हिंदुत्व का विरोधाभास

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हिंदुत्व का विरोधाभास

देश की राजनीति और समाज में पिछले करीब तीन दशक से राजनीतिक और सामाजिक आन्दोलनों का संक्रमण काल चल रहा है और इस दौर में तीन सामाजिक व राजनीतिक आन्दोलन परस्पर प्रतिस्पर्धी स्वरुप में समानांतर चलते आये हैं  और ये तीन आन्दोलन हैं, अयोध्या में राम के जन्मस्थान पर मंदिर बनाने के संकल्प के साथ आरम्भ हुआ हिंदुत्व आन्दोलन जो भारत को उसके मूल स्वरुप से जोड़कर अतीत को वर्तमान में जीवित करने का स्वप्न देख रहा है, दूसरा आन्दोलन दलित आन्दोलन है जो भारत के दक्षिण के राज्यों में आरम्भ हुई   द्रविड़ चेतना और महाराष्ट्र में डा भीमराव आम्बेडकर द्वारा आरम्भ किये गए नवबौद्ध आन्दोलन की विरासत को आगे ले जाकर उसमें नए संशोधनों के साथ दलितों   की सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को और अधिक बेहतर करना चाहता  है| इसी के साथ करीब तीन दशक पहले आरम्भ हुए पिछड़ा वर्ग के सामाजिक और राजनीतिक उभार के लिए आरम्भ हुआ आन्दोलन भी तीसरा आन्दोलन है जिसने हिंदुत्व के साथ मिलकर बीते तीन दशकों में देश में सामाजिक और राजनीतिक संक्रमण के साथ अनेक पहलुओं पर नए सिरे  से विचार को विवश कर दिया है|

हिंदुत्व आन्दोलन का आरम्भ वैसे तो देश की राजनीति में 1970 और 1980  के दशक में भारत के  विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी आन्दोलनों ( पंजाब और उत्तर पूर्व सहित देश के अनेक हिस्सों में खाड़ी के देशों से आने वाले पेट्रो डालर से मुस्लिम जनसंख्या में वहाबी कट्टरपंथी विचारधारा के प्रवेश के संस्थागत आरम्भ ने भी अलगवावाद की चुनौती उत्पन्न कर दी थी) की प्रष्ठभूमि में देश में एकता के सूत्र की शून्यता को भरने के लिए हिंदुत्व को एक भावनात्मक सूत्र के रूप में लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया |

हिंदुत्व आन्दोलन के समानांतर दलित और पिछड़ा वर्ग आन्दोलन क्यों आरम्भ हुआ इसके भी सामाजिक  और राजनीतिक कारण हैं| देश की स्वाधीनता के बाद से 1977 में  और उसके बाद  कुछ वर्षों को छोड़कर देश की राजनीति पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ही शासन रहा और इस राजनीतिक एकाधिकार का परिणाम रहा कि आधुनिकता के सम्पर्क में आकर   सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाली देश की जनता के प्रति कांग्रेस का रुख उदासीन ही रहा और उसने दलित , पिछड़ा , सवर्ण और मुस्लिम वर्ग को अपने साथ रखते हुए भी अति महत्वपूर्ण पदों पर दलित और पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं दिया और आम तौर पर सवर्ण हिन्दुओं की  पार्टी ही  बनी रही और न केवल ऐसा किया बल्कि अनेक राज्यों में दलित और पिछड़ी वर्ग की आकांक्षा के विपरीत उन पर आलाकमान की इच्छा थोपी जाती रही और जनता की आकांक्षा के विपरीत राजनीतिक तिकड़म से दलित और पिछड़ा राजनीति को हतोत्साहित किया जाता रहा,  इसके परिणामस्वरूप दलित और पिछड़ा वर्ग एक सामाजिक  आन्दोलन से राजनीतिक आन्दोलन की ओर बढे | इसी समय के आस पास  1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम इलाके में बड़ी संख्या में लोगों के इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो जाने और ऐसी घटनाओं के बढ़ने व इनमें खाड़ी से आने वाले पेट्रो डालर ( पेट्रोल आदि के मिलने वाली रकम) की भूमिका की संभावना ने हिंदुत्व आन्दोलन के लिए भूमिका आरम्भ की |

हिंदुत्व आन्दोलन के पडाव – हिंदुत्व आन्दोलन की चर्चा करते हुए दलित और पिछड़े आन्दोलन की भूमिका देने के पीछे जो कारण है वह लेख के अगले भाग में स्पष्ट होगा |

हिंदुत्व आन्दोलन करीबी तीन दशक में अब तक तीन पड़ावों को पार कर चुका है| परन्तु इसे समझने के लिए इतिहास के कुछ पुराने अध्यायों को भी खंगालना होगा|  यह आन्दोलन  1980 के दशक में उत्तर प्रदेश में अयोध्या और गोरखपुर से  आरम्भ हुआ था जब अयोध्या में राम के जन्मस्थान को मुक्त कराते हुए उस पर एक मंदिर बनाने के संकल्प के साथ गोरक्षपीठ के महंत अवैद्यनाथ ने “ धर्मस्थान मुक्ति यज्ञ समिति ” के नाम से यह आन्दोलन आरम्भ किया था | परन्तु  गोरखपुर और अयोध्या  देश की स्वतंत्रता से पहले से  ही हिन्दू धर्म   केंद्र था और अयोध्या में तो   राम जन्मभूमि पर हिन्दुओं के दावे का आरंभ लगभग उसी समय हुआ था जब देश की राजनीति में 1885 के आस पास  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी और इसी समय पहली बार अयोध्या में इस विषय पर मुकदमों का आरम्भ होने लगा था और देश में  कांग्रेस की राजनीति के सामानांतर  रामजन्मभूमि का मुद्दा भी अयोध्या में अपने स्तर पर स्थानीय रूप से  चलता रहा |

1980 के दशक में हिंदुत्व का आन्दोलन भले ही रामजन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण के संकल्प के साथ आरम्भ हुआ था पर जैसे जैसे यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया और समाज इससे जुड़ता गया देश में हिंदुत्व के नए नाम से भारत की परम्परावादी सोच को देश की राजनीति पर स्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखने वाली समस्त शक्तियां एक साथ आती रहीं |

देश में परम्परावादी सोच और हिंदुत्व आधारित राजनीति के आन्दोलन की इस विकासयात्रा को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक देश में उन तीन केन्द्रों को नहीं समझेंगे जो हिंदुत्व आधारित राजनीति की इच्छा रखते हैं| एक महाराष्ट्र में शिवाजी के समय से चले आ रहे पेशवाओं की विरासत के आधार पर चितपावन ब्राहमणों की सोच जो यह मानकर चलते हैं कि मुगलों के साम्राज्य के पतन के बाद भारत पर शासन के वास्तविक अधिकारी वही थे और अंग्रेजों ने उन्हें इस अधिकार से वंचित किया | लोकमान्य तिलक के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस धारा को मजबूती से पकड़ कर  रखा है और उनकी विचारधारा पूरी तरह प्राचीन संदर्भ में ही   भारत को खड़ा करने की है | पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में    अपनी गहरी  जड़ें जमाये बैठा आर्य समाज दूसरा वह संगठन है जो हिंदुत्व के आन्दोलन की सफलता में अपने संस्थापक दयानंद सरस्वती के वैदिक भारत के संकल्प को पूरा होते हुए देखता है|

हिंदुत्व के आन्दोलन को गति कुछ और क्षेत्रों से भी मिली जिनमें गुजरात है जहां कि वैष्णव मार्गी भक्ति धारा का लम्बा इतिहास रहा है और इस धारा ने भी हिंदुत्व के साथ स्वयं को जुड़ता हुआ पाया |

हिंदुत्व का आन्दोलन भले ही 1980 के दशक में आरम्भ हुआ हो परन्तु देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी हिन्दू धर्म की भावना थी और सहयोग था  और इसके पीछे आर्य समाज की बड़ी सांगठनिक  भूमिका थी |

1980 के दशक में आरम्भ हुए हिंदुत्व के आन्दोलन ने करीब तीन दशकों में सफलतापूर्वक उन सभी हिन्दू धर्मवादी शक्तियों को साथ लाने में सफलता प्राप्त की है जो वहाबी कट्टरता के प्रसार और प्रचार से  देश के मुस्लिम वर्ग की सोच में आ रहे बदलाव को धर्म और देश दोनों के लिए ख़तरा मानते हैं, देश में अंग्रेजों के समय से ही ईसाई मिशनरियों के कार्य में धर्मांतरण के पक्ष को लेकर एक शंका रही है और हिंदुत्व आन्दोलन के साथ वे सभी लोग एक साथ आ जाते हैं जो इसे अब भी एक ख़तरा मानते हैं|

इसके साथ ही आधुनिकता के नाम पर अंग्रेजों के द्वारा स्थापित की गयी व्यवस्था को भारत की मूल व्यवस्था के रूप में स्थापित करते हुए  और भारत की शिक्षा व्यवस्था , संस्कार और उसकी प्राचीन धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान से यत्नपूर्वक उसे काटने का प्रयास भी सभी हिन्दू धार्मिक शक्तियों को एक साथ लाने का काम करता है और देश की राजनीति इस यथा स्थिति में बदलाव का प्रयास करने के स्थान पर आधुनिकता के नाम पर इसी व्यवस्था की पोषक और प्रवक्ता हो जाती है तो हिन्दू धर्मवादी शक्तियां राजनीतिक तौर पर एक हो जाती हैं|

ये सभी मुद्दे आम तौर पर देश में सभी हिन्दुओं को आकर्षित करते हैं और सभी हिन्दूधर्मवादी शक्तियां एक साथ राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए एक हिंदूवादी राजनीतिक चेहरे के साथ जुडती रही हैं और सामान्य हिन्दुओं का सहयोग भी इन शक्तियों को मिल जाता है|

परन्तु हिंदुत्व के पूरे आन्दोलन के तीन पडाव रहे हैं| पहला पडाव , 1989 से 1992 का रहा जब हिन्दुत्ववादी शक्तियां अपने आन्दोलन के सकारात्मक पक्ष को सहेज नहीं पाईं और 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या बाबरी मस्जिद कारसेवकों द्वारा ढहा दी गयी जिसके चलते अयोध्या में राम के जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण का सकारात्मक हिन्दू मुद्दा प्रतिक्रियावादी मुस्लिम विरोध में बदल गया और देश में  हिंदुत्व के मुद्दे ने एक प्रतिस्पर्धी साम्प्रदायिक कट्टरता का स्वरुप ग्रहण कर लिया और हिंदुत्व के आक्रामक पक्ष को देखकर हिन्दू धर्म के अंतर्गत अनेक दलित और पिछड़ी जातियां हिन्दू धर्म को सुधारवादी धारा से   हटकर अधिक जटिल और कट्टरपंथी   धारा की ओर  जाते देखकर सशंकित हो गयीं और उन्होंने देश की स्वतंत्रता के बाद देश के संविधान और हिन्दू धर्म की परिधि में रहकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के अभियान को सामाजिक से अधिक राजनीतिक आधार पर आरम्भ कर दिया और देश में  दलित और पिछड़ा राजनीति एक साथ आ गयी |

हिंदुत्व आन्दोलन का दूसरा पडाव 2001 से 2002  का था जब गुजरात के गोधरा में अयोध्या से वापस जा रहे रामसेवकों को साबरमती ट्रेन में जीवित जला देने के बाद हुई प्रतिक्रिया में भीषण साम्प्रदायिक दंगों में एक विशेष प्रकार की राजनीति और हिंदुत्व के नेता पैदा हुए |

इस घटना के बाद गुजरात में हिंदुत्व की राजनीति की प्रयोगशाला भले ही बनी पर दो वर्ष के  भीतर ही समस्त देश में हिंदुत्व के आक्रामक स्वरुप ने लोगों को भयभीत कर दिया और एक बार फिर दलित और पिछड़ा आन्दोलन स्वयं को भयभीत अनुभव करने लगा और उसे प्रतीत हुआ कि जिस संविधान के अंतर्गत उसे डा भीमराव आम्बेडकर सहित अन्य लोगों के प्रयासों से अधिकार प्राप्त हुए हैं और हजारों वर्षों के प्रयास से हिन्दू धर्म के अंतर्गत ही उसे न्याय मिला है उस पर एक आक्रामक ख़तरा उत्पन्न हो गया है|

हिंदुत्व के आन्दोलन का अत्यंत निर्णायक पडाव  2014 में आया जो अभी तक जारी है पर ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदुत्व के समक्ष वही दुविधा पुनः सामने आ गयी है जब उसका आक्रामक पक्ष सामने है और दलित व पिछड़ा स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहा है|

हिंदुत्व और दलित व पिछड़ा – हिंदुत्व के साथ दलित और पिछड़े वर्ग के लोग साथ नहीं आते ऐसा नहीं है परन्तु हिंदुत्व का विरोधाभास उन्हें उनके साथ जोड़ता और फिर  उनसे अलग करता है|

जैसा कि आरम्भ में ही बताया गया है कि हिन्दू धर्म की पहचान, उसके समक्ष उत्पन्न खतरे जैसे जनसंख्या असंतुलन का खतरा,  भारत की भौगोलिक एकता को बनाए रखने का प्रयास, खाड़ी देशों के सहयोग से भारत के मुस्लिम वर्ग को अधिक कट्टरपंथी इस्लाम की ओर सुनियोजित रूप से ले जाने के संस्थागत प्रयास से उत्पन्न असुरक्षा की भावना,  आधुनिकता के नाम पर देश में पश्चिमीकरण को थोपने का प्रयास और भारतीयता की पहचान को कमजोर कर अभारतीयता को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को एक चुनौती के रूप में देश के अधिकांश लोग लेते हैं |

इसी चेतना को अधिकतर रूप से हिंदुत्व आन्दोलन अपने साथ जोड़कर आगे चलता है और इन मुद्दों पर अधिक मुखर होकर अपनी स्थिति स्पष्ट करता है जिसके चलते अधिकाँश लोग इसके साथ जुड़ जाते हैं परन्तु हिंदुत्व आन्दोलन का विरोधाभास यही है कि अपनी चरम शक्तिशाली स्थिति में आने के बाद इन मुद्दों के जुड़े किसी भी विषय पर कोई ठोस प्रयास नहीं होता और इसके  ठीक विपरीत हिन्दू धर्म की सुधारवादी धारा पूरी तरह कमजोर होने लगती है और उसे हतोत्साहित किया जाता है|

देश की स्वतंत्रता से पूर्व पुनर्जागरण काल में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के लिए हिन्दू धर्म को छोड़कर इस धर्म के दायरे से बाहर जाना ही हिन्दू धर्म के संस्थागत स्वरुप से मुक्ति का एकमात्र विकल्प माना जाता था , इसी कारण दलितों और आदिवासियों का दूसरे धर्मों में धर्मांतरण अधिक होता था , परन्तु एक बार देश जब स्वतंत्र हो गया और उसे अपना संविधान मिल गया और उसके निर्माण में दलित आन्दोलन के मसीहा डा भीमराव आम्बेडकर के सुझावों को महत्व देकर उसी आधार पर नए भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ तो देश  में दलित, पिछड़े और आदिवासी संविधान के दायरे में अपने लिए न्याय की सम्भावना देखने लगे और जब देश के विभिन्न हिस्सों में देश की स्वतंत्रता के बाद दलित, पिछड़ा और आदिवासी चेतना के लिए नए आन्दोलन चले तो उसमें देश में संवैधानिक दायरे में , हिन्दू धर्म की परिधि  में ही सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन से अपने लिए अधिकार प्राप्त करने का दौर आरम्भ हुआ | पंजाब और उत्तर प्रदेश में स्वर्गीय कांशीराम इस सोच के अग्रणी नेता रहे जिन्होंने हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था का तिरस्कार कर हिन्दू धर्म का त्याग करने के स्थान पर हिन्दू धर्म में जाति को  एक राजनीतिक पूंजी बनाकर उस आधार पर सामाजिक परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म की अन्य जातियों को अपनी सोच बदलने पर विवश किया | उन्होंने दलितों और पिछड़ों को एक नया रास्ता दिखाया किअपनी संख्या के आधार पर राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से सामाजिक परिवर्तन भी होगा क्योंकि हिन्दू धर्म की तथाकथित अगड़ी जातियां सत्ता में अपनी भागीदारी के लिए दलितों और पिछड़ों से समझौता करने को विवश होंगी | हिंदुत्व के अधिक आक्रामक स्वरुप में सामने आने पर दलितों और पिछड़ों को स्वतंत्रता उपरांत आरम्भ उनके आन्दोलन के इस नए स्वरुप में उनकी स्थिति असुरक्षित दिखने लगती है और वे हिंदुत्व की सुधारवादी धारा के साथ स्वयं को राजनीतिक रूप से मजबूत करने के अपने उद्देश्य में फिर से लग जाते हैं |

भारत में दलित और पिछड़े समाज के लोग अहिंदू नहीं हैं वे केवल हिन्दू धर्म के ब्राहमणवाद में शुद्धता और कर्मकांड के आग्रह के कारण उन सुधारवादियों के अधिक निकट स्वयं को अनुभव करते हैं जो हिन्दू धर्म की औपनिषदिक दर्शन की धारा को साथ लेकर शुद्धता और कर्मकांड से परे एक सहज और दैनिक व्यावहारिक  जीवन के अनुरूप दार्शनिक आध्यात्मिक विकल्प प्रदान करते हैं|

 

इसी प्रकार कबीरपंथी, राधास्वामी, पंजाब में डेरे , शिर्डी के सांईबाबा सहित देश के विभिन्न भागों में भक्ति और धर्म का यदि सामाजिक और आर्थिक अध्ययन किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि देश में स्वतंत्रता के पूर्व बंगाल सहित देश के विभिन्न भागों में हिन्दू पुनर्जागरण का जो दौर चला था और जिसने भारत के मध्य काल के भक्ति आन्दोलन के सुधारवाद को और आगे ही बढाया था उसने देश में दलित , पिछड़े, आदिवासी लोगों को हिन्दू धर्म को इसके नए स्वरुप के साथ इसका भागीदार बनाया है  जबकि इसके विपरीत आधुनिक काल में जैन , मारवाड़ी और व्यवसायी  वर्ग ( अधिकतर कारपोरेट) एक प्रकार से नव ब्राहमणवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और हिंदुत्व आन्दोलन के केंद्र में स्थित लोग अपने आन्दोलन की आर्थिक जरूरतों और फिर राजनीति में आर्थिक आवश्यकताओं के लिए इसी व्यापारी वर्ग पर निर्भर हैं और हिंदुत्व को पूरी तरह नव ब्राहमणवाद का स्वरूप दे रहे हैं जिसमें उन्हीं प्रतीकों, कर्मकांडों और पूर्वाग्रहों को प्राथमिकता दी जा रही है जो दलित, पिछड़े और आदिवासी को हिंदुत्व से दूर अपने वैकल्पिक आन्दोलन की ओर भेजते हैं|

जैन धर्म के प्रभाव में शाकाहार को हिन्दू धर्म की प्रमुख पहचान बताने का आग्रह, राज्य के प्रयास से शाकाहार को प्रोत्साहित करना, गो ह्त्या को राजनीतिक विषय बनाकर उसके सामाजिक और आर्थिक पहलू की  उपेक्षा कर राज्य के प्रयास से इस विषय को दूसरों पर थोपना, धर्म के प्रदर्शन के लिए बड़े बड़े गणेश और दुर्गा पंडालों का निर्माण , नवरात्र जैसे कार्यक्रमों में कर्मकांड को मीडिया के माध्यम से महिमामंडित करना , धर्म को पूरी तरह महंगा दिखाकर उसके आध्यात्मिक पक्ष से लोगों को   वंचित कर देना दलित , पिछड़े और आदिवासी लोगों के समक्ष  ऐसे आक्रामक हिन्दू धर्म का स्वरूप प्रस्तुत करता है जिसके साथ वे स्वयं को जोड़कर नहीं देख पाते और    इसी के साथ देश की भौगोलिक एकता को बनाए रखने के नाम पर दलित आन्दोलन को अलगाववादी बताकर    और भ्रष्टाचार के संदर्भ को राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रयोग करना  ऐसे कारण हैं जो दलित , पिछड़ा और आदिवासी को असुरक्षित अनुभव कराते हैं और वे वर्षों के संघर्ष के बाद संविधान और हिन्दू धर्म के दायरे में अपने लिए न्याय की सम्भावना को समाप्त होते देखते हैं और इसके लिए उन्हें हिंदुत्व की आक्रामकता  और उसकी नयी परिभाषा , संदर्भ और प्राथमिकता ही  उत्तरदायी नजर आती है|

( लेखक की नवीनतम पुस्तक “ अभिव्यक्ति” के कुछ अंश)