तेजस्वी पर क्यों है रार ?

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तुम्हीं से मोहब्बत तुम्हीं से लड़ाई |

राजनीति में जो आँखों से दिखता है वो द्रश्य वास्तव में वैसा होता नहीं है | यही कुछ बिहार की राजनीति के साथ हो रहा है, राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार में महागठबंधन की सरकार में उप मुख्यमंत्री के पद पर आसीन तेजस्वी यादव इस समय बिहार की राजनीति में ऐसे मोहरे बन चुके हैं जिनके सहारे हर कोई अपना अपना दाँव चल रहा है|

तेजस्वी यादव के ऊपर तथाकथित भ्रष्टाचार के आरोपों का आधार लेकर स्वयं नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जे डी ( यू) लालू यादव से पिंड छुड़ाना चाह रही है ऐसा आम तौर पर लोगों को लगता है पर कहानी इससे भी अधिक गहरी है|

नीतीश कुमार राजनीति के गहरे खिलाड़ी हैं और समय के अनुसार अपनी राजनीतिक प्राथमिकता और प्रतिबद्धता को नया रंग दे देते हैं |

समाजवादी आन्दोलन की उपज से आते हुए भी उन्होंने 1990 के दशक में जब देश में साम्रदायिकता बनाम गैर साम्प्रदायिकता की बहस में अधिकतर समाजवादी दल गैर साम्प्रदायिक खेमे में थे तो नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के एकाधिकार को चुनौती देते हुए जार्ज फर्नाडीज के साथ समता दल का गठन किया और तथाकथित साम्प्रदायिक खेमे में आ गए और राष्ट्रीय राजनीति से लेकर बिहार की राजनीति में एक बड़ा चेहरा बनते गए|

इसी प्रकार 2002 में जब  गुजरात में गोधरा काण्ड हुआ तो नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान की तरह केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र नहीं दिया और एन डी ए के साथ रहे , पर इन्हीं नीतीश कुमार ने एन डी ए में जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कद को बढ़ता देखा तो अपनी सेक्युलर छवि का हवाला देकर उनसे वर्षों वर्ष दूरी बनाकर रखी और अंत में जब 2014  लोकसभा चुनावों के लिए नरेंद्र मोदी को भाजपा ने अपना चेहरा बनाया तो उन्होंने इसे ही मुद्दा बनाकर एन डी ए छोड़ दिया और फिर नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उनका स्वागत न करना पड़े इस कारण बिहार का मुख्यमंत्री पद भी छोड़ दिया और अपनी चरण पादुका राजसिंहासन पर रख दी  |

आज नीतीश कुमार जिस भ्रष्टाचार की बात को फिर से  उठा रहे हैं वह फिर विचित्र लगता है, 2015 में उन्होंने उन लालू प्रसाद यादव के साथ गठबंधन किया जिन्हें कि उससे  कुछ पहले  ही भ्रष्टाचार के मामले में सजा हो चुकी थी और उस कांग्रेस के सहयोगी बने जिसे कि एक वर्ष पहले ही देश भर में भ्रष्टाचार की अपनी छवि के कारण ही भारी हार का सामना करना पडा था |

इस आधार पर यह तो तय है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक नैतिकता का सिद्धांत उनकी राजनीतिक सुविधा पर निर्भर करता है|

इस समय नीतीश कुमार की समस्या दो राजनीतिक विरासतें हैं जो राष्ट्रीय राजनीति और प्रदेश की राजनीति में उन्हें असुरक्षा की भावना से भर रही हैं | एक तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दूसरा लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव | नीतीश कुमार को भय है कि इन दोनों के गठजोड़ से आगे चलकर 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में नया राजनीतिक और सामाजिक समीकरण सामने आ सकता है जो उन्हें प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर ला देगा , इसी प्रकार नीतीश कुमार को राष्ट्रीय राजनीति में स्वयं को नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रूप में देखने और इस रणनीति पर कार्य करना उनके लिए तभी संभव है जब कांग्रेस राहुल गांधी के स्थान पर उन्हें विपक्ष का चेहरा माने , परन्तु अब कांग्रेस की रणनीति में 2019 में नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए इतनी भी व्याकुलता नहीं दिखती कि वे विपक्ष का अपना स्पेस किसी दूसरे को दे दें |

ऐसे में नीतीश कुमार के पास विकल्प अत्यंत सीमित हैं और दिनों दिन उनके अन्दर असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है और उन्हें यह भी भय सता रहा है कि यदि तेजस्वी यादव का कद छोटा न किया गया तो 2020 में उन्हें नए राजनीतिक और सामाजिक समीकरण का सामना करना पडेगा क्योंकि अब राष्ट्रीय राजनीति को लेकर उनकी हसरत  राजनीतिक वास्तविकता के आगे ठंडी पड़ती जा रही है|

नीतीश कुमार का पूरा खेल न तो महागठबंधन से बाहर आने का है और न ही सरकार गिराने का है , वे भाजपा का भय दिखाकर लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस को आँखें दिखा रहे हैं और नीतीश कुमार के इस खेल में भाजपा बिल्ली के भाग से छींका टूटने की आस में नीतीश के लिए काम आसान करती जा रही है|