भाजपा का राम राग

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Temple in waiting

भारतीय जनता पार्टी ने सर्दियों के इस मौसम में अयोध्या में राम मंदिर का राग छेड़कर देश की राजनीति और विशेष कर उत्तर प्रदेश की राजनीति का माहौल गर्म कर दिया है|

पिछले दिनों अयोध्या में अनेक वर्षों बाद राम मंदिर के लिए पिछले अनेक वर्षों से चल रही विश्व हिदू परिषद की कार्यशाला में  मंदिर निर्माण के लिए आ रहे पत्थरों के रुकावट के बाद इनके फिर से  आने के बाद यह चर्चा  आम हो गयी कि अब भाजपा और विहिप फिर से इस मामले को हवा देना चाहते हैं , पर बड़ा प्रश्न है कि क्या यह सब वर्ष २०१७ में उत्तर पदेश के विधान सभा चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है या फिर जैसा कि विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि उनके नेता स्वर्गीय अशोक सिंघल की अंतिम इच्छा को पूर्ण करने की दिशा में यह प्रयास है|

वैसे २०१६ में राम मंदिर मुद्दे  को हवा देने की योजना अशोक सिंघल के जीवनकाल में ही  बन गयी थी जब उनके द्वारा पोषित एक शोध संस्थान अरुधती वशिष्ठ संस्था के सौजन्य से जनवरी में राम मंदिर के विषय में एक  संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली में जनवरी २०१६ में करने की योजना बनाई गयी थी और अब उनके देहांत के बाद इसमें और तेजी लाने की योजना बनाई गयी है|

उधर उत्तर प्रदेश में अयोध्या में मंदिर निर्माण हेतु आने वाले पत्थरों के  शिला पूजन के बाद संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे की गूँज होने और अयोध्या में बाबरी मस्जिद का प्रारूप सामने आने के बाद से भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद का मकसद स्वयं ही हल होता नजर आ रहा है|

अयोध्या मुद्दे को हवा देने के पीछे असली मकसद हिन्दू जनता का मूड भांपने की कवायद है ताकि यह जाना जा सके कि इस मुद्दे में अब कितना दल है और इसे लेकर लोगों की सोच क्या है?

करीब दो ढाई दशक बाद उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे के सहारे राजनीति की नौका पार लगाना भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के लिए सरल नहीं होगा क्योंकि अब स्थिति काफी जटिल है|

मामला सुप्रीम कोर्ट में है और चाह कर भी इस मामले में कुछ अधिक नहीं किया जा सकता और इसी कारण इस मामले में हिन्दू भावनाओं को एक सीमा से अधिक उत्तेजित कर पाना भी इन संगठनों के सामने चुनौती होगी क्योंकि आज की स्थिति में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का विरोध शायद ही कोई कर रहा है और राजनीतिक दलों के द्वारा इसका विरोध न करने की स्थिति में और कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करने की बात कहने से भाजपा बनाम अन्य के ध्रुवीकरण की सम्भावना भी कम हो जाती है |

आज की स्थिति में राम मंदिर मामले को सामने लाने से सबसे अधिक सवालों का जवाब भाजपा और उसके अन्य सहयोगियों को ही देना होगा कि यह मुद्दा उनके लिए राजनीतिक फ़ुटबाल की भांति नहीं है और वे राम मंदिर निर्माण की निश्चित तिथि देने के पक्ष में हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विहिप और भाजपा अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की कोई निश्चित तिथि देते हैं और यदि देते हैं तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बिना निर्माण कैसे करते हैं?

आज की स्थिति में राम मंदिर मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने का कोई भी प्रयास भाजपा को राजनीतिक रूप से भारी पडेगा और उसकी विश्वसनीयता को नुकसान ही होगा|