पंचायत चुनावों में शैक्षिक योग्यता की बाध्यता, कहाँ तक जायज ?

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Haryana Model of Panchayat elections in debate.

हरियाणा सरकार द्वारा पंचायत चुनावों में एक न्यूनतम शैक्षिक योग्यता  निर्धारित करने संबंधी क़ानून के पारित होने के बाद और देश के सर्वोच्च न्यायालय से इसे हरी झंडी मिलने के बाद ऐसा  क़ानून राजस्थान सरकार  ने भी पारित किया है और सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद भी कांग्रेस ने इस क़ानून की आलोचना तो की ही  है साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भी असंतोष जताया है|

इस पूरे प्रकरण पर कांग्रेस के आरोपों में राजनीति से परे भी कुछ तथ्य हैं या नहीं इस पर गौर करने की आवश्यकता है|

हमारे देश में जिस  लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत पंचायती राज्य व्यवस्था की कल्पना की गयी है उसके पीछे हमारे संविधान निर्माताओं की परिकल्पना थी कि लोकतंत्र को निचले स्तर तक ले जाया जाए और देश में सबसे गरीब, पिछड़े , दलित , वंचित वर्ग को भी यह आभास हो सके कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंग हैं और उन्हें भी प्रतिनिधत्व मिल रहा है|

अब यदि जिस देश में देश की सर्वोच्च प्रतिनिध संस्था संसद और विधानसभा में अभी तक प्रत्याशी बनने के लिए कोई  शैक्षिक योग्यता नहीं निर्धारित की गयी है वहां पहले इस व्यवस्था को पंचायत स्तर पर लागू करना कितना न्यायसंगत  है क्योंकि अब भी देश में शैक्षिकता और साक्षरता का स्तर उतना उत्साहजनक नहीं है और ऐसी स्थिति में देश में साक्षरता और शैक्षिकता का स्तर बढाने का प्रयास करने के स्थान पर अशिक्षित और निरक्षर लोगों को नीचे की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अलग थलग करना न केवल अधिकाँश लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति आशंका का भाव भर देगा वरन उन्हें उन व्यवस्था विरोधी आंदोलनों और स्वरों के साथ खड़े होने को प्रेरित करेगा जो अब भी देश के लोकतंत्र को एक कुलीन तंत्र के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं|

हरियाणा और राजस्थान इस मामले में भी इस प्रयोग में देखने लायक उदाहरण हैं जहां कि कुछ शक्तिशाली सामाजिक वर्ग राजनीति , अर्थ व्यवस्था और समाज पर हावी रहे हैं और अन्य सामाजिक वर्गों का आरोप रहता आया है कि इन्होंने अन्य सामाजिक वर्गों को प्रतिस्पर्धापूर्वक नहीं आगे बढ़ने दिया और ऐसे में पंचायत चुनावों को लेकर इस नए क़ानून से इस भय को न केवल और बल मिलेगा वरन अन्य राज्यों में भी ऐसी आशंका को बल मिलेगा जहां कि अब भी सामाजिक न्याय का राजनीतिक स्वरुप आकार ग्रहण कर रहा है|

हरियाणा और राजस्थान का पंचायत चुनाव का क़ानून देखने में भले ही सरल दिखता हो और सामान्य रूप में इसे सही पहल माना जा रहा हो पर भारत के जटिल सामाजिक स्वरुप और भिन्न वर्गों की राजनीतिक प्रतिनधित्व प्राप्त करने की आकांक्षा को लेकर चल रहे आन्दोलनों और देश में साक्षरता और शिक्षा के स्तर की स्थिति के चलते इस निर्णय का खुले रूप से स्वागत नहीं किया जा सकता |