राम मंदिर पर अब क्या है संघ परिवार की रणनीति ?

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Image Source- Patrika

अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण का मुद्दा पिछले अनेक दशकों से भारतीय राजनीति में पहचान का मुद्दा बना हुआ है| 1980 के दशक में आरम्भ हुआ यह मुद्दा अनेक उतार चढाव से गुजरता हुआ अब भी देश की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है , जिसके इर्द गिर्द वैचारिक , दलीय और साम्प्रदायिक हर स्तर की राजनीति की जाती है|

पिछले कुछ महीनों से अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का विषय अधिक चर्चा में इसलिए है क्योंकि इसी विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  परिवार में कुछ उठापठक देखने को मिल रही है| विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व नेता प्रवीण तोगडिया जब संसद में कानून के माध्यम से अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थल पर मन्दिर निर्माण की मांग करते हुए समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार से अलग राय रख रहे थे तो इसी मुद्दे पर उन्हें अपना पुराना संगठन छोड़कर नया हिन्दू संगठन बनाना पडा और अब कानून के माध्यम से अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की बात समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की ओर से की जा रही है, आखिर इस परिवर्तन का कारण क्या है ?

वर्तमान स्थिति में संघ परिवार के रुख में आये इस बदलाव को समझने की आवश्यकता है| आम तौर पर ऐसी धारणा है और अनेक स्रोतों से यह खबर आती है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से राम मंदिर के मुद्दे पर शीघ्र निर्णय की इच्छा जतायी थी , परन्तु सरकारों की कार्य करने की जो पद्धति होती है उसमें किसी जटिल या विवादित मुद्दे के निवारण से उन्हें कोई लाभ नहीं होता जितना उसके लगातार जटिल होते जाने से होता है| राम मंदिर का विषय भी अब इस जटिल स्थिति में पहुंच चुका है कि शायद ही कोई सरकार इसके समाधान में अपना हाथ डालना चाहेगी |

अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की धुरी रहा है पर अब भारतीय जनता पार्टी की राजनीति राम मंदिर के विमर्श से काफी आगे जा चुकी है और यह राजनीतिक सत्य है कि राममंदिर के मुद्दे को समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने देश में ध्रुवीकरण के माध्यम से सेक्युलरिज्म को एकांगी सिद्ध कर आजादी के बाद से चली आ रही राजनीति में हलचल पैदा कर अपने लिए नया वैचारिक और राजनीतिक आधार खड़ा करने के लिए किया था ताकि इस आन्दोलन के इर्द गिर्द जो सामाजिक और राजनीतिक शक्ति एकत्र हो उसे कांग्रेस के विकल्प में देश में  एक नयी राजनीतिक धुरी  के रूप स्थापित होने  में प्रयोग किया जा सके|

राम मंदिर के मुद्दे के आधार पर खडी हुई राजनीति ने समस्त राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ परिवार को उस स्थिति में ला दिया है जहां से यदि वे अयोध्या में राममंदिर का निर्माण नहीं कर पाए तो भी उनकी राजनीतिक स्थिति पर विशेष असर नहीं पड़ने वाला है और इसका सबसे बड़ा सांकेतिक प्रमाण है कि  अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई पर गुजरात में सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनवारण हो गया, यह इस बात को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति राम पर या अयोध्या पर निर्भर नहीं है|

आज की स्थिति में राम मंदिर के निर्माण का विषय संघ परिवार के लिए उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए कोई मायने नहीं रखता, इसका महत्व केवल दो कारणों से है और जो भविष्य की राजनीति पर प्रभाव डाल सकता है इस कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार इस मुद्दे पर नए सिरे से सक्रिय होने का आभास दे रहा है|

पहला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में पहली बार ऐसा अवसर आया है जब लम्बे समय तक  उनके संगठन का हिस्सा रहने वाला सदस्य  उनसे  अलग होकर उनके जैसी ही बात करने के बाद समाज में समर्थन प्राप्त कर रहा है, इससे पहले अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जब संघ परिवार से अलग अपना रास्ता बनाने वाले व्यक्ति को या तो अप्रासंगिक होना पडा या फिर अंत में फिर से संघ परिवार की शरण में जाना पडा , परन्तु प्रवीण तोगडिया ने विश्व हिन्दू परिषद से अलग होने की कुछ ही महीनों बाद अपनी हिन्दू नेता की पहचान फिर से हासिल कर ली और ऐसे में संघ परिवार को इस बात की चिंता है कि तोगडिया की सफलता से प्रेरित होकर संघ परिवार के अन्य आयामों के सदस्य भी ऐसी महत्वाकांक्षा पाल सकते हैं और इसी कारण भारतीय जनता पार्टी सहित संघ परिवार के सभी घटक एकस्वर में अयोध्या में राम मंदिर पर संसद में कानून की बात कर रहे हैं ताकि प्रवीण तोगडिया की ओर से लोगों का ध्यान हट जाए विशेष रूप से संघ परिवार के सदस्यों और स्वयंसेवकों का|

अयोध्या में राम मंदिर के लिए संसद में क़ानून की मांग करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी की सहायता करना चाहता है , ताकि राम मंदिर के निर्माण को लेकर संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी की प्रतिबद्धता पर सवाल खडा होना बंद हो जाए और कांग्रेस सहित अनके विपक्षी दलों से सवाल होना आरम्भ हो जाए विशेष रूप से संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक वर्ग में और यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता हों या संघ परिवार के नेता वे संसद में राम मंदिर पर कानून की बात पर प्रश्न भारतीय जनता पार्टी से न करते हुए कांग्रेस और विपक्ष से कर रहे हैं| इसी कड़ी में हिंदुत्व विचार के समर्थक माने जाने वाले लोग योजनाबद्ध रूप से सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से सुप्रीम कोर्ट सहित न्यायपालिका को लेकर लोगों के मन में यह धारणा विकसित करने में लगे है  कि न्यायपालिका और विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट देश में हिन्दू भावनाओं की अनदेखी कर रहा है और इस अभियान में भारतीय जनता पार्टी के  नेता भी शामिल हैं, ताकि राम मंदिर के विषय पर गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाली जा सके और राममंदिर मुद्दे को आरम्भ करने के पीछे जो वास्तविक उद्देश्य था उसे आगे बढाया जा सके कि देश की समस्त व्यवस्था को हिंदुत्व के अनुरूप करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को लगातार मजबूत करते रहने की आवश्यकता है |

अयोध्या में राममंदिर के निर्माण का विषय सदैव से राजनीतिक था और सदैव राजनीतिक ही रहेगा , राजनीतिक स्थितियों और परिस्थितियों के अनुसार इसकी रणनीति संघ परिवार की ओर से बदलती रहती है , वर्तमान स्थिति में आने वाले दिनों में संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी इस विषय पर कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे और कांग्रेस सहित विपक्ष पर मंदिर न बन पाने की  जिम्मेदारी डाल देंगे और संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक लेखों से , टीवी डिबेट में अपने तर्क कुतर्क से कांग्रेस सहित विपक्ष से सवाल करेंगे कि हम तो संसद में कानून आज ला दें क्या आप समर्थन करेंगे?

जिस प्रकार पुलिस या सेना के साथ मुठभेड़ में जब दोनों तरफ से गोली चलती है तो कुछ बेगुनाह भी मारे जाते हैं इसी प्रकार राम मंदिर की राजनीतिक मुठभेड़ में वे बेगुनाह शिकार हो गए जिन्होंने अपनी आस्था और श्रद्धा के चलते इस आन्दोलन का समर्थन किया था |