्दू बनाम अन्य के संघर्ष  का स्वरुप देना चाहता है  और इसी कारण डा आंबेडकर के नौ बौद्ध होने को इस्लाम या ईसाई धर्म के प्रति उनके विरोध के रूप में प्रचारित किया जा रहा है  और धारा 370 को संविधान में शामिल करने पर उनकी आपत्ति , पाकिस्तान के निर्माण पर उनके विचार और इस्लाम को लेकर उनके विचार उसी रूप में लोगों के सामने लाये जा रहे हैं जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यापक योजना के अनुरूप हैं |

 

दूसरी ओर वामपंथी विचार और कम्युनिष्ट डा आंबेडकर को शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले और सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए कार्य करने वाले गरीबों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं |

वहीं स्वयं अम्बेडकरवादी और दलित चिन्तक उत्तर भारत की ओर बढ़ रहे सामाजिक परिवर्तन के आवेग में अपना राजनीतिक सशक्तीकरण देख रहे हैं और केरल और तमिलनाडु जैसी  सामाजिक परिवर्तन की स्थिति बनती दिख रही है |

डा आंबेडकर को लेकर चल रही विरासत की जंग के केवल राजनीतिक मायने नहीं हैं पर यह जंग आने वाले दिनों में देश में सामाजिक परिवर्तन की इस बहस के आधार पर ही देश की नयी राजनीतिक दिशा तय करेगा क्योंकि यदि डा भीमराव आंबेडकर के साथ आक्रामक रूप से जुड़ने  के प्रयास के बाद भी उत्तर प्रदेश की जनता ने अगले वर्ष के चुनाव में भाजपा को इसका प्रतिफल नहीं दिया तो यह आने वाले वर्षों में उत्तर भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामजिक समरसता की व्याख्या और हिन्दू एकता के प्रयास को पीछे धकेल देगा |

आने वाले वर्षों में सभी राजनीतिक दलों को कुछ न कुछ परिवर्तन करना ही होगा | कांग्रेस अपने सभी प्रयासों के बाद भी यदि वंशवादी राजनीति को नहीं छोड़ती और गांधी परिवार के अतिरिक्त नए लोगों को आगे नहीं लाती तो उसके विकास की संभावानाएं कम हैं , इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  और भाजपा को परम्परा आधारित समाज की व्याख्या और परम्पराओं के आधार पर राज्य संचालन के दिवास्वप्न से बाहर आकर वास्तविकता को स्वीकार करना होगा |

कम्युनिष्ट पार्टियों को वर्ग  संघर्ष के दौर से बाहर आकर नयी आर्थिक और सामाजिक सोच विकसित करनी होगी |

समय की अपनी गति और धारा होती है और वह अपने अनुरूप परिवर्तन भी कर लेता है और इसके लिए नए विकल्प भी खड़े कर लेता है , विचार और सोच से बड़ा न तो संगठन होता है और न ही संसाधन | आखिर ऐसा न होता तो आज डा आंबेडकर के न रहने पर भी जो काम वे अपने जीवनकाल में नहीं कर सके उनके न रहने के अनेक वर्षों के बाद भी प्रासंगिक हो गया | समय उसी के साथ चलता है जो समय से आगे चलता है  |