दो नकली शेरों का वार्तालाप

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कुछ वर्षों पहले की बात है एक बेरोजगार युवक अपनी बेरोजगारी से परेशान था और हर जगह हाथ पाँव मारने के बाद भी उसे कोई रोजगार नहीं मिल रहा था , ऐसी विषम स्थिति में वह बेरोजगार युवक मानसिक अवसाद की स्थिति में चला गया और अपने एक मित्र से सहायता माँगी | बेरोजगार युवक के मित्र ने अपने मित्र को एक सुझाव दिया जो उसे हास्यास्पद लगा | बेरोजगार मित्र ने इस सुझाव को सुनकर अपने मित्र से कहा , “ अच्छा तो मित्र बुरे समय में अब तुम भी मेरा उपहास करने लगे”, मित्र ने अत्यंत गंभीर स्वर में उत्तर दिया, “ मित्र तुम मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकते हो” | अपने मित्र का ऐसा भावुक उत्तर सुनकर बेरोजगार युवक ने अपने मित्र के सुझाव पर गंभीरता दिखाई | बेरोजगार युवक के मित्र ने उसे सुझाव दिया था कि वह एक सर्कस में नकली शेर की खाल पहनकर असली शेर की भूमिका निभाये और इस भूमिका के लिए सर्कस में आवेदन दे| इसी सुझाव को आरम्भ में बेरोजगार युवक को अपना उपहास करने  जैसा लगा था , पर अपने सामने अन्य कोई विकल्प न देखकर बेरोजगार युवक ने अपने मित्र से इसके बारे में विस्तार से चर्चा आरम्भ कर दी |

 

बेरोजगार युवक के मित्र ने उसे बताया कि जबसे असली शेर लगभग लुप्त होते जा रहे हैं तो सर्कस में भी असली शेर उपलब्ध नहीं हैं और सर्कस वाले अब बेरोजगार युवकों को शेर की खाल पहनाकर सर्कस में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं और दर्शकों को  लगता है कि वे असली शेर का तमाशा देख रहे हैं | बेरोजगार युवक ने अपने मित्र से पूछा कि, “ मुझे करना क्या होगा” | बेरोजगार युवक के मित्र ने  उत्तर दिया कि अधिक कुछ नहीं करना है केवल शेर की खाल पहनकर , शेर की तरह दहाड़ना है और अपना सीना फुलाना है| तुम्हे कोई वेतन नहीं मिलेगा दर्शकों की ताली पर ही तुम्हें हर तमाशे के बाद उसी अनुपात में पैसा मिलेगा” |

 

बेरोजगार युवक ने सर्कस में नकली शेर के पद के लिए आवेदन किया और उसे नियुक्ति मिल गयी | सर्कस में अपने पहले तमाशे के बाद उसे सर्कस के अन्य शेरों के साथ जन्जीर में बाँध दिया गया और पहले दिन उसे अन्य शेरों को साथ स्वयं को बंधा  देखकर भय अनुभव हो रहा था , तभी उसने देखा कि उसके साथ बंधा हुआ शेर भी उससे भयभीत होकर दुबक रहा है, अब बेरोजगार युवक जो नकली शेर बना था उसे समझते देर नहीं लगी कि हो न हो यह भी मेरी तरह असली शेर न हो| उसने कुछ हिचकते हुए दूसरे शेर से पूछा , “ क्या तुम असली शेर हो”? दूसरे शेर ने भी प्रश्न के उत्तर में प्रश्न किया , “ क्या तुम असली शेर हो” ? इस बातचीत से दोनों ही नकली शेरों का भय समाप्त हो गया और उन्होंने आपस में बातचीत आरम्भ कर दी |

पहली बार शेर बने नकली शेर ने दूसरे से पूछा , “ तुम कितने समय से इस कार्य में हो” ?
दूसरे नकली शेर ने उत्तर दिया , “ मुझे ठीक से तो याद नहीं है पर मैं बचपन में सर्कस में असली शेर का खेल तमाशा देखने गया और उस सर्कस के शेर से काफी प्रभावित हुआ और जब घर लौटा तो उस शेर जैसी हरकतें कर उसकी नक़ल उतारने लगा | जब मैं कुछ और बड़ा हुआ तो मेरे मित्रों ने बताया कि इस शहर में एक सर्कस है जो युवकों भर्ती कर उन्हें शेर जैसा अभिनय करने का प्रशिक्षण देता है, और इस सर्कस में शामिल होकर किशोर और युवक नकली शेर होते हुए भी असली शेर होने का भ्रम पाल पाते हैं” |

पहली बार शेर बने बेरोजगार युवक ने फिर प्रश्न किया, “ परन्तु इस पूरे अभियान से लाभ किसे होता है?  आखिर तो अंतिम सत्य यही है कि हम सभी नकली शेर हैं और अपने अभिनय से जनता को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं” |

दूसरे शेर ने उत्तर दिया, “ देखो , आरम्भ में तो यह आवश्यक था क्योंकि अचानक शेर गायब होने लगे थे और लोगों को शेर की आदत लगाए रखना जरूरी था | धीरे धीरे जब जनता इतनी बेवक़ूफ़ हो गयी कि वह नकली शेर को ही असली शेर मानकर चलने लगी तो नकली शेर का यह खेल एक बड़ा व्यापार बन गया और अब तो स्थिति यह है कि सर्कस चलाने वाले इसे बंद भी करना चाहें तो इसे नहीं बंद कर सकते” |

इस उत्तर से पहली बार शेर बने बेरोजगार युवक को संतुष्टि नहीं हुई और उसने अब इस कार्य से जुड़े नैतिकता और अनैतिकता के प्रश्न पूछने आरम्भ किये |

दूसरे शेर को उत्तर देने में कोई हिचक नहीं हुई और उसने उत्तर में कहा, “ देखो नैतिकता और अनैतिकता का प्रश्न सापेक्षिक है| जो एक चीज एक के लिए नैतिक है वही दूसरे के लिए अनैतिक हो सकती है | यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसकी व्याख्या कैसे करते हैं| आरम्भ में सर्कस का यह नकली शेरों का खेल लोगों के मनोरंजन के लिए आरम्भ हुआ था और इसी कारण युवकों को नकली शेर बनाया जाता था और अब यह सर्कस का व्यापार बहुत बढ़ गया है जो हजारों लोगों के लिए जीविका का साधन बन चुका है| यदि तुम इस तरह सोचो कि नकली शेर का अभिनय करने के लिए कितने ही युवकों को रोजगार दिया जा रहा है तो इससे नैतिक कुछ नहीं हो सकता लेकिन इसके ठीक विपरीत यदि सोचा जाए कि हम जानबूझकर लोगों को नकली होकर असली होने का भ्रम देते हैं तो इससे अनैतिक कुछ भी नहीं हो सकता | लेकिन अंत में तो जनता को फैसला करना है और उसे असली और नकली शेर में अंतर करना ही नहीं आता| जब जनता को पता है कि अब असली शेर या तो आरक्षित जंगल में या चिड़ियाघर में देखने को मिलते हैं , फिर भी उसे असली शेर सर्कस में देखने की जिद है” |

 

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पहली बार नकली शेर बने बेरोजगार युवक ने फिर दूसरे नकली शेर से पूछा , “ आखिर कब तक यह सर्कस चलता रहेगा” |

दूसरे नकली शेर ने उत्तर दिया, “ सर्कस अपना व्यवसाय अच्छे ढंग से चला रहा है, जब भी सर्कस चलाने वालों को ऐसा प्रतीत होता है कि उनका नकली शेर पुराना हो रहा है , अपनी चमक खो रहा है या उसकी असलियत जनता के सामने आ सकती है तो वे उस नकली शेर को बदल कर कोई नया नकली शेर जनता के सामने ले आते हैं| अब देखते हैं कि यह व्यवसाय कब तक चल पाता है , वैसे अब नयी पीढी के लोगों के सामने इस सर्कस को चला पाना कुछ कठिन दिख रहा है क्योंकि उन्हें लम्बे समय तक  नकली शेरों से संतुष्ट कर पाना सरल नहीं है” |

पहली बार नकली शेर बना बेरोजगार युवक इस पूरी बातचीत से  कुछ चिंतित हो गया और उसने आसमान की ओर देखते हुए लम्बी साँस ली और बोला, “ हे भगवान , यह समय तो वाकई विचित्र है जब मैं नकली शेर का अपना अभिनय ठीक ढंग से कर रहा हूँ और लोगों को नकली होकर भी असली का भ्रम दे पा रहा हूँ और जनता मेरे अभिनय की कायल होकर तालियाँ बजा रही है तो फिर लोग इससे मन उचाट क्यों कर रहे हैं? आखिर शेर असली हो या नकली सर्कस के शेर को तो दोनों ही स्थितियों में रिंग मास्टर के इशारे पर काम करना है” |