ब्रिक्स घोषणापत्र : प्रचार बनाम सच्चाई

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Brics declaration .Hype Vs Reality .

गोवा में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मलेन के तत्काल बाद मीडिया में जो बातें आ रही थी उसने मुझे भी प्रसन्न और उत्सुक किया कि इतने बड़े मंच पर देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने चीन , रूस और दक्षिण अफ्रीका के सामने पाकिस्तान को पस्त कर दिया और उन्होंने एक नयी विश्व व्यवस्था की नींव रख दी| इसी उत्साह और प्रसन्नता से लबरेज मैं गोवा के ब्रिक्स सम्मलेन में जारी भारी भरकम घोषणापत्र को कई दिनों तक पढता रहा कि कहीं विश्लेषण में कोई गलती न रह जाए|

ब्रिक्स सम्मलेन की सफलता को लेकर जो दावे मीडिया में किये गए उसके संदर्भ में घोषणापत्र पढ़ने पर मैं कई दिनों तक समझ नहीं पाया कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतना विरोधाभास |

ब्रिक्स सम्मलेन के पूरे घोषणापत्र में आतंकवाद की बात तो है पर पूरी तरह रूस की परिभाषा के अनुसार | सीरिया में चल रही स्थिति के संदर्भ में रूस ने आतंकवाद को परिभाषित भी किया और उसी संदर्भ में उससे लड़ने की बात की है| इसके अतिरिक्त पूरे घोषणापत्र को पढ़कर ऐसा लगा कि जैसे इसमें दो बिंदु हैं , एक तो राजनीतिक रूप से अमेरिका का नाम लिए बिना विश्व व्यवस्था के बारे में रूस की या विशेष रूप से व्लादिमीर पुतिन की जो राय है उसे बहुत विस्तार से लिखा गया है| दूसरा बिंदु आर्थिक है जिसमें चीन के शी जिनपिंग की चली है| भारत , ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने तो ऐसा लगता है इस घोषणापत्र पर केवल हस्ताक्षर भर किये हैं |

घोषणापत्र पढ़ने के बाद कुछ चीजों को लेकर अत्यंत भ्रामक स्थिति बन रही है साथ ही साथ विरोधाभासी |

जिस प्रकार अमेरिका और रूस के सम्बन्धों में तनाव अपने चरम पर है और शीत युद्ध जैसी स्थिति बन रही है , उसमें भारत अपनी स्थिति क्या बना रहा है, स्पष्ट नहीं हो रहा है, कभी तो कहा जाता है कि हम गुटनिरपेक्ष स्थिति से बाहर आकर अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी हो गए हैं और कभी पुतिन के साथ अमेरिका के समानान्तर नयी विश्व व्यवस्था की उनकी योजना के साथ भी हम खड़े दिखते हैं|

एक ओर ब्रिक्स घोषणापत्र में हम  चीन , रूस , ब्राजील , दक्षिण अफ्रीका के साथ  मिलकर एक बड़ी अर्थव्यवस्था खुली बाजार व्यवस्था के आधार पर स्थापित करने का संकल्प व्यक्त करते हैं दो दूसरी ओर देश में चीन के सामानों के बहिष्कार का अभियान चलाया जाता है|

ऐसे में दो ही चीजें हो सकती हैं या तो देश के रणनीतिकार भ्रमित हैं और वर्तमान वैश्विक स्थिति में नेहरू से अलग दिखने के लिए कोई नया माडल नहीं दिख रहा है या फिर नयी वैश्विक परिस्थिति में अन्तरराष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद के मध्य संतुलन स्थापित नहीं कर पा रहे हैं|

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की कूटनीति उस तरह सफल नहीं  रही है जैसा कि मीडिया में दावा किया गया है और देश के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा समझने की भूल  कर पाकिस्तान को अलग थलग करने के प्रयास में एक बड़े मंच पर भारत की वैश्विक भूमिका पर चर्चा के अवसर को गंवा दिया और पाकिस्तान केन्द्रित मानसिकता से बाहर आकर कुछ नए विषयों पर चर्चा से चूक गए |संभव है कि आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ब्रिक्स के मंच का राजनीतिक उपयोग करने के लोभ में अधिक बड़े लक्ष्य आँखों से ओझल हो गए हों|  पाकिस्तान पर जरूरत से ज्यादा चर्चा भारत को  पाकिस्तान के समकक्ष खड़ा कर देती है और वह अलग थलग नहीं होता बल्कि चर्चा में आता है| ब्रिक्स के पूरे घोषणापत्र में आतंकवादी संगठनों में लश्कर, जैश का नाम नहीं है और न ही मसूद अजहर और हाफिज सईद का नाम है| साथ ही पाकिस्तान को आतंकवाद की जन्मभूमि बताकर जो सन्देश प्रधानमंत्री देश के अन्दर और देश के बाहर देना चाहते थे उसे भी अमेरिका, रूस , चीन का समर्थन हासिल नहीं हुआ | पाकिस्तान को लेकर जो दावे किये जा  रहे हैं उनसे भी बचने की आवश्यकता है क्योंकि देर सबेर तो पाकिस्तान से बातचीत भी करनी होगी और सम्बन्ध भी  सामान्य करने होंगे|