नीतीश कुमार के राजनीतिक नाटक से उठे सवाल

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कौन सेक्युलर कौन कम्युनल ?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार पिछले कई महीनों से चल रहे असमंजस को विराम लगाते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के एक घटक के रूप में अपनी वापसी करा ली है, बिहार की सरकार के अपने पूर्व घटक दल राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े कुछ नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से उत्पन्न हुए राजनीतिक संकट का पटाक्षेप जिस रूप में आज हुआ उससे यह स्पष्ट हो गया कि इसकी पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी , पर जिस प्रकार नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से एक मिनट भी अलग हुए बिना    मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया , उस नाटक को समझने के लिए किसी को भी राजनीतिक विशेषज्ञ होने की आवश्यकता नहीं है|

परन्तु अब जिस प्रकार नीतीश कुमार ने बिहार की पूरी राजनीति को अपने हिसाब से बदल दिया है उसके परिणाम क्या हो सकते हैं | पिछले आम चुनाव के पहले एक साक्षात्कार में नीतीश कुमार ने कहा था कि असली रणनीति वही होती है जब  आपको आपके कदम के बाद होने वाली प्रतिक्रिया का आपको पहले से आभास हो|

शायद पहली बार नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक कदम से होने वाली प्रतिक्रिया का आकलन नहीं किया है|

जिस प्रकार 2014 के आम चुनावों से पहले उन्होंने एक मुद्दे को अपनी सुविधा के अनुसार  राजनीतिक सिद्धांत बनाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अपना नाता तोड़ा था और देश की राजनीतिक हवा का रुख नहीं भांप सके थे , उसी प्रकार एक बार फिर उन्होंने अपने आकलन को ही सही माना है|

नीतीश कुमार ने बीते तीन वर्षों में नरेन्द्र मोदी के सामने विपक्ष की स्थिति को देखते हुए उनका विकल्प बनने का सपना छोड़ दिया है , और उन्हें 2019 में भी नरेन्द्र मोदी की वापसी नजर आती है ऐसे में 2020 तक भाजपा के साथ राज्य में सरकार चलाना उन्हें फायदे का सौदा लगता है|

यह नीतीश कुमार का अपना आकलन है , पर नीतीश कुमार के इस निर्णय का उनके राजनीतिक कद और सैद्धांतिक व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव होगा इसे उन्होंने नहीं सोचा |

नीतीश कुमार ने जिस मुद्दे पर स्वयं एक मिनट भी मुख्यमंत्री पद छोड़े बिना मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया वह था कि वे अपने ही अधीन एक मंत्री को पद छोड़ने के लिए न विवश कर सके और न ही उसे बर्खास्त कर सके , और इस पूरे मामले पर भ्रम की स्थिति बनी रही | ऐसे में यदि नीतीश कुमार को लगता है कि उनकी छवि त्याग की बनी है तो ये उनका अपना आकलन हो सकता है, यह पूरी तरह स्पष्ट है कि उन्होंने अपने पुराने गठबंधन को बीच में तोड़ दिया |

सामान्य तौर पर देश की राजनीति में देखा गया है कि जब इस  प्रकार उछल कूद और तोड़ फोड़ के आधार पर जनादेश के विपरीत सरकारों का गठन होता है तो उस नेता को अपनी छवि से इसकी कीमत चुकानी पड़ती है|

गुजरात में जब शंकर सिंह बाघेला ने यही कुछ भाजपा के साथ किया था तो वे गुजरात की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता खो बैठे और जब 1997 में कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में  जोड़ तोड़ से सरकार बनाकर 100 मंत्रियों का कैबिनेट बनाया था तो उनकी साफ़ सुथरी छवि को करारा धक्का लगा था और उसके बाद भाजपा की स्थिति दिनों दिन प्रदेश में खराब होती गयी और उसे 15 साल सत्ता से बाहर रहना पडा |

नीतीश कुमार ने अभी अपनी सुविधा के अनुसार राजनीतिक सिद्धांत भले ही गढ़ लिए हों पर अनेक प्रश्न जनता के मन में उठेंगे जिसका असर नीतीश कुमार की छवि पर पडेगा | साथ ही जिस महादलित के राजनीतिक समीकरण को उन्होंने रचा था उसे उन्होंने लालू प्रसाद और मायावती के लिए खुला छोड़ दिया है, जबकि एक कहावत है कि रिश्ते और घाव को कभी खुला नहीं छोड़ना चाहिए नहीं तो उनमें सडन पैदा हो जाती है| नीतीश कुमार भी जानते हैं कि भारत की चुनावी राजनीति में जातीय और अन्य गणित भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपील पर भारी पड़ते है ,अगर ऐसे न होता तो सजा पाकर चुनाव के लिए अयोग्य हो चुके लालू प्रसाद यादव के प्रचार से उनकी पार्टी के 80  विधायक चुन कर न  आ जाते|

इसी प्रकार एक सवाल यह भी है कि यदि नीतीश कुमार को  भ्रष्टाचार  सहन नहीं था  तो क्या उन्हें लालू प्रसाद यादव के बारे में पहले से पता नहीं था ? इसी प्रकार  यदि नीतीश कुमार को एक सद्भावना सम्मलेन में नरेन्द्र मोदी के जालीदार टोपी न  पहनने पर देश की सेक्युलर परम्परा के नष्ट हो जाने का खतरा था और उनकी नजर में  ऐसा व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद के लिए योग्य नहीं था तो क्या अब नीतीश कुमार ने टोपी को लेकर अपना सिद्धांत बदल दिया है या फिर उन्होंने नरेन्द्र मोदी को टोपी पहनने को राजी कर लिया है|

नीतीश कुमार आज जिस राजनीतिक दोराहे पर खड़े हैं वहाँ उनके पास विकल्प बहुत कम थे और उनकी समस्या दो राजनीतिक विरासत थी एक राज्य में तेजस्वी यादव और दूसरा देश में राहुल गांधी और इन दोनों के सामने उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य को कमजोर होते देखा इसी कारण उन्होंने गैर विरासत वाले खेमे को चुना | नीतीश कुमार का निर्णय  एक मजबूर और लाचार राजनीतिक नेता का  है जो  सिद्धांत और त्याग किये बिना ही सैद्धांतिक और  त्याग की राजनीति का छलावा कर रहा है|