उत्तर कोरिया संकट के भारत के लिए मायने

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उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु हथियार सम्पन्न होने के बाद से पिछले कुछ वर्षों से लगातार जिस प्रकार परमाणु हथियारों को ले जाने वाली  और परमाणु हमला कर सकने वाली मिसाइलों का परीक्षण किया जा रहा है  वह अब गंभीरता की स्थिति तक पहुँच चुका है और विश्व के अनेक शक्तिशाली देश इसे एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती मानकर इस पर गंभीरता से विचार करने लगे हैं |

उत्तर कोरिया आधिकारिक रूप से परमाणु हथियार धारण करने के लिए स्वीकृत देशों की श्रेणी से बाहर है और संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन के अतिरिक्त केवल भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और दक्षिण सूडान ऐसे देश हैं जिन्होंने इस दायरे से बाहर अपने पास परमाणु हथियार होने की पुष्टि कर रखी है जबकि इजरायल ने अपने परमाणु हथियार की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है  |

द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु हथियार छोड़े जाने के बाद से अब तक परमाणु हथियारों का प्रयोग कभी भी किसी देश ने किसी दूसरे देश के विरुद्ध नहीं किया है और अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम के बाद विश्व के प्रमुख शक्तिशाली देशों ने आपस में यह तय किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के पांच स्थायी सदस्यों के पास तक यदि परमाणु हथियार सीमित रहा तो वे शक्ति संतुलन के सिद्धांत के अंतर्गत एक दूसरे के पास पर्याप्त परमाणु  शक्ति होने से महाविनाश की संभावना के चलते इन विनाशकारी हथियारों का प्रयोग एक दूसरे पर नहीं होगा  और सभी देशों के शीर्ष नेता किसी भी टकराव की स्थिति को बचा ले जायेंगे और यही कारण था कि शीत युद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य टकराव के अनेक अवसर आये पर स्थिति  परमाणु युद्ध तक नहीं आयी क्योंकि मानव जाति के महाविनाश के खतरे का आभास सभी को था |

परन्तु सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ओर जहां अमेरिका की अगुवाई में एकध्रुवीय विश्व की बातें कही जाने लगीं तो वहीं दूसरी ओर विश्व में 1990 के दशक से ही बहु ध्रुवीय विश्व की संभावानाएं बनने लगीं और बीते ढाई दशक से अधिक समय में विश्व जगत में आये शक्ति संतुलन के परिवर्तन को उत्तर कोरिया के इस संकट के रूप में देखा जा सकता है|

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही ब्रिटेन ने एक महाशक्ति के रूप में अपनी आभा खोनी आरम्भ कर दी थी और विश्व राजनीति के पटल पर अमेरिका एक विश्व शक्ति बनकर उभर रहा था | प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध के मध्य उपनिवेश बनाये गए अनेक देशों की स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया और ब्रिटेन व फ्रांस जो बाहरी उपनिवेशों के लिए आपस में संघर्ष करते थे पर एक दूसरे के सहयोगी भी थे क्योंकि उन्होंने अपने अपने उपनिवेशों पर शासन और वहां स्थिरता स्थापित करने के लिए अपने संसाधन झोंक रखे थे , जिसके चलते , एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के अनेक देशों में ब्रिटेन का शासन चल रहा था , पर प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध के मध्य फ्रांस के अभूतपूर्व पराभव से उपनिवेशों को बचाकर रखने और उसे स्थिर रखने का बोझ अकेले ब्रिटेन पर आ गया और इसी बोझ के चलते ब्रिटेन को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुत से उपनिवेशों को स्वतंत्र करना पडा |

सोवियत संघ के विघटन के बाद से विश्व राजनीति में यही स्थिति अमेरिका की हो चुकी है| बीते ढाई दशक में अमेरिका को अकेले ही शक्ति संतुलन के सिद्धांत का पालन करना पडा और इस कारण दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में उसे स्थिरता के लिए काफ़ी संसाधन झोंकने पड़े जिसका सीधा असर उसके अपने देश पर पडा और दूसरी और इन्हीं ढाई  दशकों में चीन , रूस और ईरान ने अपनी घरेलू स्थिति में सुधार कर अंतरराष्ट्रीय जगत में बहुध्रुवीय विश्व की भूमिका बनानी आरम्भ कर दी |

एक ओर अमेरिका विश्व के अनेक देशों में पश्चिमी लोकतंत्र स्थापित करने के लिए उन देशों में  दखल देकर लोकतंत्र को थोपने के लिए उन्हें अस्थिर करता रहा तो इस अस्थिरता का लाभ उठाकर प्रथम विश्व युद्ध के समय उखाडी जा चुकी  खिलाफत संस्था को फिर से जीवित करने के लिए चल रहा इस्लामवादी आन्दोलन वैचारिक और हिंसक मिश्रण से एक वैचारिक  और आतंकवादी चुनौती  के  रूप में पूरी  दुनिया के सामने उपस्थित हो गया पर चीन, रूस और ईरान को इस आतंकवादी आन्दोलन से न तो उतना नुकसान हुआ और न ही ये देश सीधे सीधे इनके निशाने पर आये और यह पूरी लड़ाई अमेरिका बनाम इस्लामवाद बन गयी और अमेरिका ने इस लडाई से स्वयं को निकालने के लिए अपने अनेक सहयोगियों को भी इस लड़ाई में घसीटने की कोशिश की और आतंकवाद  को विश्व राजीनति का प्रमुख  एजेंडा बनाने की कोशिश की , यह कोशिश सफल भी रही पर भारत जैसे देशों के लिए जो विश्व पटल पर आतंकवाद की बात उठाकर अमेरिका का बोझ हल्का कर रहा है पर  वहीं दूसरी ओर चीन, रूस और ईरान जैसे देश इस लड़ाई में अमेरिका के उलझे रहने में अपना अधिक राजनीतिक लाभ और कूटनीतिक लाभ देखते हैं जितना कि इस लड़ाई से  उसे  निकालने में|

उत्तर कोरिया के परमाणु संकट को  विश्व जगत में शक्ति संतुलन में आये इस  परिवर्तन की भूमिका में ही देखना चाहिए |

उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के बाद अमेरिका , जापान और दक्षिण कोरिया के तमाम विरोधों के बाद भी परमाणु हथियार ले जाने वाली मिसाइल का परीक्षण सीधे सीधे इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि चीन ,रूस और ईरान अब एशिया के क्षेत्र में अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं और एक नई राजनीतिक डील की ओर संकेत कर रहे हैं कि अब विश्व राजनीति में आज अमेरिका वहाँ खड़ा है जहाँ कि आज से एक शताब्दी पहले ब्रिटेन हुआ करता था और चीन वहाँ खड़ा है जहाँ अमेरिका हुआ करता था और ये सभी देश अमेरिका को याद दिलाना चाहते हैं कि यदि अमेरिका समय रहते नहीं चेता तो उत्तर कोरिया उसके लिए पर्ल हार्बर बन जाएगा और इस समय अमेरिका किसी भी प्रकार विश्व युद्ध जैसी स्थिति में नहीं  पड़ना चाहता |

उत्तर कोरिया का संकट दो स्तरों पर ही सुलझाया जा सकता है| पहला, विवश होकर अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र संघ के उसके  अन्य पश्चिमी देशों के सहयोगी ईरान की तर्ज पर उत्तर कोरिया से भी बातचीत का दौर आरम्भ करेंगे और उसे भी परमाणु क्लब में शामिल करने की पहल करेंगे और इस क्रम में अमेरिका ने जिस तरह इजरायल के रणनीतिक हितों और आशंकाओं को देखते हुए भी ईरान के साथ परमाणु डील की थी उसी प्रकार जापान और दक्षिण कोरिया के हितों और आशंकाओं के बाद भी अमेरिका  उत्तर कोरिया को कुछ परमाणु रियायत देगा और चीन को विश्व राजनीति में अपना बराबर का साझीदार स्वीकार कर लेगा | दूसरा , विश्व दो ध्रुव में बंट जाएगा और पश्चिमी गुट बनाम पूर्वी गुट बन जाएगा और युद्ध के बिना आर्थिक और राजनीतिक तौर पर ही शह और मात का खेल चलेगा |

उत्तर कोरिया के इस पूरे संकट में भारत के लिए भी कुछ दूरगामी सन्देश निहित हैं|

भारत में लम्बे समय तक ब्रिटेन , फ्रांस, पुर्तगाल का शासन रहा जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन में भारत स्वयं को स्वाभाविक रूप से यूरोप और पश्चिमी संस्कृति का सहयोगी मानता है पर बदलते हुए परिवेश में भारत को स्वाधीनता काल में हुए राजनीतिक विमर्श को स्मरण करना चहिये जब सभी विचारक एशियावाद के समर्थक थे और प्राचीन काल से पूर्वी विश्व की आध्यात्मिक श्रेष्ठता, सभ्यतागत श्रेष्ठता और दार्शनिक समानता के चलते एक वृहद एशियाई संस्कृति का सपना देखते थे |

भारत को अपने हितों को देखते हुए चीन के विश्व में बढ़ते कद के अनुरूप चीन के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों की दिशा में सोचना चाहिए क्योंकि इस्लामवादी आतंकवाद का सन्दर्भ ही विश्व राजनीति की धुरी नहीं है वह केवल आयाम भर है  और चीन, रूस और ईरान जैसे देश इस आतंकवाद की परिभाषा में भी पूरी तरह अमेरिका की परिभाषा पर निर्भर नहीं हैं और अमेरिका भी आतंकवाद की परिभाषा में भारत से अपनी बात कहलवाना  चाहता है पर भारत के वास्तविक  हितों की अनदेखी करता है|

चीन अपने कद के अनुरूप आज नहीं तो कल उत्तर कोरिया और पाकिस्तान दोनों को परमाणु क्लब में शामिल करा लेगा और चीन का सिल्क रूट का सपना भी पूरी तरह निराधार नहीं है |

भारत को अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और भौगोलिक इतिहास के पन्ने खोलकर चीन के साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक हितों को खंगालना चाहिए और पश्चिमी संस्कृति के साथ अपने हितों और आवश्यकताओं के अनुरूप सम्बन्ध रखने चाहिए न कि उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप क्योंकि पश्चिम के साम्राज्य में भारत  अब भी उनके मुकुट का आभूषण है पर   भारत को सोचना होगा कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध जो कि आम तौर पर यूरोपीय युद्ध था उसे विश्व युध्द मानकर  पराधीन होने के कारण भारत के सैनिकों को यूरोप के लिए खून बहाना पडा पर आज स्वतंत्र होते हुए भी क्या हम पश्चिमी हितों के लिए अपने हितों के बारे में न सोचें ?

यदि चीन विश्व में अपना साम्राज्य विस्तार करना चाहता है तो पश्चिम भी तो अमेरिका की अगुवाई में ग्रीक और रोमन साम्राज्य की विरासत को ही  आगे बढ़ा रहा है|

जिस प्रकार स्वाधीनता के बाद हमारे नीति निर्देशकों ने गुट निरपेक्षकी नीति घोषित रूप से कह रखी थी पर सुविधानुसार अमेरिका और सोवियत संघ के गुट से नजदीकी और दूरी बनाते रहे उसी प्रकार भारत को फिर से अपने हितों के अनुरूप पश्चिम और पूरब में बंट रही विश्व राजनीति में अपने पत्ते खोलने चाहिए और खुलकर किसी पाले में जाने या उसका बहिष्कार करने की आश्यकता नहीं है|