स्वराज की उथल पुथल और डा० अम्बेडकर

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स्वराज की उथल पुथल और डा० अम्बेडकर की भूमिका– 1935 में डा० अम्बेडकर ने अपने अछूत समुदाय के साथ हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा की और इसके बाद करीब एक वर्ष तक देश , विदेश में इस विषय पर काफी चर्चाएँ होती रहीं और इस दौरान डा० अम्बेडकर ने भीं अनेक विकल्पों पर विचार किया परन्तु धीरे धीरे उन्होंने अपना अधिक ध्यान अपने समुदाय को राजनीतिक अधिकार दिलाने और राजनीतिक शक्ति खड़ी करने पर कन्द्रित कर दिया|

गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट , 1935 के अंतर्गत प्रांतीय स्वायत्तता के उद्घाटन का समय निकट आ रहा था और इस व्यवस्था के अनुरूप 1937 में होने वाले चुनावों को लेकर उत्सुकता बढ़ रही थी और सभी राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों में लगे थे और इस नयी परिस्थिति में अपने लिए नयी भूमिका तलाशते हुए डा० अम्बेडकर ने अपने सहयोगियों के साथ विचार विमर्श के बाद अगस्त 1936 में Independent Labour Party नामक राजनीतिक दल की स्थापना की और उन्होंने भूमिहीनों , दूसरों की जमीन पर किराए पर  खेती करने वालों , किसानों और कामगारों के लिए अपने व्यापक घोषणा पत्र को लोगों के सामने रखा |

डा० अम्बेडकर के राजनीतिक दल ने कृषि से जुड़े लोगों की गरीबी का कारण जोत की भूमि का बिखरा होना और उनपर जनसंख्या के भार को मानते हुए औद्योगीकरण की गति को तेज करते हुए पुराने उद्योगों का पुनर्वास और नए उद्योगों की स्थापना को अपना लक्ष्य बनाया | तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना  और आवश्यकता अनुसार उद्योगों को राज्य के नियंत्रण और प्रबंधन में लेना | किराए पर खेती करने वालों के अधिकारों की रक्षा करना |

कामगारों के लिए घोषणापत्र में आवश्वासन दिया गया कि फैक्ट्रियों में कामगारों की नियुक्ति, छंटनी और प्रोमोशन के साथ उनके काम करने के अधिकतम घन्टों के साथ उनके वेतन , उनके कार्य करने के अनुकूल सुविधा  लिए कानून बनाया जाएगा और रोजगार के लिए भूमि बंदोबस्त और सार्वजनिक कार्य की योजना लागू की जायेगी |

सामाजिक सुधार की दिशा को गति प्रदान करने के लिए रूढ़िवादिता के लिए दंड की व्यवस्था की जायेगी और दान कोष के अतिरिक्त धन से शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा | गांवों में सफाई और इसका स्वरूप आधुनिक करने के प्रयास होंगे और इन गांवों में पुस्तकालय और रोटरी सिनेमा हाल खोले जायेंगे |

तत्कालीन समाचार पत्रों ने इस राजनीतिक दल के कार्यक्रमों की प्रशंसा की और इसे कम्युनिज्म के प्रभाव को कम करते हुए एक समाजवादी व्यवस्था के निर्माण की दिशा में कदम बताया |

आगामी चुनावों की तैयारियों के मध्य डा० अम्बेडकर  नवम्बर 1936 में जेनेवा के लिए रवाना हुए और इस यात्रा का कारण स्वास्थ्य संबंधी  बताया गया परन्तु ऐसे कयास लगाए गए कि अम्बेडकर ब्रिटिश सरकार को इस बात पर राजी करना चाहते थे कि क्या उनके और उनके समुदाय के सिख धर्म में शामिल होने के बाद भी अछूत वर्ग को संविधान में दी जाने वाली सुविधाएं जारी रहेंगी और इसी यात्रा के दौरान जब उन्होंने वियना और बर्लिन में अपना अधिक समय व्यतीत किया परन्तु एक सप्ताह के लिए लन्दन भी रुके तो उनके लंदन में रुकने के दौरान ही एक मराठी दैनिक विविधा वृत्त ने समाचार प्रकाशित किया कि डा० अम्बेडकर ने एक अंग्रेज महिला से विवाह कर लिया है उसे साथ लेकर भारत आ रहे हैं| इस समाचार के इर्द गिर्द डा० अम्बेडकर और उस कथित अंग्रेज महिला के प्रेम प्रसंग  की चर्चा भारत के समाचार पत्रों में खूब हो रही थी परन्तु जब वे 14 जनवरी 1937 को बम्बई लौटे तो अकेले आये और इन ख़बरों को अफवाह बताया , जबकि दूसरी ओर उनके स्वागत के लिए अछूत समुदाय के लोग बाबासाहेब से साथ उनकी यूरोपियन पत्नी को देखने के लिए हजारों की संख्या में एकत्र हुए थे ( धनञ्जय कीर , Dr Babasaheb Ambedkar , Page288-289)

डा० अम्बेडकर जिन्होंने All India Conferences of Depressed Class  की अध्यक्षता की थी उन्होंने आगामी चुनावों में अखिल भारतीय स्तर पर चुनाव लड़ने के स्थान पर स्वयं को और  अपनी नव निर्मित Independent Labour Party को केवल बम्बई प्रांत तक सीमित रखा और कुल 175 प्रांतीय सीटों में से 15 सीटें आरक्षित थीं और डा० अम्बेडकर ने अपनी पार्टी की ओर से या अपने समर्थन से कुल 17 प्रत्याशी उतारे और नए संविधान के अंतर्गत जब 17 फरवरी 1937 को पहले चुनाव संपन्न हुए तो ये चुनाव डा० अम्बेडकर के लिए भारी सफलता लेकर आये और उनके 17 प्रत्याशियों में 15 को विजय प्राप्त हुई और इसके साथ ही भारत में नए संविधान की भूमिका के साथ राजनीतिक आधार पर स्वराज की भूमिका भी निर्धारित होने लगी और डा० अम्बेडकर ने पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों पर ध्यान केन्द्रित कर दिया और कांग्रेस के साथ उनकी दूरियां और राजनीतिक मतभेद और बढ़ने लगे , क्योंकि अब डा० अम्बेडकर अछूतों के नेता के दायरे से बाहर आकर नए राजनीतिक विषयों पर अपने विचार रखते हुए कांग्रेस और कम्युनिज्म के मध्य एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में स्वयं को अनेक राजनीतिक और सामाजिक विषयों के साथ प्रस्तुत करने लगे |

डा० अम्बेडकर ने विधानसभा में चर्चा और अनेक कानूनों के प्रस्ताव के साथ अपने समुदाय के मध्य जागरूकता का नया दौर आरम्भ किया और उनका विमर्श अब पूरी तरह धार्मिक और सामाजिक से बदलकर राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने पर आ गया और इस प्रक्रिया में डा० अम्बेडकर ने अछूत वर्ग के कामगारों और मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए कम्युनिज्म की व्यवस्था और विचार को विकल्प के रूप  में स्वीकार करने से रोकने के लिए अछूतों के लिए अपने सामाजिक विमर्श को नया वैचारिक आयाम देना आरंभ किया और अछूतों की सामाजिक समस्या के समाधान के साथ ही उनकी आर्थिक समस्याओं के समाधान को भी जोड़ना आरम्भ किया इसी क्रम में  अछूत रेलवे कर्मचारियों के विशाल सम्मेलन में 12, 13 फरवरी 1938 को मनमाड में डा० अम्बेडकर ने कहा, “ देश में कामगार वर्ग के दो शत्रु हैं, पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद| उन्होंने कहा ब्राहमणवाद से मेरा अर्थ ब्राहमण समुदाय से नहीं है बल्कि ब्राह्मणवाद से अर्थ स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व के विचार से दूर रखना है और इसका प्रभाव केवल सामाजिक अधिकारों तक सीमित नहीं है बल्कि आर्थिक क्षेत्र पर भी इसका प्रभाव होता है” ( धनञ्जय कीर , Dr Babasaheb Ambedkar, Page 303.304)

डा० अम्बेडकर के मजदूर नेता के इस स्वरुप के कुछ पहलुओं को वर्तमान संदर्भ में समझना आवश्यक है क्योंकि आम तौर पर देश में कम्युनिष्ट विचारक और इसी वर्ग के  बौद्धिक समाज के लोग डा० अम्बेडकर को कम्युनिज्म के वर्ग संघर्ष के विचार के साथ जोड़कर उन्हें कम्युनिष्ट दर्शन के निकट सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और आम तौर पर ऐसे उद्धरणों को अपने समर्थन में प्रयोग करते हैं, परन्तु यह समझ लेना अत्यंत आवश्यक है कि डा० अम्बेडकर का अपने राजनीतिक दल का नाम लेबर पार्टी रखना और कम्युनिष्ट प्रयास से अलग अपने अछूत वर्ग के कामगारों को अलग से संगठित करना तत्कालीन कम्युनिष्ट नेताओं को पसंद नहीं आता था , पंरतु इसकी परवाह किये बिना डा० अम्बेडकर स्वयं को एक मजदूर नेता के रूप में विकसित करते रहे क्योंकि उन्हें कम्युनिज्म की विचारधारा में एक अराजक और तानाशाही व्यवस्था नजर आती थी |

डा० अम्बेडकर और कम्युनिष्टों के आपसी सहयोग का केवल एक उदाहरण मिलता है जब बम्बई विधानसभा ने 1938 में  औद्योगिक विवाद अधिनियम का प्रस्ताव किया और इसके विरोध में मजदूर संगठनों ने बड़ी हड़ताल की और कुल साठ विभिन्न मजदूर संगठनों ने इसमें भाग लिया और इस अवसर का लाभ उठाते हुए अम्बेडकर ने अपने संगठन को विस्तार दिया और स्वयं को और अपने संगठन को मजदूरों के हितैषी के रूप में स्थापित किया और इस हड़ताल में उन्होंने कम्युनिष्ट संगठनों के साथ संयुक्त समिति बनाई  |

इसी दौरान डा० अम्बेडकर अनेक स्वरूपों के साथ लोगों के समक्ष आ रहे थे और बम्बई से बाहर के प्रान्तों के अछूत संगठन उन्हें अपना नेता स्वीकार कर उनके मार्गदर्शन के लिए बुलाते थे और इसी क्रम में दिसम्बर ,1938 में हैदराबाद राज्य में  औरंगाबाद जिले के अछूत वर्ग के सम्मेलन में उनके सामने अछूतों को प्रताड़ित करते हुए इस्लाम धर्म में शामिल होने का दबाव डालने का विषय सामने आया जब इस क्षेत्र के  ब्राहमणों ने भी मुस्लिम सहयोग से उन्हें जलाशयों से जल लेने और मंदिर में प्रवेश से वंचित किया ( धनञ्जय कीर , DR Babasheb Ambedkar, Page, 317)

इन वर्षों में डा० अम्बेडकर अपने अछूत समुदाय के लिए नयी संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपूर्ण भूमिका के लिए राजनीतिक संघर्ष और राजनीतिक जागरूकता में लगे थे परन्तु ऐसा नहीं था कि उनकी दृष्टि केवल इसी विषय तक सीमित थी और देश में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम में उनकी भूमिका नहीं थी , जिस प्रकार भारत में स्वराज को लेकर हर स्तर से ब्रिटिश पर दबाव बनाया जा रहा था उसी अनुपात में ब्रिटिश सरकार भी अनेक नए प्रस्ताव के माध्यम से भारत को संविधान और स्वशासन का दिखावा करते हुए ऐसी व्यवस्था लादना चाहती थी ताकि भारत उसकी ही पकड़ में रहे और आपसी संघर्ष इसकी नीयति बन जाए और इसी क्रम में भारत को एक महासंघ का स्वरुप देने  का एक प्रस्ताव 1939 में  ब्रिटेन की ओर से आया और इसे असली स्वरुप देने का प्रयास भी हो रहा था परन्तु इस प्रस्ताव से केंद्र को कमजोर करने की योजना थी क्योंकि केंद्र और राज्य के समान  नागरिकता की व्यवस्था नहीं थी और राज्य  के नागरिक राज्य का विषय थे और महासंघ के  सरकार के दायरे से बाहर थे और इसी प्रकार राज्य सरकारों को लोकतांत्रिक हुए बिना भी संघीय ढांचे का हिस्सा बनने की स्वतंत्रता थी , इस प्रस्ताव का तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस ने विरोध किया, मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने अपने कारणों से इसका विरोध किया और डा० अम्बेडकर ने भी इसे कमजोर केंद्र की व्यवस्था के चलते इसका विरोध किया |

1939 का वर्ष भारतीय राजनीति में उथल पुथल का दौर लेकर आया जब त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त होने से गांधी को काफी धक्का लगा और इसके साथ ही भारतीय राजनीति के साथ वैश्विक राजनीति में वह दौर प्रतीक्षा कर रहा था जिसने भारतीय राजनीति में गांधी की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाना आरम्भ आरम्भ कर दिया था और यह दौर था द्वितीय विश्व युद्ध का आरम्भ | पोलैण्ड की सुरक्षा के विषय पर यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ हो गया और भारत की राजनीति का वातावरण और उसकी प्राथमिकताएं तेजी से बदलने लगीं |

देश के नेताओं ने अपने अनुसार अपनी भूमिकाएं तैयार करनी आरम्भ कीं और ब्रिटिश वायसराय ने प्रस्तावित महासंघ के  प्रस्ताव को निलम्बित कर दिया और यह वह दौर था जब डा० अम्बेडकर ने बिना किसी शर्त के इस  युद्ध में ब्रिटिश सहयोग का अपना पक्ष रखा और कांग्रेस ने भी ब्रिटेन के सहयोगी देशों के समर्थन की घोषणा की परन्तु एक शर्त भी  रखी कि युद्ध के उद्देश्य और विशेषकर लोकतंत्र और साम्राज्यवाद को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया जाए और वह  भी भारत के सन्दर्भ में |

ब्रिटश वायसराय के समक्ष भारत का समर्थन लेना एक चुनौती थी और वायसराय लिनलिथगो ने उसी वर्ष अक्टूबर में भारत में विभिन्न दलों और समूहों के पचास  अधिक नेताओं से अलग अलग बात की और इसमें गांधी, नेहरू, सुभाष बोस, सावरकर, राजेन्द्र प्रसाद , सरदार पटेल, जिन्ना और अम्बेडकर शामिल थे और इन सभी में डा० अम्बेडकर ने अछूतों की नयी संवैधानिक  व्यवस्था में स्थिति का विषय उठाया और ब्रिटिश वायसराय ने ब्रिटिश सरकार की ओर से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए आश्वासन दिया कि युद्ध के बाद  गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट में देश की अग्रणी पार्टियों के साथ सलाह मशविरे से आवश्यक सुधार किया जाएगा और इसमें अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना कोई गंभीर राजनीतिक प्रगति नहीं होगी |

वायसराय के इस आवश्वासन के बाद कांग्रेस ने सभी पक्षों को अपने साथ लाने का प्रयास किया और इसी क्रम में कांग्रेस की युद्ध समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने बम्बई में अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में डा० अम्बेडकर से भेंट की और दोनों के मध्य अगले तीन चार दिनों तक चर्चा होती रही और यह चर्चा  बंबई कांग्रेस के अध्यक्ष भूलाभाई देसाई और गांधी के सचिव महादेव देसाई की उपस्थिति में हुई और  इस चर्चा को कांग्रेस तक सीमित रखा गया | ( धनञ्जय कीर  Dr Babasaheb Ambedkar , Page 327-378)

इस बैठक के बाद कांग्रेस ने सभी प्रान्तों में अपनी सरकारों के   त्यागपत्र से पूर्व एक प्रस्ताव रखते हुए बिना भारत में सरकारों की सहमति के भारत को ब्रिटेन और जर्मनी के मध्य युद्ध का हिस्सा बना लिये जाने की निंदा की और इसे प्रांतीय सरकारों के अधिकारों की अवमानना बताते हुए कांग्रेस ने अपनी सरकारों के त्यागपत्र दे दिए और बम्बई की प्रांतीय विधानसभा में इस प्रस्ताव पर संशोधन लाकर डा० अम्बेडकर ने एक बार फिर अपनी दुविधाजनक स्थिति का स्पष्टीकरण दिया और अपने लम्बे भाषण में उन्होंने राष्ट्र और अपने अछूत वर्ग के प्रति अपनी दोहरी निष्ठा का संकल्प व्यक्त किया परन्तु दोनों में अछूतों के प्रति अपनी निष्ठा को अपनी प्राथमिकता घोषित करते हुए आने वाले वर्षों में ब्रिटिश सरकार के साथ अपनी निकटता का संकेत भी कर दिया |