नीतीश कुमार क्यों हैं झुंझलाए ?

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Nitish Kumar on political cross road .

आम तौर पर सार्वजनिक रूप से काफी शांत रहने वाले और कम बोलने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन में चल  रही उठापटक के बीच अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) की राष्ट्रीय कार्यकरिणी के सदस्यों को संबोधित करते हुए कुछ प्रमुख बातें कहीं जो उनकी राजनीतिक विवशता और झुंझलाहट को ही अधिक दर्शाता है|

अपने संबोधन में उन्होंने दो प्रमुख बातें कहीं कि उनकी पार्टी जनता दल ( यूनाइटेड) किसी की पिछलग्गू नहीं है और वह अपना रास्ता खुद तय करती है और दूसरा उन्होंने समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के हवाले से कांग्रेस पर तंज कसा और कांग्रेस को “ सरकारी गांधीवादी” बताया |

ये दोनों ही बातें नीतीश कुमार की राजनीतिक परिपक्वता और शालीन स्वभाव के विपरीत कहीं न कहीं उनके ऊपर बढ़ते दबाव को दर्शाती हैं|

नीतीश कुमार की पहली बात कि उनकी पार्टी किसी की पिछलग्गू नहीं है वर्तमान राजनीतिक वातावरण के प्रतिकूल है क्योंकि इस समय नीतीश कुमार जिस स्थिति में हैं उसमें उन्हें या तो श्रीमती सोनिया गांधी या फिर  नरेन्द्र मोदी का पिछलग्गू तो बनना ही पडेगा | दूसरी बात कि जो उन्होंने कांग्रेस पर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के हवाले से तंज कसा उसमें ही उनका सारा दर्द और राजनीतिक निहितार्थ छुपा है|

असल में नीतीश कुमार कांग्रेस के सहारे अपनी राजनीतिक ताकत कम होते हुए भी स्वयं को 2019 के आम चुनावों में विपक्ष का सर्वमान्य नेता बनाना चाहते थे और इसकी शुरुआत उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों से करनी चाही और विपक्ष की ओर से संयुक्त उम्मीदवार उतारने के लिए कांग्रेस को राजी किया और इस क्रम में उन्होंने महात्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल गांधी को विपक्ष का उम्मीदवार बनाना चाहा जो कि स्वयं नीतीश कुमार की गांधी विरासत से स्वयं को जोड़कर अपना राजनीतिक विस्तार करने की महत्वाकांक्षा का परिणाम था , इससे पहले बिहार में शराब बंदी के अभियान को भी महात्मा गांधी से जोड़कर वे पूरे देश में अभियान लेना चाहते थे , क्योंकि बिहार की  दलित नेता मीरा कुमार नीतीश कुमार के बिहार के राजनीतिक गणित को गड़बड़ करती हैं और बिहार में कांग्रेस के राजनीतिक विस्तार के साथ देश की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के लिए राजनीतिक अवसर प्रदान करती हैं जबकि नीतीश कुमार की 2019 रणनीति तब सफल होती है  जब कांग्रेस बिहार और उत्तर प्रदेश में कमजोर रहे |

नीतीश कुमार की इस राजनीतिक चाल और महत्वाकांक्षा को कांग्रेस ने भांप लिया और  आगामी लोकसभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार के 1989 के वी पी सिंह बनने की किसी भी संभावना को समाप्त करने के लिए ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने 22 जून की राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए विपक्ष की आयोजित बैठक से पहले ही नीतीश के विरुद्ध बयान दिया |

नीतीश कुमार अब पूरी तरह राजनीतिक दोराहे पर खड़े हैं | यदि 2020 से पहले वे अपनी ही सरकार को अस्थिर करते हैं तो यह जनादेश का उल्लंघन होगा और उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता नष्ट हो जायेगी और वे कांग्रेस के न होकर भाजपा के पिछलग्गू होकर रह जायेंगे और यदि अब इस तनावपूर्ण स्थिति में गठबंधन चलाते हैं तो कांग्रेस और राजद उनकी पार्टी में विभाजन कर नीतीश कुमार को राजनीतिक वनवास देने के लिए प्रयासरत रहेंगे |

कुलमिलाकर नीतीश कुमार अपने राजनीतिक रशूख के ढलने और भविष्य को लेकर अनिश्चित होने से झुन्झला रहे हैं| इसके साथ ही जो यह मानकर चल रहे हैं कि नीतीश कुमार केवल लालू प्रसाद यादव से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं उन्हें अपना आकलन सुधार लेना चाहिए नीतीश की बड़ी समस्या कांग्रेस है और बिहार और उत्तर प्रदेश के लिए बनाई जा रही उसकी दूरगामी रणनीति है|