महाराज का साक्षी भाव

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विवादों के महाराज

लखनऊ,  उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है जो कि यदि भाषा की मर्यादा का पालन करते हुए दिया होता या उसमें वास्तव में नारी की स्थिति में सुधार का अधिक आग्रह दिख रहा होता तो शायद वह विवाद के स्थान पर बहस को दिशा दे सकता था , परन्तु संभवतः साक्षी महाराज अपने बयान से महाराष्ट्र के शनि मंदिर में टूटी परम्परा को साम्प्रदायिक आधार पर संतुलित करने और केरल के शबरीमला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी टिप्पणी के बाद उभरी परिस्थितियों के संदर्भ में हिन्दू धर्म के परम्परावादी खेमे की बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे|

वैसे साक्षी महाराज ने इस्लाम में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जो बात कही है उस पर कोई स्पष्ट राय बना पाना संभव नहीं है क्योंकि यह विषय इस बात अधिक निर्भर करता है कि  आप इसे किस नजरिये से देखते हैं | जो मुस्लिम महिला संगठन इस्लाम में महिलाओं को अधिकार की मांग कर रही हैं उन्होंने इस्लाम में महिलाओं की स्थिति या शरियत में उनके लिए दिए अधिकारों पर प्रश्न नहीं खड़े किये हैं बल्कि उनका मानना है सभी धर्मों की तरह यहां भी धर्म की सही व्याख्या और प्रबंधन का एकाधिकार जिन हाथों में है वे इसकी व्याख्या इस प्रकार कर रहे हैं कि महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है |

दूसरी ओर साक्षी महाराज ने देश के न्यायालय की ओर जो  संकेत किया है वह भी तथ्य से परे है क्योंकि जब भी मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर न्यायालय ने  हस्तक्षेप किया है तो राजनीतिक कारणों से इस पर सरकारों ने अमल नहीं किया है |

राजीव गांधी की सरकार में 1985 में  शाहबानो प्रकरण में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने के इन्डियन पीनल कोड के नियम के दायरे में शरियत को भी ला दिया था पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने संसद में अपने संख्या बल से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को संसद के क़ानून से निष्प्रभावी कर दिया था |

 

1995 में एक बार फिर प्रसिद्ध सरला मुद्गल केस में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित सामान नागरिक संहिता के प्रति कोई निर्देश नहीं जारी करते हुए भी तत्कालीन सरकार से इस विषय पर गौर करने का आग्रह किया था |

इसी प्रकार 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने नशे की हालत में दिए गए तलाक को अवैध घोषित कर दिया था जिसे मुस्लिम संगठनों ने भी सराहा था, अभी पिछले वर्ष 16 अक्टूबर 2015 को भी सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान मनमाने ढंग से तलाक को मानवाधिकार और स्त्री की गरिमा से जोड़कर देखा था और इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता जताई थी |

भारतीय जनता पार्टी के नेता और सदस्य हर मुद्दे को साम्प्रदायिक नजरिये से देखते हैं और लोगों में ऐसा भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं कि इस देश में व्यवस्था के सभी स्तम्भ बहुसंख्यकों के विरुद्ध साजिश कर रहे हैं , इस  मानसिकता से बाहर आकर भाजपा के नेताओं को देश में सार्थक बहस और सुधार के लिए अनुकूल वातावरण बनाना चाहिए|

आज यदि साक्षी महाराज को वास्तव में शरियत में सुधार के लिए प्रयास करना है तो उन्हें न्यायालय से  नहीं अपनी सरकार से शिकायत करनी चाहिए |