फिल्म विवाद और बालीवुड की गुटबाजी

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Politicizing the Bollywood Groupism.

पिछले कुछ सालों में बालीवुड और फ़िल्में कला से अधिक राजनीति से जुड़ गयी हैं और आये दिन किसी न किसी फिल्म के रिलीज को लेकर विवाद होता है और कुछ निर्देशकों और कलाकारों को लेकर बहस आरम्भ हो जाती है और देखते देखते खेमे बन जाते हैं और बात  बढ़ते बढ़ते या तो साम्प्रदायिक रूप ले लेती है या फिर देशभक्ति बनाम देशद्रोह पर आकर रुक जाती है | मामला आमिर खान की पीके फिल्म का हो, शाहरूख खान की दिलवाले का हो या फिर अब करन जौहर की फिल्म “ ऐ दिल है मुश्किल” का हो सभी में अनेक संदर्भ से बहस  साम्प्रदायिक या देशभक्ति के इर्द गिर्द है| पर क्या पूरी कहानी वही है जो दिखाई दे रही है या फिर मामला कुछ दूसरा है और लोग वही देख रहे हैं जो बहस में दिखाने का प्रयास हो रहा है|

उदाहरण के लिए आमिर खान ने जिस थ्री ईडियट फिल्म में काम दिया था उस फिल्म में भी धार्मिक कर्मकांड का उपहास किया गया था , इसी प्रकार परेश रावल की फिल्म “ ओ माई गाड” में भी सभी धर्मों की खिल्ली उडाई गयी थी और इसी अनुपात में “ पीके” में भी धर्म पर व्यंग्य था और तीनों का सन्देश एक ही था कि धर्म न तो डराने की चीज है और न ही इस डर को आधार बनाकर व्यवसाय करने की चीज है| अब यह आवश्यक नहीं है कि इस सन्देश से सभी सहमत हों पर कलाकार और रचनाकार को अपनी बात किसी भी रूप में कहने का हक़ है|

इन तीनों में फिल्मों में लगभग एक जैसे चुटकी भरे अंदाज के बाद भी “ पीके” फिल्म को लेकर देश भर में बवाल हुआ और इससे आगे चलकर फिल्म को ही फायदा हुआ |

इसी कड़ी में नवीनतम फिल्म विवाद जो कारन जौहर फिल्म को लेकर चल रहा है और ऊपर से यह मामला पाकिस्तान के कलाकारों को फिल्म में शामिल करने से जुडा दिखा रहा है पर  असल में तो वह बालीवुड में गुटबाजी में एक लम्बे इतिहास को ही दर्शाता है  , अन्तर केवल इतना भर है कि  पिछले कुछ वर्षों में बालीवुड और फिल्म निर्माता या निर्देशक अब अपनी गुटबाजी में राजनीति का इस्तेमाल करने लगे हैं और समाज में बहुत से ऐसे बेरोजगार और खाली लोग बैठे हैं जो किसी भी विषय की गहराई में गए बिना किसी के लिए भी इस्तेमाल होने को आतुर रहते हैं|

करन जौहर की फिल्म “ ऐ दिल हैं मुश्किल” और अजय देवगन की “ शिवाय” की रिलीज तिथि एक है २८ अक्टूबर और यह पूरा विवाद न तो देशभक्ति बनाम देशद्रोह का है और न पाकिस्तान के कलाकारों पर कभी आपत्ति रही है, अगर ऐसा होता जनरल जिया उल हक़ के समय एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री सलमा आगा की फिल्म “ निकाह” भारत में सबसे बड़ी हिट फिल्म थी जबकि उन दिनों खुले आम पाकिस्तान की आई एस आई पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन को हर तरीके से हवा देकर आतंकवाद का पोषण कर रही थी पर तब तो किसी ने न तो सलाम आगा का बहिष्कार किया और न ही फिल्म में तोड़ फोड़ हुई| इन दिनों जो हो रहा है वह   बालीवुड की गुटबाजी में राजनीतिक प्रयोग का भोंडा उदाहरण है|

असल में पिछले दो से  अधिक दशक में जिस प्रकार राजनीति, मीडिया , लेखन और खेल  जैसे क्षेत्रों में पिछले अनेक दशकों के चली आ रही परम्परागत कुलीन व्यवस्था ध्वस्त हुई है उसी प्रकार बालीवुड में भी यह दौर चल रहा है  और राज कपूर की नयी विरासत रणवीर कपूर की स्थिति एकदम कांग्रेस के राहुल गांधी जैसी है जिनके लिए उनका ब्रांड और विरासत का बोझ ही उनके विकास में रुकावट बन गया है|

९० के दशक में हिन्दी फिल्मों में अक्षय कुमार, अजय देवगन, शाहरूख खान, गोविंदा  जैसे कलाकारों ने बिना किसी बड़ी विरासत या खानदान के नाम के बिना खुद को स्थापित किया और इन नामों में यदि करण जौहर को जोड़ दें तो वही एकमात्र ऐसे शख्स हैं जो मुम्बई के फ़िल्मी घराने से सम्बन्ध रखते थे हालांकि उन्होंने भी स्वयं को अपने बल पर खड़ा किया और आरम्भ में शाहरूख खान , काजोल और करण जौहर अनेक वर्षों तक एक सफल टीम के रूप में काम करते रहे |

सन २००० के बाद से  बालीवुड इंडस्ट्री में अचानक और भी क्रांतिकारी स्थिति आ गयी जब क्रिकेट की तरह फिल्म इंडस्ट्री में भी  छोटे शहरों से न केवल कलाकार आने लगे बल्कि जिन्हें वर्षों से भदेस और हास्य का पात्र माना जाता था उन क्षेत्रों से  निर्देशक , गीतकार, गायक भी छाने लगे| प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण , रणवीर सिंह , रणदीप हुड्डा, अनुराग कश्यप, अरिजीत सिंह, कपिल शर्मा  जैसे कुछ नाम हैं जिन्होंने बालीवुड इंडस्ट्री के स्वरुप को ही बदल दिया और इंडस्ट्री में वर्षों से अपनी विरासत और अपने बाप दादों के नाम के बल पर चल रही अपनी प्रसिद्धि पर सोचने को विवश हो गए|

इस समय राजनीति और क्रिकेट की तरह बालीवुड इंडस्ट्री में भी उथल  पुथल का दौर चल रहा है और एक दूसरे के कैम्प को नीचा दिखाने के लिए होड़ मची है | जैसे करन जौहर , शाहरूख खान और काजोल कभी एक टीम थे पर आज काजोल के पति अजय देवगन की फिल्म “ शिवाय” और करण जौहर की फिल्म “ ऐ दिल है मुश्किल” की रिलीज तिथि को लेकर राजनीति हो रही है और इंडस्ट्री में पिछले कुछ वर्षों से एक नयी ताकत बन कर उभरे अनुराग कश्यप ने शक्ति संतुलन को बिगाड़ दिया था पर जब से उन्होंने अपने  प्रतिद्वंदी करण जौहर से हाथ मिला लिया है बालीवुड की लड़ाई काफी रोचक हो गयी है| इस पूरे विवाद में भी अनुराग कश्यप ने उत्तर भारतीय होने का सबूत दिया कि राजनीति का जवाब उन्हें राजनीति से देना आता है  और इसी क्रम में उन्होंने भी ट्विटरबाजी करते हुए करन जौहर की हारी हुई बाजी को फिर खेल में ला दिया|

पिछले कुछ वर्षों से फिल्मों के रिलीज पर होने वाला विवाद विशुद्ध रूप से बालीवुड की गुटबाजी का परिणाम है और इसे साम्प्रदायिक या देशभक्ति बनाम देशद्रोह का रंग देकर इसे राजनीतिक रूप देना न तो बालीवुड के लोगों को शोभा  देता है जो राजनीति के सहारे अपने वर्चस्व की जंग जीतना चाहते हैं और न उन राजनीतिक दलों या कार्यकर्ताओं को शोभा देता है जो बालीवुड की इस गुटबाजी में सहज  रूप से इस्तेमाल हो जाते हैं|

इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस पूरी गुटबाजी में कुछ कलाकार या निर्देशक  अनावश्यक रूप से स्वयं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करीबी बताकर और बाकी लोगों को उनका दुश्मन सिद्ध कर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को गिरा रहे हैं | प्रधानमंत्री या तो सभी के हैं या फिर किसी के नहीं हैं| ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि बालीवुड के कुछ लोग देश के प्रधानमंत्री के प्रवक्ता बनकर ऐसा दिखा रहे हैं मानों शेष बालीवुड उनकी दुश्मन है , राजनीतिक दलों और प्रधानमन्त्री को बालीवुड की इस गुटबाजी से दूर रहना चाहिए|