मायावती क्यों बिदक रही हैं कांग्रेस से ?

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पिछले कुछ महीनों से देश की राजनीति के केंद्र में एक ही बहस चल रही है कि अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों में सत्त्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध विपक्षी राजनीतिक दलों का महागठबंधन होगा या नहीं ? कुछ महीने पूर्व उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ आ जाने से केंद्र और प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को जिस प्रकार पराजय का सामना करना पडा उसके बाद इन पार्टियों के साथ चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हो गयीं और इसने न केवल भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनाव को लेकर बनाई जाने वाली  रणनीति को प्रभावित किया बल्कि पूरे देश में राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बहुजन समाज  पार्टी आ गयी और जब बहुजन समाज पार्टी ने कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर के साथ राज्य विधानसभा चुनावों में गठबंधन किया और फिर कांग्रेस के साथ मिलकर जनता दल सेक्युलर की सरकार बनवाने में एक भूमिका निभाई तो एक बार फिर बहुजन पार्टी और उसकी नेता शुश्री मायावती देश की राजनीति की चर्चा के केंद्र में आ गयीं |

देश में अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों से  पूर्व इस वर्ष के अंत में अत्यंत महत्वपूर्ण हिन्दी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़  में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और इन राज्यों के विधानसभा चुनावों को किसी प्रस्तावित महागठबंधन की भूमिका के रूप में देखा जाने लगा और इसी कारण जब कुछ सप्ताह पूर्व बहुजन समाज पार्टी ने छत्तीसगढ़ में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन करते हुए राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की तो इसे प्रस्तावित महागठबंधन की रणनीति की दिशा में एक झटका माना गया और इसी के साथ मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस और बसपा के मध्य गठबंधन होता नहीं दिख रहा था , परन्तु जब आज बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने  मीडिया में आकर घोषणा कर दी कि वे तीन राज्यों में कांग्रेस के साथ किसी प्रकार का गठबंधन नहीं करेंगी और इसी के साथ उन्होंने कांग्रेस पर आरोप भी लगाया कि वह बहुजन समाज पार्टी को समाप्त करना चाहती है| इससे पूर्व मध्य प्रदेश के कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने मीडिया में आकर यह खुलासा किया था कि सी बी आई और ई डी का भय दिखाकर मायावती को कांग्रेस के साथ गठबंधन से रोका जा रहा है और इसके जवाब में मायावती ने दिग्विजय सिंह पर भाजपा का एजेंट होने का आरोप जड़ दिया और उनके अनुसार दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बसपा का गठबंधन नहीं होने देना चाहते और इसी क्रम में मायावती ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस संरक्षक श्रीमती सोनिया गांधी की प्रशंसा करते हुए उन्हें गठबंधन का समर्थक बताया |

मायावती के इस बयान के मायने निकले जा रहे हैं | जहां तक मायावती और दिग्विजय सिंह के एक दूसरे पर आरोप का प्रश्न है तो दोनों के बयान सिरे से खारिज नहीं किये जा सकते क्योंकि मीडिया और राजनीतिक गलियारे  में यह चर्चा काफी समय से चल रही है कि मायावती को कांग्रेस के पाले में जाने से रोकने के लिए हर तरह के हथकंडे परदे के पीछे से अपनाए जा रहे हैं और व्यक्तिगत बातचीत में भी भारतीय जनता पार्टी के नेता यह आत्मविश्वास जताते हैं कि अंत में मायावती किसी भी महागठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी और इस आत्मविश्वास का कोई तो कारण होगा? इसी प्रकार मायावती द्वारा दिग्विजय सिंह पर लगाए गए जिस आरोप का प्रश्न है कि वे भाजपा एजेंट हैं तो इसे भी सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि गोवा के प्रभारी रहते हुए उनकी उदासीनता के चलते कांग्रेस भाजपा से अधिक संख्या बल होने के बाद भी सरकार बनाने से चूक गयी थी, इसी प्रकार महत्वपूर्ण मौकों पर विवादित बयान देकर भाजपा को लाभ देने वाले कांग्रेसी  नेताओं में दिग्विजय सिंह प्रमुख हैं और इस कारण मायावती का उनके लिए भाजपा का एजेंट होने का दावा कितना सत्य हैं यह तो नहीं कहा जा सकता पर उनके चलते भाजपा को लाभ अवश्य होता है|

परन्तु इन दावों और प्रतिदावों से परे मायावती का कांग्रेस से बिदकने के पीछे कुछ और भी कारण हैं|

मायावती आयु की नजर से कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के समकक्ष हैं और यूपीए के शासनकाल में दोनों ने एक दूसरे के साथ काम किया और एक दूसरे को बेहतर समझते हैं जबकि कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी दूसरी पीढी के नेता हैं और उनकी रणनीति और राजनीतिक प्राथमिकता भी अलग है|

राहुल गांधी ने गुजरात के चुनावों में जिग्नेश मेवाणी को नए दलित चहरे के रूप में उभारा था और इसी प्रकार उन्होंने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में नए दलित चेहरों को राजनीतिक मंच देकर दलित राजनीति में नए राजनीतिक समीकरण पैदा करने का प्रयास किया है| इसने मायावती को कुछ हद तक असुरक्षित कर दिया है और उन्हें लगता है कि कांग्रेस जान बूझकर देश की दलित राजनीति में उनका कद छोटा करने का प्रयास कर रही है , जबकि दूसरी ओर कांग्रेस को और विशेषकर राहुल गांधी को ऐसा लगता है कि दलित राजनीति में भी आये पीढीगत बदलाव के चलते मायावती के एकाधिकार को चुनौती मिल रही है और जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था कि उत्तर प्रदेश में अधिकतर दलित वोटर मायावती को छोड़कर नरेन्द्र मोदी के साथ चले गए थे क्योंकि मायावती के बारे में होने वाली चर्चा कि अब वो दौलत की बेटी बन गयी हैं कहीं न कहीं युवा दलित वोटरों को प्रभावित करती है और वे नए विकल्प की तलाश में हैं जो क्रांतिकारी रूप से दलित आवाज बने|

इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की रणनीति में सवर्ण  भी शामिल हैं  और कांग्रेस भले ही खुलकर सवर्णों की बात न करती हो पर राजस्थान में करनी सेना और मध्य प्रदेश में एस एसटी एक्ट और प्रोमोशन में आरक्षण के विरोध में हो रहे आन्दोलन को मिल रहे समर्थन का पूरा विरोध सत्ताधारी भाजपा के खाते में जाने देने के लिए कांग्रेस ने अब मध्य प्रदेश और राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन पर रूचि लेना बंद कर दिया है ताकि सवर्ण मतदाताओं की सहानुभूति उसे मिल सके और एक बार मध्य प्रदेश और राजस्थान में सवर्णों ने कांग्रेस का साथ दे दिया तो उत्तर प्रदेश और बिहार में भी सवर्ण कांग्रेस की ओर सहानुभूति से देखना आरम्भ कर देंगे और यही कारण है कि राहुल गांधी ने अब खुले तौर पर दलितों के अधिकारों के बारे में उस स्तर पर बोलना बंद कर दिया है जो सवर्णों को उनसे दूर कर दे और उनकी रणनीति है कि भाजपा को दलितों के मामले में उलझा दिया जाए और दलितों में नए दलित नेताओं में माध्यम से मायावती की अपील को कम किया जाए | मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में राहुल गांधी अपनी इसी नयी रणनीति को आजमाना चाहते हैं और मायावती की उस महत्वाकांक्षा को विराम लगाना चाहते हैं जिसके अंतर्गत उन्होंने स्वयं को लोकसभा के लिए प्रस्तावित महागठबंधन का स्वयंभू नेता घोषित कर देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को देखना आरम्भ कर दिया था|

मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं कि ये चुनाव मायावती के लिए उसी प्रकार मायने रखते हैं जैसे  आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल के लिए पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव मायने रखते थे , जिस प्रकार उन विधानसभा चुनावों के परिणामों ने अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को ध्वस्त कर दिया था उसी प्रकार इन राज्यों के चुनाव परिणाम आने वाले दिनों के लिए बसपा प्रमुख मायावती की राजनीतिक उपयोगिता को निर्धारित करेंगे|