संशय में उत्तर प्रदेश

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देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला प्रदेश उत्तर प्रदेश जो अपनी जनसंख्या के चलते देश की संसद में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व देने की अपनी विशेषता के चलते राजनीतिक रूप से अधिक चर्चा में रहता है|

हर आम चुनाव में  देश की संसद को सर्वाधिक प्रतिनिधि भेजने वाले इस प्रदेश ने लगभग  चार वर्ष पूर्व हुए आम चुनाव में अपने लिए क्रान्ति की आशा , अपेक्षा और महत्वाकांक्षा के साथ एकतरफा बहुमत एक राजनीतिक दल को दिया था और इसी परम्परा को जारी रखते हुए वर्ष 2017 में हुए राज्य विधान सभा के चुनावों में भी एक राजनीतिक दल को ही पुनः ऐतिहासिक बहुमत दिया परन्तु देश में हुए  आम चुनाव के  लगभग चार वर्षों के बाद और राज्य विधान सभा के चुनावों के एक वर्ष के बाद यदि आप उत्तर प्रदेश की यात्रा बिना किसी आग्रह या पूर्वाग्रह के लोगों के जीवन स्तर में आये सुधारों और जमीनी स्थिति में आये सुधारों को पैमाना बनाकर करें तो आपको गंभीर स्तर पर निराशा का सामना करना पडेगा |

उत्तर प्रदेश आम तौर पर कृषि प्रधान राज्य है और आज से चार वर्ष पहले जब प्रदेश की जनता ने एक राजनीतिक दल ( भारतीय जनता पार्टी ) को केंद्र में आसान बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाने में अपना जबरदस्त योगदान दिया था तो उत्तर प्रदेश के लोगों की दो बड़ी अपेक्षाएं थीं| पहली , उत्तर प्रदेश को कृषि प्रधान राज्य के दायरे से बाहर लाकर इसे औद्योगिक राज्य बनाने की दिशा में कोई ठोस क्रांतिकारी प्रयास होने की अपेक्षा , ताकि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होगा और युवाओं को अपने घर में रहकर रोजगार मिलेगा जो कि चार वर्ष पहले आम चनावों में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के भाषणों में मुख्य रूप से कहा जाता था | दूसरी अपेक्षा , सर्वांगीण सुधारों की दिशा आरम्भ होगी जो उत्तर प्रदेश को आधुनिकता की ओर ले जायेगी जिसमें कि जनप्रतिनिधि अधिक सेवा भावना और कम से कम भ्रष्टाचार के साथ राजनीति करेंगे | चार वर्ष पहले हुए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के गुजरात माडल की चर्चा जोरों पर थी और उनकी जनसभाओं में केंद्र में  सत्ता में  आने पर  गुजरात की तर्ज पर  उत्तर प्रदेश में भी तीव्र औद्योगीकरण की बात की जाती थी|

आम चुनावों के बाद वर्ष 2017 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव प्रचार में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रदेश में अपेक्षित विकास न हो पाने के पीछे बड़ा कारण केंद्र और प्रदेश में भिन्न सरकारों का होना है और केंद्र की योजना और प्रयास को सफल करने में दूसरे दल की प्रदेश सरकार अवरोध उत्पन्न कर रही है , इस कारण जिस प्रकार आम चुनावों में प्रदेश की जनता ने एक राजनीतिक दल के पक्ष में ऐतिहासिक बहुमत दिया यदि उसी अनुपात का बहुमत राज्य विधानसभा चुनावों में भी मिला तो आम चुनावों में किये गए बहुत से वायदे पूरे किये जा सकेंगे |

परन्तु अब जबकि केंद्र में और उत्तर प्रदेश में एक ही राजनीतिक दल की सरकार है फिर भी उत्तर प्रदेश की स्थिति  में सुधार होने के स्थान पर इसमें गिरावट आयी है|

संभव है केंद्र और राज्य की एजेंसियाँ अपने आकड़ों के द्वारा इन तथ्यों को उन लोगों से छिपा ले जाएँ जो उत्तर प्रदेश में जाकर जमीनी स्तर पर स्थितियों का अध्ययन नहीं करते और सरकारी आंकड़ों पर निर्भर रहते हैं|

उत्तर प्रदेश में कृषि की स्थिति में और इसकी गुणवत्ता में गिरावट ही आयी है| केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की पशु बिक्री पर लगे प्रतिबन्ध और गो रक्षकों के उत्पात के चलते पूरे प्रदेश में पशुओं की बिक्री प्रतिबंधित है और इसका परिणाम यह हुआ है कि लोगों के पास चारे की कमी है और गोवंश विशेष रूप से बछड़े उपयोगहीन हो चुके हैं क्योंकि अब बछड़े बैल बनकर कृषि में कोई योगदान नहीं देते इस कारण लोगों ने ऐसे गो वंश को आवारा बनाकर छोड़ दिया है जो लोगों की खडी फसल चर जाते हैं| जिन लोगों ने गाय या गोवंश पाल रखे हैं उनके लिए उनके चारे और भूसे की समस्या हो रही है क्योंकि खडी फसल को इन आवारा पशुओं से बचा पाना उनके लिए कठिन हो रहा है और इस कारण कृषि उत्पादन में कमी आ रही है और वह अचानक अधिक खर्चीला भी हो गया है क्योंकि अपने खेतों की सुरक्षा के लिए खेत के चारों ओर कंटीले तार के  की बाड़ लगाने पड़ रहे हैं जो किसानों के लिए महँगा पड़ रहा है क्योंकि छोटी से छोटी जोत के लिए यह कंटीला बाड़ कम से कम 10,000 रुपये के खर्च तक जाता है   और उनकी पहले से ही महंगी लागत में एक अतिरिक्त  खर्च के रूप में शामिल हो गया है  और यह अतिरिक्त खर्च    उनको अपने फसल से मिलने वाली लागत में और कटौती करा देता है|

उत्तर प्रदेश सहित केंद्र सरकार ने  गो रक्षा के मुद्दे को जोर शोर से उठाया पर गोवंश के लिए न तो उनके आर्थिक उपयोग की दिशा में कोई ठोस प्रयास किया और न ही बड़े स्तर पर हर ग्राम सभा में गोशाला बनाने के प्रयास को युद्ध स्तर पर लिया ताकि आवारा पशुओं की समस्या से किसान निजात पा सकें |

चार वर्ष पूर्व आम चुनावों में उत्तर प्रदेश की जनता से वादा किया गया था जिसे वर्ष 2017 के राज्य विधानसभा चुनावों में फिर से दोहराया गया था वह था किसानों की सिंचाई की स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन | इस दिशा में भी ऐसा कोई ठोस परिणाम जमीनी स्तर पर नहीं दिख रहा है जो किसानों की स्थिति या उनकी लागत को बढ़ाने में कोई बड़ा योगदान कर सके|

इसी प्रकार गन्ना किसानों के  भुगतान के लिए चीनी मिल मालिकों पर दबाव बनाकर उन्हें भुगतान दिलाने की बात कही गयी थी पर यह भी अब धरातल पर उतरता नहीं दिख रहा है|

आवारा पशुओं के चलते और खेतों में बाड़ लगने का एक और प्रभाव समाज में देखने को मिल रहा है| लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण और एक शौचालय के निर्माण में करीब एक से डेढ़ लाख रूपये की लागत आने के कारण और  सरकारी योजनाओं के द्वारा शौचालय के निर्माण में मात्र १२, ००० रूपये दिए जाने से अब भी खुले में शौच की समस्या का हल नहीं हो पा रहा है और दूसरी ओर जंगलों के कटने या फिर जंगलों को खेती लायक जमीन बना लेने के चलते लोग शौच के लिए या रिहायसी इलाके से सटे खेतों और  लोगों के घर  के सामने खुली जमीन पर जाते हैं जो प्रदेश में नए सिरे से हैजा , कालरा और टाइफाइड जैसी महामारियों की आशंका को उत्पन्न कर रहा है|

खुले में शौच की समस्या के निवारण में यदि सत्ता धारी दल के सांसद इसे समाज कार्य के रूप में युद्ध स्तर पर प्रयास करते हुए अपनी सांसद निधि का उपयोग इस उद्देश्य के लिए करते तो इस समस्या के निवारण की दिशा में काफी सफलता मिल जाती , पर आदर्श ग्राम की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना या फिर स्वच्छ भारत का मिशन हो यह केवल टीवी के विज्ञापन में है जमीन पर नहीं है और इसका प्रमुख कारण उत्तर प्रदेश से जीत कर गए सत्ता धारी दल के सांसद हैं जिन्होंने अपनी सांसद निधि से केवल कमीशन बनाया है| सांसद निधि के धन से  सडक, खडंजा , नाली बनायी जाती है , जिसका ठेका सांसद के करीबी को मिलता है और इनमें प्रयोग होने वाली ईंट सहित अन्य सामान के लिए उनकी ही फैक्ट्री चल रही है , अर्थात सांसदों ने हर तरीके से कमाने खाने का धंधा ही बीते चार सालों में  चलाया है और प्रशासन पर धौंस जमाकर विकास की पूरी प्रक्रिया को पंगु कर दिया गया है , सांसद निधि का एक प्रतिशत धन भी जन कल्याण के कार्य के लिए  खर्च नहीं हुआ है, बीते एक वर्ष में प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के विधायकों ने भी यही परिपाटी अपना ली है | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का “ ना खाऊंगा , न खाने दूंगा” का वाक्य उत्तर प्रदेश में उनके ही लोगों द्वारा “ चलो मिल बांटकर खाते है” में बदल दिया गया है|  

उत्तर प्रदेश में औद्योगीकरण की दिशा में कोई पहल ही नहीं की गयी है|  भिन्न राजनीतिक दलों ने एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बचने का काम किया है और प्रदेश की जनता को अपनी नाकामी का परिणाम   भुगतने पर विवश किया है|

 

उत्तर प्रदेश में लोगों के अविश्वास का आलम यह है कि परीक्षाओं में नक़ल रोकने के जिस अभियान की वाहवाही प्रदेश सरकार ले रही है उसमें भी प्रदेश की जनता का आरोप है कि जिन विद्यालयों को बड़े बड़े नेता चला रहे हैं उन्होंने बड़े पैमाने पर पैसे लेकर नक़ल कराने के काम में सरकार और प्रशासन के साथ मिलाकर अपने लिए रास्ता निकाल लिया था और सामान्य छात्र इसमें पिस गए हैं | इसलिए नक़ल माफिया और विद्यालय माफिया ने सरकार पर अपनी पकड़ बरकरार रखी है|

इसी प्रकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को फ्री में दिए जाने वाले राशन में कोटेदार, अनाज एकत्र होने वाले गोदामवाले और स्थानीय जिला प्रशासन मिलकर इसे कमाई का सबसे बड़ा जरिया बना चुके हैं और इसके चलते केंद्र और प्रदेश सरकार का भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा केवल हवाई और कागजी साबित हो रहा है|

उत्तर प्रदेश एक संशय की स्थिति से गुजर रहा है और प्रदेश की जनता में एक अजब खामोशी और विश्वासघात का दर्द साल रहा है और यह खामोशी किसी बड़े तूफ़ान के आने से पहले की शान्ति है|