काले धन की लड़ाई – तर्क बनाम भावना

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The unending hope

८ नवम्बर को रात ८ बजे जब राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  उसी दिन अर्ध रात्रि से ५०० और १००० के नोट को तत्काल प्रभाव से बंद करने की घोषणा की थी तो उनके उस संबोधन से लेकर अब तक दस दिन से अधिक व्यतीत हो जाने के बाद स्वयं उनके बयानों , भावों में जो उतार चढ़ाव आता रहा है और साथ ही उनके राजनीतिक दल, सहयोगी संगठनों और सोशल मीडिया सहित अन्य स्थलों पर उनके तथाकथित समर्थकों के व्यवहार , बहस के स्वरुप और स्तर को लेकर इस निर्णय के अनेक पहलुओं की समीक्षा को विवश तो होना ही पड़ रहा है साथ ही देश में बहस के गिरते स्तर , तर्क की समाप्त होती परम्परा , स्वस्थ बहस के स्थान पर भावना और डराने , धमकाने , गाली गलौच से विरोधी विचार , सुझाव और आवाज को दबाने की खतरनाक प्रव्रत्ति पर भी सोचने पर विवश होना पड़ रहा है|

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो निर्णय लिया वह एक आर्थिक निर्णय था और यह नीतिगत निर्णय था और निश्चित रूप से इसको लेकर अनेक विचार हैं और जैसे जैसे इस निर्णय के परिणाम सामने आ रहे हैं इसकी आलोचना , समालोचना और इस पर राजनीति होनी स्वाभाविक है | पर पिछले दस दिनों में जिस प्रकार एक आर्थिक निर्णय को और एक नीतिगत फैसले को भावनात्मक ध्रुवीकरण में बदलने के प्रयास हो रहे हैं और इसे देशभक्ति , त्याग , नैतिकता के आधार पर परिभाषित करने के प्रयास आरम्भ हो गए हैं और फिर से देश में “ अगर आप मेरे निर्णय के साथ नहीं है तो आप देश के साथ और देश के भविष्य के साथ नहीं है” जैसी बातें की की जा रही हैं जो  इस पूरे निर्णय के नीतिगत पहलू, आर्थिक विमर्श या फिर गुड गवर्नेंस के दावों के साथ वर्तमान बहस के स्थान पर भावना का तडका एक  विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न करता  है| मजे की बात तो यह है कि इस बहस ने उन बहुत से लोगों के चेहरे से नकाब खिसका दिया है  जिनके बारे में गलतफहमी बन गयी थी कि वे तार्किक रूप से विषयों को आगे बढाने में सक्षम हैं  और भावना और तर्क में अंतर कर पाते हैं|

जो लोग पूरे तार्किक मुद्दे को भावना की ओर ले जा रहे हैं असल में वे कमजोरी का संकेत रहे हैं क्योंकि तर्क पर भावना तब हावी होती हैं जब उत्तर देने को कुछ अधिक होता नहीं या फिर नीयत साफ़ नहीं होती |

याद करिए कि जब १६ साल की उम्र में सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान में इमरान खान, वसीम अकरम और वकार युनुस जैसे स्पीड गन का सामना किया और उन्हें पेशावर में बाउंसर से उनकी नाक टूट गयी थी तो क्या वे मैदान पर रोते हुए अम्पायर से कहते कि मैं तो बहुत छोटा हूँ देखो ये सब मुझे परेशान कर रहे हैं इनसे कहिये कि मुझे बच्चों जैसी बाल करें  या फिर सचिन तेंदुलकर के समर्थक  भारत में और उनकी टीम के सदस्य पाकिस्तान में आक्रामक तरीके से पाकिस्तान के खिलाड़ियों और अम्पायर पर गाली बरसाने लगते | यदि सचिन तेंदुलकर के साथ ऐसा कुछ होता तो क्या वे दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी बन पाते , सचिन तेंदुलकर दुनिया में मशहूर हुए क्योंकि उन्होंने बाउंसर में अपनी नाक  टूटने के बाद क्रीज पर डट कर बाउंसर का सामना किया और हर बाउंसर पर हुक शाट लगाए , वे न तो पिच पर रोये और न ही अपने समर्थकों से कहा कि पाकिस्तान को गाली दो या उनसे मार पीट करो| सचिन ने अपनी लड़ाई स्वयं लड़ी क्योंकि उन्होंने सबसे कम उम्र में भारत की क्रिकेट टीम में आने का फैसला खुद किया था  और क्रिकेट खेलने का फैसला उनका  स्वयं का  था इसलिए दूसरों की मदद से अपनी लड़ाई लड़ते तो यह कायरता और बेईमानी मानी जाती |

आज की स्थिति में देश में जिस प्रकार नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों को तर्क के बजाय भावानाओं की कसौटी पर खड़ा कर दिया जाता है उससे तात्कालिक आधार पर भले ही लगता हो कि कुछ आलोचनाओं और बहस को  डराकर, धमकाकर या रो गाकर कुछ दिनों के लिए रोक दिया गया है पर दूरगामी रूप से यह गलत सन्देश देता है और बार बार बहस से भागने के लिए ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल करने से आधुनिक तार्किक व्यवस्था में ऐसी शक्तियों को दीर्घगामी स्तर पर  पीछे छूटने को विवश होना पड़ता है|

८ नवम्बर को निर्णय की घोषणा के बाद सरकार की ओर से दावा किया गया कि इसके सभी पहलुओं पर पूरी समीक्षा हो चुकी है और पूरी तैयारी के बाद इसे लागू किया जा रहा है पर सरकार का आचरण इस दावे के पूरी तरह विपरीत है , क्योंकि अब तक करीब दस नयी गाइलाइन आ चुकी हैं | अब यदि सरकार पूरी तरह आश्वस्त है कि कुछ दिनों में स्थिति सामान्य हो जायेगी तो रोज नयी घोषणा क्यों हो रही है और यदि सरकार को लगता है कि देश पूरी तरह एकजुट होकर उनके साथ निर्णय में खडा है  और देश के भविष्य के लिए आज कष्ट सहने को तैयार है तो उन्हें और उनके समर्थकों को अपने विरोधियों को देशद्रोही या देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाला घोषित करने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने की आवश्यकता ही  क्या है? क्योंकि यदि देश निर्णय के साथ है तो उनकी कौन सुन रहा है ?

असल में स्थिति वैसी नहीं है जैसी हमें दिख रही है| सरकार के लोग और उनके उतावले और आक्रामक समर्थक  भले ही इस विषय पर समालोचना और तर्क के लिए तैयार न हों पर पूरी दुनिया में इस निर्णय के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो रही है  और करीब दस दिन बीतने के बाद पूरी दुनिया की मीडिया में इस पर बहस हो रही   है कि यह   पूरा निर्णय या तो आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने विरोधियों को निपटाने के लिए लिया गया है या फिर यदि दूरगामी आर्थिक हित में है भी तो यह उतावलेपन में और अधूरी तैयारी से  लिया गया है जिसमें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी गोपनीय और प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण की कार्यशैली का अतिआत्मविश्वास हो गया और उन्हें लगा कि वे स्थितियों को नियंत्रण में कर ले जायेंगे | दस दिनों के बाद भी जिस तरह इस निर्णय के अनेक साइड इफेक्ट सामने आ रहे हैं और अनेक  तो ऐसे हैं जिनका अनुमान भी नहीं किया गया था उसके चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो कि पद पर आने के बाद पूरी दुनिया में एक दूरद्र्ष्टि वाले प्रशासक में रूप में अपनी पहचान बना रहे थे उस अवधारणा को विराम लग गया है क्योंकि १९८० से लेकर अभी तक दुनिया के बहुत से देशों में कालेधन की समस्या को समाप्त करने के कदम के रूप में बड़ी मुद्राओं के चलन को समाप्त किया गया , परन्तु कोई भी देश मुद्राओं के चलन को रोकने के बाद उत्पन्न हुए आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक परिणाम को संभाल नहीं पाया और अनेक देशों में या तो ग्रहयुद्ध हो गया , अराजकता आ गयी, बैंकिंग सिस्टम ध्वस्त हो गया और अनेक देशों में सत्ता पलट भी हो गया | 1982  में घाना में, 1991  में सोवियत रूस के पतन के ठीक पहले , 1987 म्यांमार में, 2010 उत्तर कोरिया में और अफ्रीकी देश जेर और नाइजीरिया में भी ऐसे ही निर्णय लिए गए जिसने स्थिति को सुधारने के बजाय और खराब कर दी| घाना में इस निर्णय के बाद उनके बैंकिंग सिस्टम में लोगों का विश्वास टूट गया और लोगों ने  देश के बाहर के बैंकों में पैसा जमा कर दिया, सोवियत रूस में यह निर्णय उसके पतन का कारण बन गया,  म्यांमार में इस निर्णय के बाद खाने की समस्या  आयी और सेना के साथ मिलकर लोगों के विद्रोह को कुचल दिया गया और उत्तर कोरिया में तो तानाशाह किम जोंग को अपनी जनता से माफी मांगनी पडी और उन्होंने अपने वित्त मंत्री को फांसी दे दी ताकि जनता का गुस्सा शांत हो सके|

दुनिया के अनेक देशों में मुद्रा को रोकने के निर्णय हो चुके हैं और कालेधन को समाप्त कर पाने में इस निर्णय की उपयोगिता को लेकर अर्थशास्त्रियों में कोई उत्साह नहीं है क्योंकि ऐसे निर्णय का सबसे खतरनाक परिणाम अर्थव्यवस्था पर पड़ता है जिससे सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता प्रभावित होती है| जिस प्रकार बीते दस दिनों में भारत सरकार पूरे मामले में असहाय नजर आ रही है उससे यही आशंका बन गयी है कि शायद इस निर्णय के बहुत से पहलुओं पर  विचार नहीं हुआ और जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले भी हेडलाइन बदलने के लिए बिना सलाह मशविरे के अपने आधार पर फैसले लिए और  परिणाम पूरे देश को भुगतने पड़े वही कुछ इस मामले में दुहराया जा रहा है लेकिन अधिक कीमत देकर|

अच्छा हो कि भारत सरकार अपनी इस भूल में सुधार करते हुए विपक्ष के साथ तालमेल बैठाकर देश को विश्वास में लेकर आगे स्थिति को बद से बदतर होने से बचाए और सरकार के इस प्रयास में उन अति उत्साही और उतावले समर्थकों को संयम बरतना चाहिए जिन्हें लगता है कि देश भक्ति, त्याग , नैतिकता जैसे सभी गुणों का भण्डार उनके पास है और हजारों सालों से यह देश विनाश की स्थिति में था और इन लोगों ने  जब से मोर्चा लिया है देश सुधरा है|