विवेक तिवारी हत्याकांड से हिली उत्तर प्रदेश सरकार

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पुलिस की दरिंदगी का शिकार बना निर्दोष चित्र ,साभार - bhaskar.com

लखनऊ, 1 अक्टूबर|  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ  में एप्पल कंपनी के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी की पुलिस कांस्टेबल  द्वारा की गयी कथित हत्या के मामले ने अत्यंत गंभीर रूप धारण कर लिया है और इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की सरकार को हिलाकर रख दिया है|

बीते अडतालीस घंटों में इस पूरे घटनाक्रम में अनेक मोड़ आते जा रहे हैं और अब इस घटना के साथ जुड़ रही जन अवधारणा ने उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के कान खड़े कर दिए हैं|

इस पूरे घटनाक्रम में अब तक तीन बड़े मोड़ आ चुके हैं| सबसे पहला मोड़ तो यह रहा कि जब आरंभिक दौर में इस पूरे काण्ड को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही और पुलिस की ओर से   इस पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं की जा रही थी और ऐसा लगा कि शायद यह गोलीकांड उत्तर प्रदेश सरकार की कथित एनकाउन्टर नीति का हिस्सा है , धीरे धीरे जब पूरे घटनाक्रम की परत खुलने लगी तो पता चला कि यह पुलिस कांस्टेबल की अपने स्तर पर की गयी कारवाई का नतीजा था जिसे अनेक घंटों तक पुलिस के अधिकारियों की सहायता से रफा दफा करने की कोशिश की जाती रही क्योंकि कथित एनकाउन्टर नीति में उत्तर प्रदेश में अपनी वर्दी और अपने हथियार के दुरूपयोग की शिकायतों से जूझ रही पुलिस को इस मामले की गंभीरता का पता चल चुका था और इसी कारण इसे रफा दफा करने के प्रयास में पुलिस की ओर से अपने स्तर पर प्रयास किये गए|

इस पूरे घटनाक्रम में दूसरा मोड़ तब आया जब पुलिस के तमाम प्रयासों के बाद भी पूरे मामले की असलियत जनता और मीडिया के सामने आ गयी और पुलिस के हाथों किसी आम नागरिक की बिना किसी कुसूर के हत्या के इस मामले ने पूरे देश को हिला दिया और इसके साथ ही इस पूरे मामले के राजनीतिक नफ़ा नुकसान के आधार पर इसने तूल पकड़ना शुरू कर दिया |

पूरी घटना के दो दिन बीत जाने के बाद जब मृतक विवेक तिवारी के परिजनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से मिलकर अपने लिए आश्वासन प्राप्त कर लिया है और प्रदेश सरकार पर अपना विश्वास जता दिया है तो इस पूरे घटनाक्रम का तीसरा मोड़ समाप्त हो चुका है और ऐसा माना जा रहा है कि प्रदेश सरकार ने अपना राजनीतिक नुकसान कम कर लिया है या कम से कम इतना सुनिश्चित कर लिया है कि मृतक विवेक तिवारी की पत्नी और बेटियों की सिसकियाँ टीवी चैनल पर नहीं सुनी जायेंगी तो सरकार की किरकिरी भी कम हो जायेगी |

परन्तु इसके बाद भी तीन प्रमुख मुद्दे ऐसे हैं जो लम्बे समय तक उत्तर प्रदेश सरकार के सामने मुंह खोलकर खड़े रहेंगे और इसका प्रभाव जन अवधारणा पर पडेगा |

उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून व्यवस्था के नाम पर पुलिस को वर्दी और हथियार की खुली छूट देकर कहीं एक ऐतिहासिक भूल तो नहीं कर दी है , क्योंकि आम तौर पर पुलिस में तीन स्तर पर समझ वाले कर्मचारी और अधिकारी होते हैं – पहला , कांस्टेबल जो अपने ऊपर के अधिकारी एस एच ओ , इंस्पेक्टर के  इशारे से समझ जाते हैं कि किस स्तर तक अपने वर्दी और हथियार के उपयोग से उन्हें ऊपर के अधिकारियों का  सहयोग मिलेगा, दूसरा स्तर होता है एस एच ओ, इन्स्पेक्टर का जो अपने से ऊपर के अधिकारी , सी ओ ,एस पी, एस एसपी की ओर देखकर समझ जाते हैं कि उन्हें किस स्तर तक जाना है और कितना सहयोग उन्हें मिलेगा , तीसरा स्तर होता है सी ओ, एस पी , एस एस पी का जो सीधे सीधे डीजीपी और  जनप्रतिनिधियों के इशारे को समझते हैं और उनकी सिफारिश मानते हैं और उनसे संरक्षण की उम्मीद रखते हैं|

पुलिस विभाग में इन तीनों ही  स्तरों पर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका डीजीपी और उनके ऊपर बैठे राजनीतिक नेताओं की होती है जिनके मिजाज को भांप कर ही पूरे पुलिस महकमे  की कार्यसंस्कृति विकसित होती है|

विवेक तिवारी हत्याकांड में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लोकतन्त्र में राज्य की जो अवधारणा है उसमें हथियार रखने और उसे चलाने का अधिकार केवल राज्य की ओर से पुलिस और सशत्र बलों को है और ऐसे में राज्य की अगुवाई करने वाले राजनीतिक नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे पुलिस और सशत्र बलों को अपने घोर नियंत्रण में रखें और उन्हें किसी भी स्तर पर ऐसी छूट न दें कि  उन्हें ऐसा लगे कि “ हमने किसी को ठोंक दिया तो ऊपर वाले संभाल लेंगे” यही कारण है कि राज्य की अवधारणा में न्यायालय से लेकर सिविल सोसाइटी और मानवाधिकार संगठन हथियार की खुली छूट पर अंकुश लगाते हैं क्योंकि जनता निशस्त्र होती है और राज्य की ओर से हथियार चलाने की छूट पुलिस और सशस्त्र बलों को होती है|

उत्तर प्रदेश में करीब डेढ़ वर्ष पूर्व जब सत्ता परिवर्तन हुआ था तो इसका बड़ा कारण इस जनअवधारणा का भी था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था ठीक नहीं है और इसे ठीक करने के नाम पर जिस प्रकार प्रदेश के बड़े पदों से आवाज आने लगी कि “ गोली का जवाब गोली” “ हम ठोंक देंगे” तो इस आधार पर यह सन्देश देने की कोशिश की गयी कि प्रदेश में अब कानून का राज स्थापित हो रहा है और यह प्रदेश उद्योगपतियों के लिए पूंजी निवेश का उपयुक्त स्थल है , पर विवेक तिवारी हत्याकांड ने एक नया सवाल खडा कर दिया है कि क्या उत्तर प्रदेश में वाकई स्थिति बदली है? या फिर गैर लाइसेंसी बन्दूक का स्थान लाइसेंसी बन्दूक ने ले लिया है|

शहरी मध्यवर्ग एक ऐसा वर्ग है जो पूरी तरह राज्य के संरक्षण में ही रहता है उसकी नैतिकता को आधार बनाकर स्वयं को सुरक्षित समझता है और उसे लगता है कि संविधान और कानून के दायरे में राज्य और उसके नेता हैं इसलिए वह सुरक्षित है पर एक बार राज्य की संस्थाओं की ओर से असुरक्षा का सन्देश चला गया तो यह असुरक्षा और अविश्वास को बढ़ा देता है , इसी कारण राज्य और इसे चलाने वाले नेता यदि क्रूर और संवेदनहीन हुए और पुलिस को न्यायपूर्ण ढंग से अपना काम करने के स्थान पर ठोंक देने जैसे सन्देश देने लगे तो यह राज्य प्रेरित अराजकता को जन्म देगा|