प्रवीण तोगडिया की राजनीतिक घोषणा के मायने

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Image Source -Patrika

राजनीति में कुछ वर्ष और कुछ महीने अत्यंत घटनाप्रधान होते हैं जो अगले कुछ वर्षों के लिए राजनीति की दिशा बदल देते हैं |  वर्ष 2018 में  अक्टूबर का महीना भी इसी प्रकार का है महीना है जब अनेक घटनाएँ घट रही हैं| करीब तीन दशक पहले तीन आन्दोलन देश की राजनीति के केंद्र में आ गए थे,  जिन्होंने देश की राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल दी थी , हिंदुत्व आन्दोलन, मंडल आन्दोलन और दलित आन्दोलन और अब इन आंदोलनों के तीन दशक बीते जाने के बाद जब तीनों ही आंदोलनों ने हर स्तर पर राजनीतिक शिखर को स्पर्श कर लिया है तो तीनों ही आन्दोलनों में अनेक स्तरों पर अन्तर्विरोध , चेहरों का बदलाव और इनके तेवरों में बदलाव देखने को मिल रहा है| तीनों ही आंदोलनों की कथा 1989 के आम चुनाव से आरम्भ हुई थी जब देश की राजनीति में  कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए दक्षिण, वाम और क्षेत्रीय दलों ने हाथ मिलाया था और कांग्रेस का राजनीतिक आभामंडल तेजहीन होने लगा और गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार से एक नयी राजनीतिक आहट सुनाई पड़ने लगी | गुजरात में नया सामाजिक समीकरण आरम्भ हुआ , महाराष्ट्र , उत्तर प्रदेश और बिहार में भी | इन राजनीतिक प्रयोगों से निकले राजनेता और उनका राजनीतिक दर्शन आज तीन दशक बाद अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है| उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की राजनीति और उनका राजनीतिक दर्शन , मायावती की राजनीति , बिहार में लालू प्रसाद यादव की राजनीति और गुजरात व महाराष्ट्र से होकर उत्तर भारत तक आने वाली हिंदुत्व की राजनीति में भी अनेक परिवर्तन और उठापटक देखने को मिल रहे हैं|

विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व नेता और अब अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिया का अयोध्या की धरती से राम मंदिर के मुद्दे पर राजनीतिक दल बनाने की घोषणा इसी राजनीतिक उठापटक और सत्ता प्राप्ति के बाद राजनीतिक दर्शन और सत्ता के व्यावहारिक उपयोग के विरोधाभास को रेखांकित करता है|

प्रवीण तोगडिया समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के पूर्णकालिक प्रचारकों में सर्वाधिक आक्रामक , राजनीतिक समझ वाले और कुछ अर्थों में हिंदुत्व के मुद्दों पर विशेष रूप से मुस्लिम समाज के प्रति अधिकतर हिन्दुओं की भावना को मुखर रूप से सामने रखते हुए उस पर अमल करने की कार्ययोजना वाले नेता रहे हैं और यही प्रमुख कारण रहा है जिनके चलते अंत में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संरचना से अलग होना पडा|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की स्थापना के समय से ही  इसके  पूरे राजनीतिक दर्शन में अनेक मुद्दों पर स्पष्ट कार्ययोजना का अभाव दिखता रहा है और ये मुद्दे राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के बाद इस परिवार के अन्तर्विरोध का शिकार हो जाते हैं|

प्रवीण तोगडिया हिंदुत्व की राजनीति को इस अन्तर्विरोध से आगे उस मोड़ पर ले जाते दिखते हैं जहां कि हिंदुत्व के मुद्दों पर अमल हो सके और इसके लिए कार्ययोजना भी हो|

यह तो आने वाले दिनों ही पता चल सकेगा कि प्रवीण तोगडिया जनता के मध्य अपनी नयी भूमिका के साथ किस प्रकार समर्थन प्राप्त करते हैं पर प्रवीण तोगडिया ने समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार और उनके रणनीतिकारों को भौचक कर दिया है क्योंकि विश्व राजनीति में इस्लाम को मानने वालों  की बढ़ती संख्या के चलते जिस प्रकार समस्त विश्व राजनीति के शक्ति संतुलन में इस्लाम के मानने वालों के मुकाबले एक गोलबंदी का अभियान चल रहा है उसने परम्परागत राजनीतिक और वैचारिक सोच को चुनौती दे डाली है और अब सेक्युलरिज्म और उदारवाद के नाम पर बहुत से मुद्दों से भागने या उन पर खुलकर बात न करने की राजनीतिक और वैचारिक सोच पुरानी पड़ गयी है और इसका साफ़ असर भारत में मध्यमार्ग की राजनीतिक सोच की कांग्रेस के रुख में आये बदलाव से भी झलक जा रहा है जब कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी इसी विश्व राजनीति के रुझान को भांपकर खुलकर अपनी हिन्दू पहचान के साथ खड़े हो रहे हैं जबकि दूसरी ओर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ परिवार सेक्युलरिज्म और उदारवाद के पुराने विमर्श के जाल में फंसकर पूरी तरह भ्रमित हो चुका है|

प्रवीण तोगडिया ने राजनीतिक विमर्श में आये इस बड़े परिवर्तन को भांप लिया है और वे पश्चिम की तर्ज पर तथाकथित अतिदक्षिणपंथी राजनीतिक दलों की तरह भारत के राजनीतिक स्वरुप को चुनौती देने की योजना बना रहे हैं|

इस अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के साथ इसका एक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य भी है| भारत में आजादी के समय से ही बहुराष्ट्रवादी व्यापारिक एकाधिकार बनाम राष्ट्रवादी घरेलू बाजार के संरक्षण के मध्य संघर्ष होता रहा है और महात्मा गांधी ने देश की आजादी तक  अपनी राजनीति को देश की धार्मिक चेतना और राष्ट्रवादी घरेलू बाजार के संरक्षण के मध्य स्थित रखा था , देश की आजादी के बाद जब कांग्रेस की राजनीति विचारधारा और आर्थिक नीति के मामलों में संतुलन नहीं बैठा पायी तो अनेक राजनीतिक ध्रुव पैदा हो गए | कांग्रेस ने राजनीतिक विचारधारा और आर्थिक नीति में जिस विरोधाभास का सामना अनेक दशकों बाद किया था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को अपने पहले सर्वाधिक शक्तिशाली बहुमत में करना पड़ गया और वर्तमान स्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अनेक दशकों से जिन छोटे व्यापारियों , कपडे के व्यापारियों, सुनारों , किराने के व्यापारियों , बर्तन के व्यापारियों के आर्थिक और पारिवारिक सहयोग से अपने संगठन का विस्तार किया , उनकी गुरु दक्षिणा से अपना बजट चलाते रहे और उनके परिवारों में  भोजन कर इनके पूर्णकालिक कार्यकर्ता अपना वैचारिक और राजनीतिक आधार बढ़ाते रहे उन्हीं व्यापारिक वर्गों को जब उनके ही स्वयंसेवकों द्वारा संचालित सरकार के नोट्बंदी और जीएसटी सहित अनेक आर्थिक निर्णयों से चोट पड़ती रही तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने खुदरा और छोटे व्यापार को समाप्त कर बहुराष्ट्रवादी व्यापारिक हितों को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक नीतियों का समर्थन किया  और देश की राजनीति में राष्ट्रवादी संरक्षणवादी आर्थिक नीति और धार्मिक चेतना के आधार पर स्वदेशी मानसिकता के पहलू को नजरअंदाज कर दिया, इस स्थिति में वर्षों तक एक वैचारिक आधार पर कांग्रेस का राजनीतिक विरोध करने वाले व्यापारिक और मध्य वर्ग के समक्ष विकल्प का अभाव था जिसने बहुराष्ट्रवादी आर्थिक दर्शन और सेक्युलर उदार राजनीतिक दर्शन को कोई चुनौती दी हो, ऐसी स्थिति में प्रवीण तोगडिया का राजनीतिक विकल्प देश की राजनीतिक स्थिति को अत्यंत रोचक स्थिति में ला देता है जब देश में दक्षिणपंथी सांस्कृतिक अपील के साथ आर्थिक स्तर पर राष्ट्रवादी संरक्षणवादी कुछ अर्थों में समाजवादी आर्थिक सोच की नयी राजनीतिक विमर्श की शुरूवात होगी |