जी एस टी पर विपक्ष का नया दाँव

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आगामी 30 जून की आधी रात को देश की आजादी की तर्ज पर संसद के  एक विशेष अधिवेशन में नयी कर प्रणाली जी एस टी को लागू करने की घोषणा कर इसे अपनी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि बताने की सरकार की रणनीति पर विपक्ष ने पानी फेर दिया है, 15 अगस्त 1947 की आधी रात को  जिस प्रकार देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश की आजादी की घोषणा की थी उसी तर्ज पर नयी कर प्रणाली जी एस टी को देश के इतिहास में नया आरम्भ घोषित करने का प्रयास निश्चित ही ऐतिहासिक होता यदि संसद का यह विशेष अधिवेशन सर्वसम्मति से होता और प्रमुख विपक्षी दल भी इसमें शामिल होते , पर अब जिस प्रकार कांग्रेस ने इस विशेष अधिवेशन से  अलग रहने का  निर्णय लिया है और पूर्व प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करने से इन्कार कर दिया है  और  विपक्ष के इस बहिष्कार में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, लेफ्ट, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी शामिल हैं तो  , इसके बाद जी एस टी सरकार के लिए ऐतिहासिक पहल से हटकर राजनीतिक सरदर्द का मुद्दा बन चुका है|

देश भर में इस नयी कर प्रणाली को लेकर भ्रम की स्थिति बरकरार है  और अनेक स्थानों पर व्यापारियों ने विरोध भी प्रकट करना आरम्भ कर दिया है , व्यापारियों के इसी विरोध को भांपते हुए विपक्षी दलों ने सरकार की मुसीबत को  और बढाने का फैसला किया है|

जी एस टी के विचार को देश के सामने लाने वाली कांग्रेस ने इसे संसद में पारित करा देने के बाद भी इस मामले पर सरकार की किरकिरी कराने का जो निर्णय लिया है वह समझ से परे नहीं है|

इससे पहले यूपीए सरकार के समय मनमोहन सिंह के अमेरिका के साथ किये गए परमाणु समझौते में भी तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा ने अंतिम समय में अपने कदम वापस खींच लिए थे  | इसके साथ ही बीते दिनों में जिस प्रकार अनेक अवसरों पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी ने डा मनमोहन सिंह पर कटाक्ष करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा है उसे भी वसूल करने का मौक़ा कांग्रेस को मिल गया है|

इसके अतिरिक्त जी एस टी को लागू करने में देश के सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर से सहयोग किया पर अब जिस प्रकार भाजपा अकेले इसका श्रेय लेकर इसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है तो विपक्ष ने इसे नए रूप से विवाद का विषय बनाने का फैसला किया है|