भाजपा का राम “ रहस्य”

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BJP chants Jai Shree Ram.

इस वर्ष जब पिछले अनेक वर्षों से विजयदशमी पर चली आ रही परम्परा को विराम देते हुए प्रधानमंत्री ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित होने वाली रामलीला के समापन में शामिल होने के स्थान पर उत्तर प्रदेश की राजधानी में आयोजित होने वाली रामलीला के समापन अवसर पर शामिल होने का निर्णय लिया तो राजनीतिक गलियारों में इसके राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे और इन चर्चाओं को अधिक बल तब मिला जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लखनऊ के अपने कार्यक्रम में अपने भाषण का आरम्भ “ जय श्री राम” नारे से किया| नरेन्द्र मोदी ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के अपने पूरे अभियान में उत्तर प्रदेश की अपनी जनसभाओं में “ जय श्री राम” के नारे से न केवल परहेज किया था बल्कि अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को दूर से भी छूने की कोशिश नहीं की थी, और यही नहीं तो प्रधानमन्त्री पद की शपथ लेने के बाद से अभी तक दो वर्ष से अधिक के कार्यकाल में न तो उन्होंने अयोध्या की यात्रा की और न ही राम मंदिर के बारे में किसी अटकल को हवा लगने दी, ऐसे में प्रधानमंत्री की अचानक विजयदशमी के लिए लखनऊ का चुनाव करना और “ जय श्री राम” के नारे से अपने भाषण की शुरुआत करना आखिर कैसे किसी राजनीतिक अटकल को जन्म नहीं देगा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लखनऊ यात्रा के बाद जब केंद्र में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने रामजन्मभूमि स्थल से १५ किलोमीटर की दूरी पर रामायण संग्रहालय के लिए भूमि चयन हेतु अयोध्या की यात्रा की तो भाजपा के अचानक अयोध्या और राम के प्रति अनुराग पर चर्चाएँ गर्म हो गयीं |

आज भले ही भाजपा यह कह रही हो कि प्रधानमंत्री की विजयादशमी की लखनऊ यात्रा और केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा की अयोध्या यात्रा का राजनीतिक प्रयोजन नहीं है पर राजनीतिक लोगों द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य गैर राजनीतिक नहीं होता इसलिए भाजपा के इस तर्क पर विश्वास करने का कोई कारण ही नहीं है| अब सवाल उठता है कि आखिर भाजपा का राम “ रहस्य” है क्या?

असल में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा का राम और अयोध्या की ओर झुकाव उसकी आक्रामक नहीं बल्कि रक्षात्मक नीति का परिणाम है| उत्तर प्रदेश में पिछले अनेक दशकों में भाजपा की राजनीतिक स्थिति कांग्रेस से कुछ ही बेहतर है और यदि लोकसभा चुनावों के अपवाद को छोड़ दें तो २००२ के बाद से अभी तक हर विधानसभा चुनाव में भाजपा की संख्या घटती ही जा रही है , जबकि हर चुनाव में पार्टी यही दावा करती है कि सभी की  लड़ाई उसी से है|

उत्तर प्रदेश में १९९० के दशक से जो राजनीतिक समीकरण उभरे हैं उसमें १९९३ में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के टूटने के बाद से परोक्ष रूप से भाजपा और बसपा सामाजिक और राजनीतिक कारणों से एक दूसरे के निकट रहे हैं परन्तु २०१४ के लोकसभा चुनाव में यह जुगलबंदी टूट गयी क्योंकि नरेन्द्र मोदी की आक्रामक प्रचार शैली में भाजपा ने अपना पूरा जोर बसपा के वोट बैंक पर लगाया  और इन चुनावों में बसपा के सफाए की कीमत पर भाजपा हिन्दू एकता या सामाजिक  समीकरण जो भी कहें साध ले गयी और उसे अप्रत्याशित सफलता मिली | २०१४ के लोकसभा चुनाव के परिणाम से भाजपा और संघ परिवार को पता चल गया कि उत्तर प्रदेश में उनकी वापसी का रास्ता बसपा के सफाए में है और इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डा भीमराव आंबेडकर और नौ बौद्ध आन्दोलन के साथ निकटता स्थापित की और उत्तर प्रदेश में धम्म यात्रा जैसे प्रयोग किये गए और संविधान दिवस जैसे प्रयोगों सहित डा आम्बेडकर समर्थकों को रिझाने के तमाम प्रयास हुए |

बीते दो वर्ष से भी अधिक समय से स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार ने  दलित आन्दोलन और दलित चिंतन के साथ स्वयं को जोड़ने के अथक प्रयास किये और इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में बसपा के अनेक वरिष्ठ नेता भी भाजपा में शामिल हो गए पर जैसे जैसे विधानसभा चुनाव निकट आ रहे हैं भाजपा को जमीन पर हकीकत कुछ और ही नजर आ रही है| लोकसभा चुनावों से बिलकुल उलट बसपा के समर्थक अब भी सुश्री मायावती को अपनी देवी मानते हैं और उनके समर्थक इस बार मायावती का साथ छोडते नहीं दिख रहे हैं , ऐसी स्थिति में भाजपा और संघ परिवार को आनन फानन में अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है और उनका प्रयास है कि विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में जातीय समीकरण का स्थान हिन्दू ध्रुवीकरण ले ले |

परन्तु उत्तर प्रदेश की स्थितियों में अब काफी अंतर आ चुका है और यह एक मिथक है कि फला जाति या समुदाय के लोग थोक में  वोट करते हैं और फला के साथ हैं| आज तो स्थिति यह है कि एक ही परिवार में सदस्य अलग अलग वोट करते हैं | अब वोट देने की केवल एक प्राथमिकता है कि किससे क्या लाभ हो रहा है? किसके जीतने से क्षेत्र का विकास होगा और कौन सा प्रतिनिधि सरलता से उपलब्ध है जो काम पड़ने पर काम आयेगा?

इन बदली हुई परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश के चुनाव सभी को चौंकाने वाले होंगे |

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले “ राम” की शरण में जाकर भाजपा ने दो चीजें स्पष्ट कर दी हैं कि इस बार वे मोदी लहर पर भी सवार नहीं हैं और २०१४ के लोकसभा चुनाव में जो   मोदी लहर राम लहर से भी व्यापक बन गयी थी उस पर भाजपा को अब  विश्वास नहीं है और दूसरा बीते २५ सालों में उत्तर प्रदेश में भाजपा बिलकुल नहीं बदली है और जो भूल मुलायम सिंह यादव कर रहे हैं १९९० के दशक की राजनीति की जिद पकड़ कर उसी प्रकार भाजपा भी ध्रुवीकरण की बिसात बिछाना चाहती है |

बीते लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने पीढीगत बदलाव के साथ स्वयं को जोड़ लिया था और उनमें परम्परागत राजनीति को तोड़कर कुछ नया प्रयोग करने की संभावना दिख रही थी पर पहले उन्होंने पिछड़ा , दलित जैसे परम्परागत शब्द प्रयोग किये और अब उस पुराने मुद्दे को छेड़ रहे हैं जिस पर उत्तर प्रदेश की जनता  में न तो जोश है और न ही इस मुद्दे पर प्रदेश में  उनकी पार्टी की कोई साख बची है|

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के आरम्भ से इसके परिणाम आने तक नए समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे और चुनाव के बाद प्रदेश पर राज वही करेगा जो पीढीगत बदलाव को समझ कर स्वयं को उससे जोड़ सकेगा और वास्तव में “ सबका साथ सबका विकास” करता हुआ दिखेगा