सचिन तेंदुलकर होने का अर्थ

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आक्रामकता और क्रोध के अंतर की समझ उन्हें सबसे अलग बनाती है

भारतीय समाज में तीन चीजें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं सिनेमा , क्रिकेट और शादी | इन तीनों को मिलाकर यदि देखा जाए तो भारत की कुल अर्थव्यवस्था, वर्ष में इनसे जुड़े कार्यक्रमों में लोगों की व्यस्तता में खर्च होने वाला समय और देश के आम तौर पर अधिकतर लोगों के जीवन को प्रभावित करने के औसत में ये तीनों ही शेष अन्य चीजों पर भारी पड़ती हैं|

देश में क्रिकेट की बात हो और सचिन तेंदुलकर की बात न हो तो ऐसे है जैसे कि मानसून के सीजन के बिना भारत की कल्पना करना |

सचिन तेंदुलकर केवल एक क्रिकेट खिलाड़ी नहीं है असीम संभावनाओं को अपने इर्द गिर्द समेटे एक ऐसे महाकाव्य हैं जिसकी गहराइयों में जितना डूबते जाएँ उतना ही नयापन अनुभव होता है|

1989 का वह चमत्कारिक अनुभव अब भी याद आता है तो रोम रोम प्रफुल्लित हो जाता है कि जब पहली बार पाकिस्तान दौरे पर उन्हें टेलीविजन पर सीधे प्रसारण में देखने का अवसर मिला था | एक ओर रामानन्द सागर का रामायण और फिर सचिन तेंदुलकर की पकिस्तान में बैटिंग लगता था कि शायद इसी को मोक्ष कहते हैं|

उस उम्र में यह बिलकुल आभास नहीं हो पाया था सचिन में क्या अच्छा लगता है| अब जब इसकी समीक्षा करता हूँ तो लगता है कि 1989 में  देश में एक पीढीगत परिवर्तन की आहट आ रही थी, देश में जो किशोर युवा होने की ओर बढ़ रहा था उसने “ ये दिल मांगे मोर” की अपनी हसरतों से नाता जोड़ना आरम्भ कर दिया था और सुनील गावस्कर, दिलीप वेंगसरकर , रवि शास्त्री , मोहिंदर अमरनाथ की कलात्मकता और  यहाँ तक कि कपिलदेव और श्रीकांत  की आक्रामकता से  भी अब उसे संतुष्टि  नहीं आ रही थी | 100 गेंद में पचास रन बनाकर संतुष्ट होने वाले ,  पूरे पचास ओवर में  टीम का स्कोर 200 रन न होने  पर भी उसे सम्मानजनक स्कोर मामने वाले दर्शक अब बदल रहे थे|

हालांकि इस बदलते रुख को बहुत हद तक मोहम्मद अजहरुद्दीन ने भी भांप लिया था और सचिन तेंदुलकर से पहले वही सबसे आक्रामक और लोकप्रिय बल्लेबाज थे पर जिस बात ने सचिन तेंदुलकर को पूरी तरह अलग पहचान दी वह थी उनकी निडरता और स्वयं पर गजब का नियंत्रण | आत्म नियंत्रण के साथ विवेकपूर्ण आक्रामकता की उनकी शैली में भारत के नए युवा वर्ग को उसके अन्तश्चेतन में छुपे भारतीय संस्कार की पूर्ण अभिव्यक्ति मिल गयी थी , जहां कि विरोधी  का डरकर सामना करने की जिद के बाद भी लक्ष्य से भटकाव के बिना आक्रामकता और क्रोध में अंतर रखते हुए अपनी आक्रामकता से विरोधी  पक्ष को पराजित करना था न कि क्रोध की ज्वाला में जलकर विरोधी के हाथों में खेलना था |

सचिन तेंदुलकर जिस दौर में भारतीय टीम में आये उस दौर में न्यूजीलैंड के मार्क ग्रेटबैच ने एकदिवसीय मैचों में शुरू के 15 ओवर में अंधाधुंध तरीके से मारकर खेलने की तकनीक विकसित की थी | जिसे बाद में दुनिया के सभी देशों के ओपनिंग बल्लेबाजों ने अपना लिया , पर सचिन तेंदुलकर ने जब न्यूजीलैंड के एक दौरे में 1994 में नवजोत सिंह सिद्धू के बीमार होने पर एकदिवसीय मैच में ओपनिंग की तब सही मायने में भारत को इस कला का आभास हुआ और आगे चलकर सौरव गांगुली के साथ सचिन तेंदुलकर की जोड़ी ने अनेक वर्षों तक दुनिया को डेसमंड हेंस और गार्डेन ग्रीनिज व डेविड बून और ज्योफ मार्श की जोड़ी को भूल जाने को विवश कर दिया|

सचिन तेंदुलकर ने पहली बार दुनिया के सभी देशों के अग्रणी गेंदबाजों के सामने जिस अंदाज में पारी की शुरूआत की उसने देश में वर्षों से पल रही उस कुंठा को मिटा दिया जिसने लोगों के जेहन में घर बना लिया था कि भारतीय क्रिकेट टीम एकदिवसीय मैच में पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड , इंग्लैण्ड के गेंदबाजों की धुनाई नहीं कर सकती पर सचिन तेंदुलकर ने शुरू के पंद्रह ओवरों में किसी देश के किसी गेंदबाज को नहीं छोड़ा |

साथ ही इस दौर में वे एक उपयोगी गेंदबाज भी रहे जो एक बार फिर भारत के बदलते स्वभाव का संकेत था कि अब बदलते समय में प्रतियोगिता में बने रहने  के लिए आपका एक विषय में विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं है बल्कि परिणाम देने के लिए आप कितने उपयोगी हैं इसका महत्व हैं और यही कारण रहा कि बाद में राहुल द्रविड ने विकेटकीपिंग की  और सचिन व सौरव बहुत वर्षों तक मिलकर एक गेंदबाज के कोटे का 10 ओवर फेंकते थे ताकि टीम में अधिक लचीलापन रहे और मैच के हिसाब से अधिक बल्लेबाज या गेंदबाज टीम में रह सकें |

सचिन तेंदुलकर की असीम लोकप्रियता का कारण रहा है लोगों का  उनमें अपनी कुंठाओं को शांत होते देखने का संतोष , विवेकपूर्ण आक्रामकता और क्रोध में अंतर कर पाने का उनका स्वभाव, मैदान पर निर्मम तरीके से बल्लेबाजी करने के बाद भी व्यक्तित्व में झलकने वाली उनकी सौम्यता जिसके चलते उन्होंने भारतीय खिलाडियों और भारत के प्रति विदेशी लोगों के नजरिये में एक आमूलचूल बदलाव ला दिया था |

सचिन तेंदुलकर ने अपने खेल और व्यक्तित्व दोनों से दो दशक से भी अधिक समय तक देश के लोगों का मन मोहा और भारतीय  क्रिकेट के इतिहास में वे एक अतुलनीय खिलाड़ी हैं|