नोटबंदी के राजनीतिक निहितार्थ और परिणाम

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देश में कालेधन को समाप्त करने के प्रयास के अंतर्गत ५०० और १००० की बड़ी नोटों को बंद करने के सरकार के निर्णय को भले ही आर्थिक पैमाने पर तौला जा रहा हो परन्तु इस निर्णय के राजनीतिक निहितार्थ और परिणाम भी हैं |

मई २०१४ में देश के प्रधानमंत्री पद पर आने के बाद से नरेन्द्र मोदी उस फार्मूले की तलाश में हैं जो कि उन्हें अगले दो दशक तक पद पर बनाए रख सके और स्वयं उनके और उनकी विचारधारा के सन्देश और पहचान को नया स्वरुप देकर उन्हें जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का विकल्प बना सके| इसे राजनीति की  विडम्बना कहें या राजनीतिक वास्तविकता के समक्ष नतमस्तक होना कि जिस विचारधारा से स्वयं नरेन्द्र मोदी आते हैं उसने देश की स्वतन्त्रता के बाद से जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की नीतियों का  धुर विरोध किया  और उनके  विकल्प के रूप में स्वयं को प्रतिस्थापित किया | आज उसी विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में भी नरेन्द्र मोदी मुख्य धारा की विचारधारा के रूप में स्वयं को स्थापित करने के लिए जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की तरह कुलीन व्यवस्था और परम्परागत रूप से देश के  आर्थिक और सामाजिक प्रभाव स्थल पर दिखने वाली शक्तियों को अशक्त करने वाले एक योद्धा के रूप में स्वयं को प्रदर्शित करने का प्रयास कर रहे हैं|

जवाहर लाल नेहरू ने जमींदारी व्यवस्था को ध्वस्त कर एक आर्थिक सुधार की प्रक्रिया आरम्भ की और जमींदारी के स्थान पर भूमि का समान वितरण किया, बंधुआ मजदूरी  जैसे प्रावधान को समाप्त  कर, छुआ छूत को अपराध घोषित कर  आर्थिक और सामाजिक समरसता की दिशा में प्रयास आरम्भ किया तो साथ ही हिन्दू कोड बिल जैसे प्रयासों से उन्होंने देश के बहुसंख्यक समाज को विश्व की मुख्य धारा में लाकर उदारवाद और सेक्युलर समाज की स्थापना में प्रयास आरम्भ किये , पर उन्होंने देश में किसी भी प्रकार अस्थायित्व को रोकने के लिए अल्पसंख्यकों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की |

श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1960 के अंतिम दशक में और 1970 के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजे रजवाड़ों के विशेषाधिकारों में कटौती सहित परमिट राज के सहारे एक बार फिर आर्थिक समानता की ओर कदम उठाया |

जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना में यदि आज नरेन्द्र मोदी के विमुद्रीकरण के प्रयास में छुपे उनके आर्थिक और राजनीतिक निहतार्थ को तलाशने की कोशिश करें और इसके संभावित परिणामों को तलाशने का प्रयास करें तो हम कुछ निष्कर्षों पर आते हैं|

जवाहर लाल नेहरू ने जब जमींदारी उन्मूलन का अभियान लिया, बंधुवा मजदूरी  को समाप्त करने जैसे प्रयास किये तो उनके साथ विनोबा भावे जैसे लोग थे और देश के पीछे हाल में समाप्त हुए स्वतंत्रता आन्दोलन की  प्रेरणा और त्याग से निकला एक सामाजिक सन्देश और नैतिक बल था जिसने कि लोगों को प्रेरित किया और व्यापक सामाजिक  परिवर्तन का सन्देश समाज में नीचे तक गया और चूंकि जमीन हजारों वर्षों से शक्ति का केंद्र था और इससे एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक ढांचा जुडा था जो शोषण का प्रतीक था , इस प्रतीक पर प्रहार करते ही समाज के वर्षों से दबे कुचले लोगों को एक व्यापक परिवर्तन का सन्देश चला गया और इस व्यवस्था को बचाने का प्रयास करने वाले अलग थलग हो गए , हालांकि उस समय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों ने राजगोपालाचारी जैसे नेताओं के साथ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के प्रयास का विरोध किया था और जमींदारों और अगड़ी जातियों के विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखने के प्रयासों के राजनीतिक अभियान का साथ दिया था |

इसी प्रकार जब इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और राजे रजवाड़ों के विशेषाधिकार छीने तो इसे एक बार  फिर सामाजिक और आर्थिक समानता की दिशा में उठाया गया कदम माना गया और जवाहर लाल नेहरू के प्रयासों में और गति लाते हुए शोषण के प्रतीक रहे प्रतिमानों को मुख्य धारा में लाने के प्रयास को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला |

इन दोनों ही निर्णयों की प्रष्ठभूमि में यदि वर्तमान सरकार के विमुद्रीकरण के प्रयास की आर्थिक और सामाजिक समीक्षा करें और इसके व्यापक परिणामों की समीक्षा करें तो कुछ निष्कर्ष निकलते हैं|

जवाहर लाल नेहरू स्वतंत्रता आन्दोलन के समय से ही वामपंथी रुझान के थे और व्यक्तिगत जीवन में नास्तिक होने के  कारण उनके  सुधारवादी प्रयासों से देश के बहुत बड़े अल्पसंख्यक , दबे कुचले और शोषित वर्ग का साथ उन्हें मिला और देश की स्वतंत्रता के समय से ही यह वर्ग कांग्रेस का समर्थक रहा |

इंदिरा गांधी ने अपने प्रयासों से इसी को  और आगे बढाया और अपना रुझान कहीं अधिक खुले रूप में वामपंथी करते हुए कम्युनिष्ट शक्तियों के साथ भी गठबंधन किया जिसने कि उनके विरुद्ध कार्य कर रहे सिंडीकेट को जवाहर लाल नेहरू के  समय से ही कांग्रेस का विरोध कर रही परम्परावादी शक्तियों के साथ खडा  दिखाकर कांग्रेस की नातियों के विरुद्ध कार्य करने वाला दिखाकर  उसे सामाजिक  रूप से एक सीमित वर्ग का प्रतिनिधि दिखा दिया |

आज की परिस्थिति में यदि वर्तमान सरकार के  विमुद्रीकरण के प्रयास में छुपी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को समझने का प्रयास करें और इसके परिणाम की समीक्षा करें तो हमें वर्तमान सरकार की विचारधारा के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा भी करनी होगी |

भारत की राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ आर्थिक और सामाजिक संरचना पूरी तरह भिन्न है और आर्थिक प्रयासों से सामाजिक संरचना को और सामाजिक प्रयासों से आर्थिक संरचना को प्रभावित नहीं किया जा सकता |

भारत में अब तक तीन ऐसे पडाव आये हैं जब सामाजिक क्रांति या सुधार हुए | देश की स्वतंत्रता के बाद संविधान के लागू होने के बाद जो हजारों वर्षों की सामाजिक व्यवस्था थी जिसे मुगलों और अंग्रेजों ने भी नहीं स्पर्श किया था उसे पूरी तरह बदलकर एक नयी सामाजिक और आर्थिक समरसता की नयी व्यवस्था स्थापित की गयी |

दूसरा इंदिरा गांधी  ने राजे रजवाड़ों के विशेषाधिकार छीनकर इसे सही अर्थों में लागू किया और छद्म रूप में भी पुरानी परम्परागत व्यवस्था के अवशेष हटा दिए |

तीसरा अवसर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से आया जब स्वतंत्रता के बाद से आरक्षण और सत्ता के संरक्षण व समर्थन से मुख्य धारा में आने का प्रयास कर रही पिछड़ी और दबी कुचली शक्तियों को एक नया सामाजिक और राजनीतिक आयाम मिला |

इन तीनों ही अवसरों पर किस राजनीतिक विचारधारा ने किस धारा का साथ दिया इसी आधार पर भारत का सामाजिक संतुलन कायम है और यह सोच इतनी गहरी है कि  आर्थिक प्रयासों का इस सामाजिक संतुलन पर अधिक प्रभाव नहीं होता क्योंकि देश में हजारों वर्षों की सामाजिक व्यवस्था में स्वयं को निचले पायदान पर अनुभव करने वाले संविधान प्रदत्त शक्तियों और राजनीतिक रूप से वामपंथी रुझान( भारतीय संदर्भ में वामपंथ का अर्थ कम्युनिष्ट नहीं वरन क्षेत्रीय, जातीय और स्थानिक भावनाओं की अभिव्यक्ति करने वाली शक्तियां हैं)  के साथ इस मजबूती से खड़े हैं कि इसे अपनी मजबूती की गारंटी मानती हैं|

क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक सभी सामाजिक वर्गों की कितनी ही पीढ़ियों ने अपनी वैचारिक धारा निश्चित कर रखी है|

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस विचारधारा से आते हैं उसका इतिहास इन तीनों ही ऐतिहासिक परिवर्तन के अवसर पर परम्परावादी शक्तियों के साथ खड़े होकर सामाजिक और आर्थिक सुधार को बाधित करने वाली राजनीतिक शक्तियों का साथ देने का रहा है और इसी राजनीतिक विभाजन की नींव पर देश में वामपंथी और दक्षिणपंथी राजनीति का विभाजन भी हुआ है |

1990 के दशक में सामाजिक न्याय की जो राजनीतिक शब्दावली प्रचलित हुई  उसके विरोध में उभरी शक्ति के साथ आक्रामक  अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति के मिश्रण ने देश में दक्षिणपंथी राजनीति का जो आविर्भाव किया इस विचारधारा के समर्थक अधिकतर वे हैं  जो  अपने गांवों , कस्बों और नगरों को छोड़कर महानगरों या विदेशों में  बसे  है जिन्होंने कि  संसाधन और मीडिया पर पहुँच के चलते अपनी  आवाज अधिक मुखर कर ली है  जो अधिक मुखर होकर  सुनाई पड़ती है और हर बार ऐसा प्रतीत होता है कि देश में दक्षिणपंथ चारों ओर हावी है पर लोकतंत्र में इनके पास संख्या कम है पर आवाज मुखर है, जबकि इसके विपरीत देश में जो वामपंथी रुझान के लोग हैं और  जो दक्षिणपंथी राजनीति को स्वतंत्रता के बाद आरम्भ हुई सामाजिक सुधार की प्रक्रिया को फिर से बदलकर पुरानी परम्परागत सामाजिक व्यवस्था को लागू करने के प्रयास के रूप लगी शक्तियों के रूप में देखते हैं वे इनके  किसी भी प्रयास से या किसी भी प्रकार से दक्षिणपंथी उभार को शंका की नजर से देखते हैं और उसकी किसी प्रकार की आक्रामकता उन्हें अपने मतभेद भुलाकर एकसाथ आने को प्रेरित करती है | जैसा कि देश में १९८९ के बाद प्रायः होता रहा है|

१९८९ के बाद देश की राजनीतिक , सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में जो परिवर्तन आये हैं वे एक दूसरे के परस्पर विरोधी और अत्यंत उलझे हुए हैं| एक ओर सामजिक न्याय के नाम पर आरक्षण की परिधि बढ़ने से जो वर्ग हजारों वर्षों से सत्ता के वर्चस्व की लड़ाई  में स्वयं को मानते ही नहीं थे उन्होंने न केवल आर्थिक, सामजिक प्राथमिकताएं बदल लीं बल्कि वर्षों से चला आ रहा जातीय संघर्ष अब नए रूप में अधिक शालीन रूप में राजनीतिक वर्चस्व की लडाई में बदल गया और इसके साथ ही आर्थिक उदारीकरण , वैश्वीकरण से उत्पन्न नए अवसरों ने आरक्षण की नयी स्थिति में अपनी संभावनाओं से वंचित हुए वर्ग को पूरी तरह अपनी सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकता बदलने को विवश कर दिया | परन्तु १९८९ के राजनीतिक वातावरण से उत्पन्न परिस्थितियों के करीब एक चौथाई शताब्दी व्यततीत होने के बाद हमारा देश एक परस्पर विरोधाभाषी , उलझी  हुई  राजनीतिक स्थिति में आ गया है जहां कि पुराने सामाजिक वर्ग और विमर्श के साथ ही एक नया वर्ग भी सामने आया है जो अति युवा वर्ग है और उपभोक्तावादी, उतावला , मीडिया और सोशल मीडिया से तेजी से प्रभावित होने वाला है परन्तु यह वर्ग अत्यंत अस्थिर और चंचल है और इसके बारे में कोई अनुमान लगा पाना अत्यंत कठिन होता है परन्तु यह वर्ग भी पूरी तरह अपनी ऐतिहासिक, जातिगत और पारिवारिक चेतना से मुक्त हो चुका है और नए रास्ते पर चल चुका है ऐसा कह पाना  कठिन है, इसे कोई चीज जोड़ती है तो जीवन की मस्ती, खान पान और अधीरता |

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विमुद्रीकरण के निर्णय के तत्काल बाद जिस प्रकार बहुजन समाज पार्टी , समाजवादी पार्टी , टीएमसी और आम आदमी पार्टी को अपने निशाने पर लिया है उसने इन पार्टियों के समर्थकों को भयभीत कर दिया है और इन सभी पार्टियों के अधिकतर समर्थक  समाज के दबे कुचले वर्ग से आते हैं| 1990 के सामाजिक न्याय के आन्दोलन का एक अन्तर्निहित पक्ष यह भी है जिसे कि कांशीराम ने बहुत प्रमुखता से कहा था कि हमें यदि सामजिक व्यवस्था को बदलकर अपना शासन लाना है तो हमें धन शक्ति पर जोर देना होगा भले ही वो कैसे भी प्राप्त हो और यही कारण है कि देश में 1990 के दशक  से दलित और पिछड़े वर्ग से आये नेताओं या राजनीतिक दलों पर दूसरे लोगों ने भ्रष्टाचार और आय से अधिक सम्पति के आरोप लगाए पर हर ऐसे आरोप से इन वर्गों के नेता और राजनीतिक दल मजबूत होते गए क्योंकि इनके समर्थकों के लिए  उनके लिए इसके अलग मायने हैं|

सरकार के  इस निर्णय से देश की सामाजिक और राजनीतिक निष्ठा में कोई अधिक क्रांतिकारी बदलाव होगा ऐसा लगता नहीं परन्तु इस निर्णय से देश के अन्य वर्गों को जो दिक्कतें आ रही हैं जिनमें कि अधिकतर देश की सत्ताधारी दल  के समर्थक  व्यापारी वर्ग हैं जो जनसंघ के दिनों से इन विचारधारा के साथ रहे हैं वे बुरी तरह इस निर्णय से प्रभावित हुए हैं और इससे उनकी निष्ठा अवश्य प्रभावित हो सकती है| इसका तत्काल प्रभाव शायद सत्ताधारी दल पर  न पड़े पर दूरगामी रूप से उसके अन्य वैचारिक संगठनों की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है जिससे कि आने वाले दिनों में देश में दक्षिणपंथी राजनीति पूरी तरह बदल सकती है|