राजनीति में काले धन का सच

0
510
काले धन के हाथों में राजनीति

मध्य प्रदेश में विदिशा में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने नई दुनिया के साथ बातचीत में बड़ी साफगोई से स्वीकार किया कि देश की राजनीति पूरी तरह काले धन पर आधारित है  और इस हमाम में सभी नंगे हैं अंतर केवल इतना है कि किसी के पास काला धन कम है तो किसी के पास अधिक है|

सलमान खुर्शीद का यह बयान कांग्रेस और भाजपा द्वारा एक दूसरे पर काले धन को लेकर संकेतों में प्रहार करने की कड़ी का एक और उदाहरण है, अभी कुछ दिन पहले देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पनामा पेपर में भाजपा से जुड़े कुछ लोगों के नाम घसीटे जाने के कांग्रेस के प्रयास पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि पनामा पेपर मामले की जाँच के बाद कांग्रेस के पास खुश होने को बहुत कुछ नहीं बचेगा |

वित्त मंत्री के संकेत के बाद सलमान खुर्शीद ने काले धन के हमाम में सभी के नंगे होने की बात कहकर देश की राजनीति में काले धन के सच को  सामने ला दिया है और साथ ही राजनीति की उस विवशता को भी उजागर कर दिया है कि किस प्रकार काले धन के मामले में सभी राजनीतिक दलों को एक दूसरे का हित देखते हुए चुप्पी साधनी पड़ती है|

पनामा पेपर लीक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है | पनामा आइसलैंड , ब्रिटेन, स्पेन और पाकिस्तान में इसे लेकर हलचल है और जनता से लेकर राजनीतिक दल आपस में एक दूसरे से सवाल कर रहे हैं पर भारत में इस विषय पर जनता से लेकर राजनीतिक दलों तक रहस्यमय चुप्पी एक ही  संकेत करती है कि अब  काला धन देश की राजनीति में कोई मुद्दा नहीं रहा और न ही राजनीतिक दल या देश की जनता काले धन से लोकतंत्र को होने वाले खतरों और देश की सुरक्षा को होने वाले खतरों को लेकर तनिक भी सजग हैं|

देश के संविधान ने जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई है उसके अंतर्गत हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है “ हम भारत के लोग” अर्थात देश की वास्तविक संप्रभुता देश की जनता के हाथों में है और जनप्रतिनिधि ग्राम सभा से विधानसभा और संसद तक उस संप्रभुता का उपयोग जनता की ओर से जनता के लिए इन संस्थानों की माध्यम से करते हैं , परन्तु राजनीति में काले धन के अथाह प्रवाह ने इस पूरी प्रकिया की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है क्योंकि अब किसी भी राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि की प्राथमिकता में देश में वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए कार्य करने के स्थान पर चुनाव जीतना और चुनाव में अंधाधुंध धन खर्च करना और ऐसे धन के प्रति  पार्टी की  कोई जवाबदेही सुनिश्चित  न करते  हुए चुनाव जीतने के बाद धन उपलब्ध कराने वालों की हर जायज नाजायज मांगें मानकर जनता के प्रतिनिधि न होकर धनपशुओं के प्रतिनिधि के रूप में काम करना हो जाता है |

देश की राजनीति में  बढ़ रही यही प्रव्रत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है |  क्योंकि यह स्थिति  ९० के दशक में देश में राजनीति के अपराधीकरण की स्थिति से भी खतरनाक  है | ९० के दशक में देश की राजनीति में एक ऐसी स्थिति आ गयी थी कि जिन आपराधियों को नेता चुनाव के समय अपने विरोधियों को डराने के लिए और बूथ कैप्चरिंग के लिए पाल कर रखते थे उन्होंने धीरे धीरे स्वयं ही राजनीति के गुर सीख लिए और राजनीति में आ गए और अपने बाहुबल और खौफ से क़ानून और  व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर  अपना दरबार लगाकर जनता का काम करवाने लगे और कई स्थानों पर तो क़ानून व्यवस्था  उनके इशारों पर चलती थी ( आज भी अनेक स्थानों पर ऐसी ही स्थिति है ), राजनीति के अपराधीकरण के इस भयावह प्रयोग ने सभी राजनीतिक दलों को इस समस्या पर सोचने को विवश किया और देश की जनता में भी इस विषय पर कुछ जागरूकता आई हालांकि  इस दिशा में अब  भी काफी कुछ किया जाना शेष है |

आज राजनीति में काले धन के  प्रवाह को लेकर भी स्थिति अत्यंत खतरनाक हो गयी है और यह देश के राजनीतिक  दलों और राजनेताओं के हित में होगा कि वे एक साथ बैठकर इसका कोई हल निकालें क्योंकि काले धन का सच और उससे जुडी राजनेताओं और राजनीतिक दलों की मजबूरी जनता समझ चुकी है इसलिए बेहतर होगा कि अपनी कमीज को दूसरे से सफ़ेद दिखाने का ढोंग करने के स्थान पर काले धन पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय किये जाएँ , इससे पहले कि देश का लोकतंत्र और राजनीति पूरी तरह थैलीशाहों या माफियाओं  के हाथ में सिमट जाए और जनप्रतिनिधि इनके एक मोहरे बन कर रह जाएँ |

क्योंकि सभी को यह पता है कि किस प्रकार प्रखर और मेधावी राजनेता चुनाव से पहले जिस तेवर में दिखते हैं वही चुनाव के बाद कैसे मुरझाये और ढीले ढाले हो जाते हैं और उन पर पड़ने वाला दबाव साफ़ झलक जाता है  | यही स्थिति देश के लोकतंत्र के लिए खतरनाक है क्योंकि चुनावों में जनता अपना विश्वास उस नेता पर व्यक्त करती है क्योंकि  उसे यह पता नहीं होता उसके पीछे क्या धनबल है, यह लोकतंत्र और जनता के साथ धोखा है और अप्रत्यक्ष रूप से लोकतंत्र को काले धन के अधिपतिओं के हाथ में गिरवी रखने जैसा है  और ऐसा की चलता रहा तो जनप्रतिनिधि और जनता के मध्य संवादहीनता और अविश्वास की खाई और चौड़ी होती जायेगी|