मोदी ट्रम्प मुलाक़ात में भारत के हित कितने सधे?

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Bear hug without warmth

पिछले वर्ष दिसंबर में पूरी दुनिया को चौंकाते हुए डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने प्रतिद्वंदी अमेरिका की  पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को भारी अंतर से पराजित कर दिया और ब्रिटेन में यूरोपियन संघ से अलग होने के जनमत में यूरोप से  अलग ब्रिटेन के हितों के लिए यूरोपियन संघ से अलग होने के पक्ष में आये ब्रिटेन के  जनमत के बाद अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की विजय ने दुनिया में राष्ट्रवाद के उभार का संकेत दिया |

डोनाल्ड ट्रम्प की विजय को उनके वैश्विक आतंकवाद के इस्लामी पहचान के विवाद पर चल रही विश्व व्यापी बहस के मध्य काफी मुखर रूप से उसे इस्लामी आतंकवाद के रूप में चित्रित किये जाने के अभियान को  भी उनकी विजय का कारण माना गया और इस दौरान भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मध्य अनेक समानताओं की बातें की जाने लगीं और पूरी दुनिया को इन दोनों नेताओं की मुलाकात का इन्तजार था|

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब अपनी अमेरिका की यात्रा से वापस आ चुके हैं और इस यात्रा को लेकर उत्साह और मीडिया कवरेज से परे अब विश्लेषण होना आरम्भ हो गया है कि इस यात्रा से भारत को क्या हासिल हुआ?

वर्ष 2015 में जब भारत के गणतंत्र दिवस पर शामिल होने के लिए  तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आये थे तो  उस प्रेस वार्ता में भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री भी अनेक मामलों को सुलझाने में सहायक होती है और इसी क्रम में बराक ओबामा के पूरे कार्यकाल में उनकी और नरेन्द्र मोदी की मित्रता की बातें होती रहीं पर देश के अनेक मुद्दे भी अपनी जगह वैसे ही बने रहे जैसे कि पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक सहायता , 2008 के मुम्बई हमलावरों पर पाकिस्तान की ओर से कोई कार्रवाई न होने पर भी अमेरिका की ओर से कोरी बयानबाजी और साथ ही व्यापार में भारत के हितों को नजरअंदाज कर अमेरिकी हितों के लिए भारत के बाजार पर दबाव डालना | भारत में परमाणु तकनीक से बिजली उत्पन्न करने के लिए भारत को अपेक्षित सहयोग न  देना |

इसी प्रकार  चीन के राष्ट्रपति जी जिंगपिंग ने जब भारत की यात्रा की और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके साथ साबरमती आश्रम में झूला झूला तब भी यह आस  जगी कि अब भारत और चीन के मध्य सम्बन्धों में नया दौर आयेगा पर अब  जिस प्रकार चीन भारत में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में सीमा विवाद को उठा रहा है और पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगना मशूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकी घोषित करने के भारत के हर प्रयास को वीटो कर रहा है तथा भारत को न्यूकलियर सप्लायर ग्रुप में प्रवेश करने के मार्ग में रोड़ा डाल रहा है और पाकिस्तान को भी इस ग्रुप में प्रवेश दिलाना चाहता है उससे इस बात पर सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या वास्तव में दो देशों के शीर्ष नेताओं के आपसी रिश्ते कूटनीतिक और रणनीतिक हकीकत को परे रखकर नए रास्ते तलाश सकते हैं|

जिस प्रकार बराक ओबामा और जी जिंगपिंग के साथ मोदी के आपसी रिश्ते देश की प्राथमिकताओं के बारे में इन नेताओं की सोच को बदल नहीं पाए  उसे देखकर इस बात की उम्मीद कम ही है कि नरेन्द्र मोदी से जिस प्रकार बेरुखे अंदाज में डोनाल्ड ट्रम्प ने गले मिलने की औपचारिकता निभाई है उसके बाद भारत और अमेरिका के संबंधों में कोई निर्णायक परिवर्तन आ पायेगा |