महागठबंधन की राजनीति का बढ़ता दायरा

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बढ़ता दायरा

बिहार की राजनीति में महागठबंधन की सफलता के बाद नीतीश  कुमार ने बिहार के प्रयोग को अपने राज्य से बाहर करने की अपनी मंशा को न केवल जाहिर किया है वरन उस पर गंभीरतापूर्वक कार्य भी आरम्भ कर दिया है | अभी कुछ दिनों पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कद्दावर जाट नेता चौधरी अजीत सिंह के साथ जे डी यू के महासचिव के सी त्यागी की मुलाक़ात को राजनीतिक हलकों में इसी रूप में लिया गया कि वर्ष २०१७ में  उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर नीतीश कुमार बिहार की तर्ज पर देश के सबसे बड़े राज्य में  किसी महागठबंधन  की सम्भावनाएं तलाश रहे हैं पर इसी बीच एक और  खबर ने इस बात को और  पुष्ट कर दिया कि नीतीश कुमार बिहार के प्रयोग को उत्तर प्रदेश के बाहर उन राज्यों में भी ले जाना  चाहते हैं जहां भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा मजबूत स्थिति में है  | इसी क्रम में नीतीश कुमार ने बिहार चुनाव में अपने रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर को असम में स्थिति का जायजा लेने भेजा और उनकी रिपोर्ट को लेकर आई खबरों पर विश्वास करें तो इस रिपोर्ट में असम के वर्तमान मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता तरुण गोगोई की स्थिति अच्छी नहीं है और उनके रहते कांग्रेस को अच्छे नतीजों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए | इस स्थिति में असम  विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री के कांग्रेस के प्रस्तावित नाम में बदलाव और बिहार की तर्ज पर अन्य  क्षेत्रीय दलों से गठंबंधन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता |

असम को लेकर प्रशांत किशोर की रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह के साथ के सी त्यागी की भेंट से केवल यही राजनीतिक संकेत नहीं मिलता कि नीतीश कुमार बिहार से बाहर के राज्यों में भी महागठबंधन की तर्ज पर गैर भाजपा दलों को साथ लाना चाहते हैं वरन इससे यह भी सिद्ध होता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस को विश्वास में लेकर २०१९ की रणनीति पर भी काम करते हुए गैर भाजपा धुरी के नेता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं|

अभी हाल में एन सी पी के नेता शरद पवार ने अपने जन्मदिन पर अपने राजनीतिक अनुभव पर आधारित पुस्तक में स्वर्गीय राजीव गांधी के निधन के बाद १९९१ में कांग्रेस में नेता के चयन और प्रधानमंत्री बनाने में गांधी परिवार की प्रमुख भूमिका का जिक्र  विस्तार से किया है जिससे यह संकेत तो मिलता ही है कि किसी भी गैर भाजपा ध्रुव के लिए गांधी परिवार का समर्थन कितना आवश्यक है और इस तथ्य को देखते हुए नीतीश कुमार की न केवल गांधी परिवार से नजदीकी वरन उनके रणनीतिकार के रूप में उनकी भूमिका देश की आगे आने वाली राजनीतिक दिशा की ओर एक संकेत तो है ही|